गुरुवार, 22 नवंबर 2018

विदग्ध जी

व्यक्तित्व चर्चा: 
 'सादा जीवन उच्च विचार' के पर्याय  विदग्ध जी 



सादा जीवन उच्च विचार के आदर्श के साथ गीता को जैसे वे जी रहे हैं . गुटबाजी और राजनीति से दूर  अपनेपन के साथ सबसे आत्मीयभाव से मिलते हैं . शांत ,गंभीर , एकांत साहित्य साधक प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध सहज ,सरल व्यक्तित्व के मालिक हैं . संकल्पढ़ृड़ता और आत्मविश्वास से भरे हुये हैं . उन्होने आजादी की लड़ाई  बहुत पास से देखी  और अपने तरीके से उसमें सहभागिता की है . वे मण्डला के अमर शहीद उदयचंद जैन के सहपाठी रहे हैं . उन्होने आजादी के पहले के वे दिन जिये हैं , जब एक सुई या ब्लेड तक ,मेड इन लंदन होता था और  वे आज के इस परिवर्तन के भी साक्षी हैं जब देश में बने उपग्रह चांद तक  पहुंच रहे हैं . वे उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसने घोड़े पर सवार डाकिये को चिट्ठियां ले जाते देखा है , और जो आज दुनिया के एक कोने की खबरें दूसरे कोने में बैठकर ,लाइव देख रहे हैं . उन्होने हर क्षेत्र में देश की प्रगति जी है , पर आजादी के बाद हुये समाज के नैतिक मूल्यो के अधोपतन को देखने , वे व्यवस्था के समक्ष विवश भी रहे हैं   . किन्तु उनकी रचनाधर्मिता हर विवशता से मुक्त रही , प्रत्येक सामयिक समस्या और महत्वपूर्ण घटना पर उन्होने निधड़क आशा भरी कलम चलाई है . चीन और पाकिस्तान के खिलाफ लड़ाईयां , आपातकाल , भूकम्प ,चक्रवात व बाढ़ की विभीषिकायें , सत्ता परिवर्तन और जाने किन किन विषयो पर उन्होने सार गर्भित रचनाये लिखी हैं . उनका अनुभव संसार बहुत विशाल है . उन्होने देशाटन किया है जनरल डिब्बे से लेकर ए सी डब्बे के यात्रियो के बीच सहज चर्चाओ से लोगो के मनोविज्ञान को समझा ही नही उन पर लिखा भी है . उम्र के नब्बे के दशक में भी वे नया रचते ही नही , लगातार नया पढ़ते हुये भी मिलते हैं . चिंतन मनन , नियमित , संयमित तथा मर्यादित जीवन शैली उनकी विशेषता है . वे लेखक , कवि , अनुवादक , शिक्षाविद की भूमिकाओ के साथ ही आर्थिक विशेषज्ञ भी हैं . प्रगति प्रकाशन आगरा से प्रकाशित भारतीय लेखक कोश में , पड़ाव प्रकाशन भोपाल से प्रकाशित हस्ताक्षर तथा सृजनधर्मी , जन परिषद भोपाल से प्रकाशित हू इज हू इन मध्य प्रदेश , मण्डला जिले का साहित्यिक विकास आदि ग्रंथो में उनका विस्तृत परिचय प्रकाशित है . उनके पिता स्व.छोटे लाल वर्मा का मण्डला में स्वातंत्र्य आंदोलन प्रारंभ करने व गांधी जी की विचारधारा को मण्डला के अनपढ़ लोगो तक पहुंचाने व तत्कालीन राष्ट्रवादी साहित्य को मण्डला के युवाओ तक पहुंचाने में उल्लेखनीय योगदान था , मां सरस्वती देवी एक विदुषी , धर्मप्राण , साक्षर महिला थी . घर की सबसे बड़ी संतान होने के कारण पिता के देहांत के बाद छोटे भाइयो की शिक्षा दीक्षा की जबाबदारी प्रो श्रीवास्तव ने वहन की . उनका विवाह लखनऊ में श्रीमती दयावती श्रीवास्तव से ३० मई १९५१ को हुआ था . नारी स्वातंत्र्य की विचारधारा उनके मन में कितने गहरे तक है इसका पता इसी से चलता है कि मण्डला जैसी छोटी जगह की तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियो में भी  विवाह के बाद पति पत्नी ने साथ साथ स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की एवं श्रीमती श्रीवास्तव ने भी शासकीय नौकरी की . वे आदर्श शिक्षक दम्पति के रूप में प्रतिष्ठित रहे .
राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के माध्यम से विदर्भ क्षेत्र में उन्होने हिन्दी के लिये उल्लेखनीय कार्य किये .गुजरात की संस्था पं. सातवलेकर स्वाध्याय मण्डल संस्कृत विद्यापीठ वलसाड , के माध्यम से शालेय बच्चो में संस्कृत को लोकप्रिय बनाने का महत्वपूर्ण कार्य वर्षो करते रहे . साहित्य के सिवाय भी प्रो  श्रीवास्तव के जीवन का समाज सेवा का एक महत्वपूर्ण पक्ष रहा है . विवेकान्द शिला स्मारक कन्याकुमारी तथा यू एन ओ भवन दिल्ली के निर्माण के लिये उन्होने धन संग्रह किया तथा व्यक्तिगत रूप से बड़ी राशि दान स्वरूप दी . मण्डला में रेड क्रास समिति की स्थापना उनके ही प्रयासो से हुई .