शुक्रवार, 13 जुलाई 2018

sanskrit doha


संस्कृत दोहे: वंदना
दोहाकार: 
डॉ. अनंत राम मिश्र ‘अनंत’, 
हिंदी रूपांतरण: 
पं. गिरिमोहन गुरु- आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’   
*       
जननि राजहंसासने!, हे भगवती प्रसीद 
मम मयूर मानसे त्वं, नक्तं दिवं निषीद।।
राजहंस आसीन माँ!, दे निज कृपा-प्रकाश 
मन मयूर मम अहर्निश, रहे तुम्हारे पास।।
*
विधुवदने! वरदासने!, वागीश्वरि कल्याणि 
काव्य-कौशलं देहि मे, हे मातर्ब्रम्हाणि।।
चंद्रमुखी वर दो; करो, वाग्देवि कल्याण
काव्य-कुशलता दो मुझे, जगजननी कर त्राण।।     
*
अयि मातर्दुरितापहे! दूरी कुरु दुरितानि 
भवती वयं भजामहे, न: प्रयच्छ पुण्यानि।।
हे माता! दुःख-ताप हर, करो पाप सब दूर 
भजते हैं हम आपको, मिले पुण्य भरपूर
*
अहं भवच्चरणांबुजे, द्वये न तोस्मि दयस्व 
अपसारभ मे कल्मषं, जगदीश्वरी क्षमस्व
मैं पदपद्मों में नमित, तुम बिन कहीं न सार
उर-कल्मष हर; क्षमाकर, लो जगजननि उबार
*
धर्म मोक्ष कामार्थ मिति, नहि कदापि वाच्छामि
प्रति जन्मत्वत्प्रसादयोर्भक्तिं समभिलषामि
चाह न धर्म; न मोक्ष की, चाहूँ अर्थ; न काम 
अभिलाषा हर जन्म दो, भक्ति-प्रसाद ललाम
*
दुरितारे! सीतापते!, दशरथनन्दन राम!
शिवं यच्छ जगते सदा, सगुणा ब्रम्ह ललाम
पाप-शत्रु सियनाथ हे!, दशरथ-सुत श्री राम 
करें जगत कल्याण जो, सगुणा ब्रम्ह प्रणाम
*
मुरलीधर सुरमधुर्यो!, मुनि जन मानस हँस 
देहि रतिं पद्मो:स्वयोर्हेयदुकुलावतंस
सुमधुर वेणु अधर धरे, हे मुनि मनस मराल
हे प्रभु! निज पद-भक्ति दो, यादव दीनदयाल
*  
महद्धनं यदि ते भवेत्, दीनेभ्यस्तद्देहि।
विधेहि
कर्मं सदा शुभं, शुभं फलं त्वं प्रेहि॥  
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