शुक्रवार, 30 नवंबर 2018

घनाक्षरी

एक रचना
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राम कहे राम-राम, सिया कैसे कहें राम?,
                          होंठ रहे मौन थाम, नैना बात कर रहे।
मौन बोलता है आज, न अधूरा रहे काज,
                         लाल गाल लिए लाज, नैना घात कर रहे।।
हेर उर्मिला-लखन, देख द्वंद है सघन,
                         राम-सिया सिया-राम, बोल प्रात कर रहे।
श्रुतिकीर्ति-शत्रुघन, मांडवी भरत हँस,
                         जय-जय सिया-राम मात-तात कर रहे।।
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संजीव
३०.११.२०१८
  

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