उन्होने मण्डला में म्युचुएल फंड के माध्यम से शेयर , आदि निवेश योजनाओ की जानकारी सुलभ करवाई तथा अनेक युवाओ हेतु आत्मनिर्भर रोजगार के नये अवसर दिये .   प्रो सी बी श्रीवास्तव कामनवैल्थ काउंसिल फार एजूकेशनल एडमिनिस्ट्रेशन के सदस्य हैं .  आल इण्डिया फेडरेशन आफ एजूकेशनल एशोसियेशन्स के महाविद्यालयीन विभाग के वे सचिव रहे हैं .  बातो बातो में उनसे पता चला कि भारत चीन युद्ध , कारगिल युद्ध , लातूर के भूकम्प , उत्तरांचल आपदा आदि अवसरो पर प्रधान मंत्री सहायता कोष में उन्होने बड़ी राशि स्वतः प्रेरणा से बैंक जाकर दान दी है , बहुत संकोच से उन्होने कहा कि इसका उल्लेख आलेख में न करूं किन्तु बिना इस परिचय के व्यक्तित्व का आकलन अधूरा होगा अतः मैं यह लिख रहा हूं . विदर्भ से शैक्षिक जगत में अपनी सेवाये प्रारंभ करके प्राचार्य के रूप में शहपुरा ,  वारासिवनी , जबलपुर , सरायपाली , सिमगा , हृदयनगर , मण्डला आदि स्थानो पर वे जिस भी स्कूल में प्राचार्य रहे उन्होने अपनी छाप छोड़ते हुये अनेको विद्यार्थियो को दिशा दी . केंद्रीय विद्यालय क्र १ जबलपुर , बी टी आई मण्डला , राज्य शिक्षण संस्थान भोपाल , प्रांतीय शिक्षण महाविद्यालय जबलपुर आदि संस्थाओ में लम्बी अवधि तक आपने अपनी कुशल सेवाये दी .  सेवानिवृति के बाद उनका गृहनगर मण्डला उनका सामाजिक कार्य क्षेत्र रहा , जहां अनेको सामाजिक संस्थाओ में उन्होने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई .  गायत्री मंदिर  मण्डला, महाराजपुर चित्रगुप्त मंदिर  के निर्माण में आपने आर्थिक सहयोग भी दिया तथा उन संस्थाओ से लगातार सामाजिक विकास के लिये कार्य करते रहे . माहिष्मती शोध संस्थान के लिये उन्होने  मण्डला तथा महेश्वर में से वास्तविक रूप से अर्वाचीन माहिष्मती नगरी कौन सी है , इस विषय पर संस्कृत साहित्य के आधार पर शोध कार्य किया . वर्षो तक अखिल भारतीय कायस्थ महासभा के वे सक्रिय पदाधिकारी रहे हैं . तुलसी पंचशती समारोह समिति मण्डला , हि्दी साहित्य समिति , राजीव गांधी जल संग्रहण मिशन मण्डला  , संयोजक  जिला साक्षरता मानीटरिंग कमेटी  मण्डला , पं. बाबूलाल धार्मिक न्यास मण्डला , जैसी अनेक समाजसेवी संस्थाओ को उनका मार्गदर्शन मिलता रहा है .
पाठ्यक्रम निर्माण , औपचारिकेतर शिक्षण , पढ़ो कमाओ , माइक्रो टीचींग , सतत शिक्षा , शैक्षिक प्राद्योगिकी , जनसंख्या शिक्षा , पर्यावरण सुधार , शिक्षा में गुणात्मक सुधार , शालेय पर्यवेक्षण , आदि विषयो पर  उनके कई शोध आलेख प्रकाशित हुये तथा नीतिगत व मैदानी निर्णायक योगदान उन्होने दिया है .सरस्वती शिशु मंदिर के अनट्रेंड शिक्षको हेतु वे  वर्षो निशुल्क शैक्षिक प्रशिक्षण शिविर आयोजित करते रहे . नेहरू युवा केद्र संगठन में अपनी रचनाधर्मिता से उन्होने युवाओ के लिये आव्हान गीतो तथा प्रेरक उद्बोधनो के माध्यम से अपना योगदान दिया व सम्मानित हुये . जब जब जो व्यक्ति उनके गहन संपर्क में आया वह  उनके प्रति चिर श्रद्धा से अभीभूत हुये बिना नही रहा और अपने परिवेश से मिलता यही प्यार प्रो श्रीवास्तव की पूंजी है . भारतीय सांस्कृतिक मूल्यो के अनुरूप आत्म प्रशंसा से दूर , मितभाषी , देश प्रेम व आध्यात्मिक अभिरुचि से अभिप्रेरित ये कर्तव्य निष्ठ साहित्य मनीषी मौन साहित्य साधना में आज भी उसी अध्ययनशीलता और सक्रियता से निरत है.
दुनिया से जुदा, दिल में रहती है जो शरमायी
वह याद चली आती, जब देखती तनहाई।
मिलकर के मेरे दिल को दे जाती है कुछ राहत
जो रखती मुझे हरदम उलझनों में भरमाई।
लगती उदास मुझको ये कायनात सारी
तस्वीर तुम्हारी ही आँखों में है समायी।
सदा सोते जागते भी सपने मुझे दिखते है
पर फिर से कभी मिलने तुमसे न घड़ी आई।
अनुमान के परदे पर कई रूप उभरते है
कभी बातें करते, हँसते पड़ती हो तुम दिखाई।
सब जानते समझते धीरज नहीं मन धरता
पलकों में हैं भर जाते कभी आँसू भी बरियाई।
मन बार-बार व्याकुल हो साँसे भरा करता
कर पाई कहाँ यादें इन्सान की भरपाई।।
दिन आते हैं जाते हैं पर लौट नहीं पाते
देती 'विदग्ध' दुख यह संसार की सच्चाई।।

