शुक्रवार, 23 नवंबर 2018

मुक्तक

मुक्तक
श्री वास्तव में मिले जब, हो मन में संतोष।
संस्कारधानी करे, सारस्वत जयघोष।।
बोल रही हैं हवा में, बंद मुट्ठियाँ सत्य-
अजर अमर अभिव्यक्ति का, रीते कभी न कोष।।
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किरण-वरण स्वदेश कर, मिटे तभी तिमिर सघन। 
प्रीति-चाँदनी हँसे, सुर करें विनत भजन।।
अधर धरे सुहास हों, नयन सपन बिखेरते-
सलिल सदैव साथ हो, करे सतत सृजन यजन।।
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