शुक्रवार, 16 नवंबर 2018

श्रद्धांजलि: विराट

हिंदी गीति जगत शोकाकुल अब विराट ही नहीं रहे
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'मुक्तिकाएँ लिखें, दर्द गायें लिखें, 
हम लिखें धूप भी, हम घटाएँ लिखें। 
हास की अश्रु की सब छटाएँ लिखें, 
बुद्धि की छाँव में भावनाएँ लिखें, 
सत्य के स्वप्न सी कल्पनाएँ लिखें, 
आदमी की बड़ी लघुकथाएँ लिखें। 
सूचनाएँ नहीं, सर्जनाएँ लिखें, 
भव्य भवितव्य की भूमिकाएँ लिखें। 
पीढ़ियों के लिए प्रार्थनाएँ लिखें, 
केंद्र में रख मनुज मुक्तिकाएँ लिखें।'
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विश्ववाणी हिंदीके लाड़ले गीतकार, समर्थ दोहाकार, अन्यतम मुक्तककार, सशक्त ग़ज़लकार, सुधी समीक्षक, नई कलमों को हृदय से प्रोत्साहित करने तथा बढ़ते देख आशीष वर्षण करनेवाले, अनेक भवनों तथा सेतुओं का निर्माण कराकर राष्ट्र निर्माण में योगदान करनेवाले इंदौर निवासी चंद्र सेन 'विराट' जी के मधुर रचनाओं काका श्रवण करने के लिए माँ शारदा ने उन्हें अपने धाम में बुला लिया। 
३ दिसंबर १९३६ को इंदौर निवासी श्रीमती वेणु ताई तथा श्री यादवराव डोके को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिसने १९५८ में नगरी अभियंत्रण में सनतक की उपाधि प्राप्त कर म.प्र. लोक निर्माण विभाग में सहायक यंत्री के पद पर राष्ट्र निर्माण में योगदान देना आरम्भ किया और १९९४ के अंत में सेवा निवृत्त हुए। १४ गीत संग्रहों (मेंहदी रची हथेली १९६५, ओ मेरे अनाम १९६८, स्वर के सोपान १९६९, किरण के कशीदे १९७४, मिट्टी मेरे देश की १९७६, पीले चांवल द्वार पर १९७६, दर्द कैसे चुप रहे १९७७, पलकों में आकाश १९७८, बूँद-बूँद पारा १९९६, गाओ कि जिए जीवन २००३, सरगम के सिलसिले २००८, ओ गीत के गरुण २०१२), ११ हिंदी ग़ज़ल संग्रहों (निर्वसना चाँदनी १९७०, आस्था के अमलतास १९८०, कचनार की टहनी १९८३, धार के विपरीत १९८४, परिवर्तन की आहट १९८७, लड़ाई लम्बी है १९८८, न्याय कर मेरे समय १९९१, फागुन माँगे भुजपाश १९९३, इस सड़ी का आदमी १९९७, हमने कठिन समय देखा है २००२, खुले तीसरी आँख २०१०), ५ मुक्तक संग्रहों (कुछ पलाश कुछ पाटल १९८९, कुछ छाया कुछ धुप १९९८, कुछ सपने कुछ सच २०००, कुछ अंगारे कुछ फुहारें २००७, कुछ मिश्री कुछ नीम २००९, २ दोहा संग्रहों (चुटकी-चुटकी चाँदनी २००६, अँजुरी अँजुरी धूप २००८) तथा ७ सम्पादित ग्रंथों (गीत-गंध १९६६,हिंदी के मनमोहक गीत १९९७, हिंदी के सर्वश्रेष्ठ मुक्तक १९९८, टेसू के फूल २००३, कजरारे बादल २००४, धुप के संगमरमर २००५, चाँदनी-चाँदनी २००७ के माध्यम से विराट जी ने हिंदी-साहित्य को समृद्ध किया है। 
विराट -वैभव १९९९, चन्द्रसेन विराट के प्रतिनिधि गीत १९९९, विराट विमर्श २००४, चन्द्रसेन विराट का काव्य संवेदन और शिल्प २००६, चद्रसेन विराट की प्रतिनिधि हिंदी ग़ज़लें आदि २०११ विराट जी के सृजन पर केंद्रित कृतियाँ हैं। 
