गुरुवार, 15 नवंबर 2018

दोहा सलिला

दोहा-दर्पण में दिखे, देश-काल का सत्य।
देख-सुधार, निखार ले, खुद को घटे असत्य।।
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अलंकार रस भाव लय, बिंब-प्रतीक न मूल।
शब्द मिथक हैं उपकरण, कथ्य साध्य मत भूल।।
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दिल से दिल की बात कह, दोहा हो दिल-दूत।
दिलवर का दिलदार तक, पहुँचा स्नेह अकूत।।
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आभा से आ भा कहे, आभित हो नव सूर्य।
दिनकर दिन कर दे जगा, बजे दसों दिश तूर्य।।
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कहे देहरी देह री!, मत मर्यादा छोड़।
बाहर मिले न गेह री!, नाता निभा न तोड़।।
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चीत्कार  कविता नहीं, मात्र कराह न गीत।
नव रसमय नव गीत ही, है जीवन संगीत।।
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कल से कल के बीच हो, कलकल भाव प्रवाह।
किलकिल कर क्यों कर रहे, कल को कहें तबाह।।
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जन्म ब्याह राखी तिलक, गृह प्रवेश त्यौहार।
सलिल बचा पौधे लगा, दें पुस्तक उपहार।।
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हिंदी आटा माढ़िए, देशज मोयन डाल।
सलिल संस्कृत सान दे,  पूड़ी बने कमाल।।
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करती भोर विभोर मन, दुपहर चाहे काम।
साँझ कहे पा लक्ष्य झट, रात मिले आराम।।
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ठाकुर जी को पूजते, ठाकुर जी ले भोग।
ठकुराइन मुस्का रहीं, काम पड़े का जोग।।
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संजीव

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