गीत

अचानक जब कभी गुजरा जमाना याद आता है
तो नजरों में कई बरसों का नक्शा घूम जाता है।
वे बचपन की शरारत से भरी ना समझी की बातें
नदी के तीर पै जॅस-गा बिताई चांदनी रातें
सड़क, स्कूल, साथी, बाग औ' मैदान खेलों के
वतन के वास्ते मर-मिटने का मंजर दिखाता है।।1।।
हरेक को अपनी पिछली जिंदगी से प्यार होता है
बदल जाता है सब लेकिन वही संसार होता है
दबी रह जाती है यादें झमेलों और मेलों की
नया सूरज निकल नई रोशनी नित बाँट जाता है।।2।।
बदलता रहता है जीवन नहीं कोई एक सा रहता
नदी का पानी भी हर दिन नया होकर के ही बहता
मगर बदलाव जो भी होते हैं अच्छे नहीं लगते
बनावट का नये युग से वै बढ़ता जाता नाता है।।3।।
भले भी हो मगर बदलाव लोगों को नहीं भाते
पुराने दिनों के सपने भला किसको नहीं आते
नये युग से कोई भी जल्दी समरस हो नहीं पाता
पुरानी यादों में मन ये हमेशा डूब जाता है।।4।।          

गीत 
मुझे नहीं आता है
 *
लिखता तो हूँ। पर विवाद में पड़ना मुझे नहीं आता है
सीधी सच्ची बाते आती, गढ़ना मुझे नहीं आता है।
देखा है बहुतों को मैंने पल-पल रंग बदलते फिर भी
मुझे प्यार अच्छा लगता है, लड़ना मुझे नहीं आता है।।

लगातार चलना आता है, अड़ना मुझे नहीं आता है
फल पाने औरों के तरू पर चढ़ना मुझे नहीं आता है।
देखा औरों की टांगे खींच स्वयं बढ़ते बहुतों को।
पर धक्के दे गिरा किसी को बढ़ना मुझे नहीं आता है।।

अपने सुख हित औरों के सुख हरना मुझे नहीं आता है
अपना भाग्य सजाने श्रम से डरना मुझे नहीं आता है।
देखा है देते औरों को दोष स्वयं अपनी गल्ती को
पर अपनी भूले औरों पर गढ़ना मुझे नहीं आता है।।
*
मुक्तिका 
अधिकतर लोग मन की बात औरों से छुपाते हैं
अधर पर जो न कह पाते, नयन कह साफ जाते हैं।
कभी-कभी एक खुद की बात को भी कम समझते है
मगर जो दिल में रहते हैं वही सपनों में आते हैं।
बुरा भी हो तो भी अपना ही सबके मन को भाते हैं
इसी से लोग अपनी झोपड़ी को भी सजाते हैं।
बने रिश्तों को सदा ही, प्रेम-जल से सींचते रहिये
कठिन मौकों पै आखिर अपने ही तो काम आते हैं।
भरोसा उन पर करना शायद खुद को धोखा देना है
जो छोटी-छोटी बातों को भी बढ़-चढ़ के बताते हैं।
समझना-सोचना हर काम के पहले जरूरी हैं
किये करमों का ही तो फल हमेशा लोग पाते हैं।
जमाने की हवा में घुल चुके है रंग अब ऐसे
जो मौसम के बदल के सँग बदलते नजर आते हैं।
अचानक रास्ते में छोड़कर जो लौट जाते हैं
सभी वे राहबर सबको हमेशा याद आते हैं।
जो पाता आदमी पाता है मेहनत और मशक्त से
जो सपने देखते रहते कभी कुछ भी न पाते हैं।
जहाँ अंधियारी रातों के अँधेरे खत्म होते हैं
वहीं पै तो सुनहरे दिन के नये रंग झिलमिलाते हैं।
नहीं देखे किसी के दिन कभी भी एक से हमने
बरसते जहाँ मैं आँसू वे घर तो खिल खिलाते हैं।
*




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