चन्द्रसेन विराट ने हिन्दी गजलों को एक नया स्वरूप प्रदान कर 'मुक्तिका' संज्ञा दी। अपनी ‘मुक्तिका के माध्यम से उन्होंने कथ्य और शैली के नये प्रयोगों को हिन्दी भाषा के सांचे में अच्छी तरह ढालने का कार्य किया । कवि का अपना परिवेश है, अपनी संवेदनाएं हैं। नवगीतों, गज़लों से मिली-जुली मुक्तिकाओं में आम आदमी के समकालीन जीवन को पैनी दृष्टि से देखा है । हिन्दी की नयी छवि के रूप में निजी छन्दों का कलात्मक प्रयोग कर एक नयी जमीन जोड़ी है, जिसमें व्यावहारिक जीवन का कटु यथार्थ है । आज की भौतिकतावादी, वैज्ञानिक, यान्त्रिक सभ्यता का सजीव चित्रण उनकी कविताओं में हैं। उन्होंने गीत-ग्रन्थ का भी सम्पादन किया । वे सहृदय, संवेदनशील कवि हैं, किन्तु आधुनिक परिस्थितियों में आडम्बर से परे मानवता के सहज गीतकार हैं । उनकी कविताएं प्रेम और मानवीय रिश्ते से गहरे रूप में जुड़ी हैं। 
चंद्रसेन विराट का कहना है कि 'मुक्तिका' कोई स्वतंत्र विधा नहीं है। यह हिंदी ग़ज़ल की शुरुआत के वर्षों में मेरे द्वारा सुझाया हुआ - हिंदी ग़ज़ल के लिए वैकल्पिक नाम भर था- 'मुक्तिका'। मुझे मेरे संस्कार में परिनिष्ठित हिंदी मिली और यही मेरी अर्जित भाषा रही, इसीलिए स्वाभाविक रूप से मैंने वही भाषा प्रयुक्त की, जिसमें तत्सम शब्दों का प्रयोग स्वभाववश ही हुआ। हर कवि की अपनी भाषा एवं डिक्शन होता है। मेरी यही तत्समी हिंदी मेरी विशिष्टता भी रही। पाठकों ने तत्सम शब्दों को बहर में सही रूप में प्रयुक्त करके अर्थवत्ता बढ़ाने के प्रयोग की प्रशंसा की तो ठेठ उर्दू ग़ज़ल प्रेमियों ने आपत्तियां भी दर्ज करायीं। मेरी यह परिनिष्ठित हिंदी काव्य भाषा कभी सराही गई तो कभी कटु आलोचना भी हुई।
मान्य हिंदी भाषा में लिखी ग़ज़ल को ही सामान्य रूप से हिंदी ग़ज़ल कहा जाता है। सर्वमान्य हिंदी भाषा के प्रयोग के कारण ही कोई ग़ज़ल, हिंदी ग़ज़ल कही जाती है। अन्यथा तो वह ग़ज़ल ही है। उर्दू ग़ज़ल जानी-मानी उर्दू भाषा में लिखी गई (कालांतर में तथाकथित हिंदुस्तानी) विभिन्न बहरों में बद्ध गीति रचना है, गीति-तत्व जिसकी मूल अर्हता है। यही ग़ज़ल का काव्य रूप यदि परिनिष्ठित हिंदी (संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दावली अनिवार्य नहीं) में लिखा जाए तो उसे हिंदी ग़ज़ल कहा जाना सर्वथा उचित है। ग़ज़ल केवल हिंदी में ही नहीं, अपितु हिंदीतर भाषाओं जैसे, मराठी, गुजराती, बांग्ला आदि में भी लिखी जा रही है। और तो और, संस्कृत में भी ग़ज़लों की रचना हो रही है। इन भाषाओं में लिखी ग़ज़ल को क्रमशः मराठी ग़ज़ल, गुजराती ग़ज़ल, बांग्ला ग़ज़ल और संस्कृत ग़ज़ल ही तो कहा जाएगा। इसीलिए हिंदी भाषा में लिखी गई ग़ज़ल को हिंदी ग़ज़ल ही तो कहा जाएगा। उर्दू भाषा की ग़ज़ल को सिर्फ देवनागरी लिपि में लिख भर देने से वह हिंदी ग़ज़ल नहीं हो जाती। उर्दू शब्दावली एवं विन्यास के कारण वह उर्दू की ग़ज़ल ही रहेगी। 'ग़ज़ल' तो एक पात्र है। इस पात्र में जिस भाषा का रस आप भरेंगे, उसी भाषा का रस यह पात्र देगा। यही बात हिंदी ग़ज़ल पर भी लागू है।
विराट जी के अनुसार साहित्य में काल क्रमानुसार हर पीढ़ी अपनी अग्रज पीढ़ी से संस्कारित, शिक्षित-दीक्षित होती आयी है। ऐसा ही हमारी पीढ़ी के साथ हुआ है और हमारे बाद की पीढ़ी के साथ भी होगा और हुआ है। 
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दादा विराट के सांनिंध्य में बिताये पलों की स्मृतियाँ मन पर आच्छदित हैं। चित्र में अमरकंटक यात्रा पर लेजाने के पूर्व मेरी जीवनसंगिनी डॉ. साधना वर्मा, श्रीमती विराट, विराट जी, मैं तथा बिटिया तुहिना।

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