गुरुवार, 14 मार्च 2019

पत्र- गुरु की सीख

पत्र
*
प्रिय मित्र
मधुर स्मृति।
- तुमसे मिले अरसा हो गया। तुम्हें स्मरण होगा कि हम दोनों माध्यमिक विद्यालय में पहली बार मिले थे।

- तुम्हारे अग्रज अपने प्रिय शिष्य याने मुझे अनुजवत स्नेह देते थे, तुम तो अनुज थे ही। हममें स्पर्धा हो सकती थी अग्रज का नैकट्य पाने की किंतु इसके विपरीत हम स्नेह-सूत्र में आबद्ध हो गए।

यह नैकट्य और अधिक हो गया जब गाँधी जयंती पर हम दोनों को अग्रज से गरमागरम ताजा-ताजा डाँट का उपहार मिला, वह भी तब जब हमारी प्रस्तुतियों के बाद सभागार करतल ध्वनि से गूँजता रहा था।

वह डाँट अकारण तो नहीं थी पर सच कहूँ तो उसका अर्थ शिक्षा काल समाप्त होने के बाद दिन-ब-दिन अधिकाधिक समझ में आता रहा।

दूरभाष, चलभाष, दूरलेख और दूरवार्ता के इस काल में खतो-किताबत करना भले ही अजीब लगे, मुझे अतीत में डूबते-उतराते सुधियों की माला में शब्दों के मोती पिरोना ही भाता रहा है। बच्चों को भले ही मेरे पत्र और कागजात रद्दी का ढेर लगें, मेरे लिए तो वह सब कल से कल को जोड़ते हुए आज को जीने के माध्यम है। आज यह सब याद आने का का कारण दो अन्य मित्र बन गए हैं जिनका मानना है कि इस पटल पर साहित्यिक अधिनायकवाद और व्यक्तिगत तानाशाही को प्रश्रय दिया जा रहा है। एक कहते हैं दिन भर इंजीनियरिंग में मगज खपाने के बाद इस पटल पर आता हूँ तो मनोरंजन चाहता हूँ। वे बहुत आसानी से भूल जाते हैं कि पटल का उद्देश्य ही हिंदी भाषा व साहित्य का अध्ययन करना तथा अपनी सृजन सामर्थ्य को बढ़ाना है। उन्हें केवल एक नियम चाहिए कि कोई नियम न हो किंतु उनके अपने पटल पर विषयेतर सामग्री की प्रस्तुति उन्हें सह्य नहीं है। पटलानुशासन को भंग करने को अपना अधिकार माननेवाले इन मित्र को कोई अग्रजवत गुरु मिला होता और उसने वैसी फटकार लगाई होती जैसी हमारे अग्रज गुरु ने लगाई थी तो शायद बेहतर होता।

एक अन्य अग्रजवत सुकवि मित्र हैं। इन्हें देश के संविधान को बदलने की माँग से आरंभ कर नया दल बनाने का प्रयास करते, उम्मीदवार तय करते, उच्च प्रशासनिक पद पर रहे साहित्यकार मित्र के साथ-साथ वर्तमान नेतृत्व के प्रचार की लत है। अपने साहित्यिक अनुभव से नवोदितों को लाभ देने के स्थान पर ये उन्हें राजनैतिक दीक्षा देने हेतु तत्पर हैं। इनके पास पटल पर साहित्य चर्चा हेतु समयाभाव है किंतु राजनीति की बातों के लिए समय ही समय है। इन्हें भी पटल के उद्देश्य व नियम फूटी आँखों नहीं सुहाते। वे यह भी नहीं समझना चाहते कि नव संविधान चाहते तथा सत्ता पर बैठे लोग परस्पर विरोधी विचार रखते हैं और वे कभी एक साथ नहीं आ सकते।

आज गुरु जी बहुत याद रहे हैं। साप्ताहिक धर्मयुग में सहसंपादक होकर जाने के बाद भी वे पत्रों के माध्यम से भाषा-साहित्य सिखाते-बताते रहते थे। दो सौ से अधिक सहभागियों के इस पटल को चंद असहमतियों के कारण बंद करना तो ठीक न होगा। समय और शब्द के अनुशासन को भंग करने की प्रवृत्ति को बढ़ाकर गुरु से मिली सीख की अवमानना कर नहीं सकता। पटल के उद्देश्यों और नियमों का यथावश्यक यथाशक्ति पालन करते हुए कार्य करना ही उचित लगता है। मुझे मालूम है तुम्हें भी यही सही लगेगा क्योंकि उस दिन डाँट-प्रसाद हम दोनों ने ही पाया था, मैंने कुछ अधिक तुमने कुछ कम। पैट्रिस लुमुंबा यूनिवर्सिटी मास्को में पढ़ते समय और उसके बाद भी मेरी ही तरह तुम भी उस दिन मिली  सीख को भूल नहीं सके होगे।

तुम्हारा वर्तमान पता नहीं जानता इसलिए यह पत्र तुम तक नहीं पहुँचा सकता किंतु जिस तरह भूमि पर जल गिराकर हम सूर्य को जलांजलि दे लेते हैं, उसी तरह पटल पर पत्र रखकर तुम तक पहुँच गया मान लेता हूँ।

पटल पर पत्र है तो सदस्य पढ़ेंगे ही। उस दिन तो हम तीनों के अलावा कोई था नहीं जो गुरु जी की सीख और उसकी पृष्ठभूमि बता सके। तुम और गुरु जी से पटल की शोभा-वृद्धि हो नहीं सकी है इसलिए यह दायित्व भी मैं ही निभा देता हूँ।

उस दिन गाँधी जयंती थी, वर्ष १९६६, सेठ नन्हेंलाल घासीराम उच्चतर माध्यमिक विद्यालय होशंगाबाद का सभागार, मुख्य अतिथि श्री रामनाथ सिंह जिलाध्यक्ष, अध्यक्ष श्री गोपाल प्रसाद पाठक प्राचार्य (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त), संचालक गुरु जी। सभागार माननीय शिक्षक वृंद (सुरेंद्र कुमार मेहता, के. सी. दुबे, शंकर लाल तिवारी, जी. एस. शर्मा, पाटनकर, जी. एस. ठाकुर, अग्रवाल आदि) तथा विद्यार्थियों से खचाखच भरा हुआ था। विद्यालय के श्रेष्ठ छात्र वक्ता राधेश्याम साँकल्ले व सुषमा खंडेलवाल अध्ययन पूर्ण कर चुके थे, हम दोनों से अपेक्षा की जा रही थी कि हम जिला और संभागीय भाषण,  वादविवाद आदि प्रतियोगिताओं में विद्यालय को विजयी बना सकें। अपेक्षा का यह दबाव हम दोनों को प्रभावित कर रहा होगा, यह तब तो नहीं समझ सका था, अब अनुमान होता है। कुछ वक्ताओं के बाद तुम्हारा नाम पुकारा गया। सभी के चेहरों पर उत्सुकता थी, तुम्हारा सुदर्शन व्यक्तित्व, गुरु जी का अनुज होना तथा मेधावी होना इसका कारण था। तुम मंच पर आए, मुट्ठी में कागज जिसे तुमने खोला नहीं था, यथोचित संबोधन के बाद जैसे ही तुमने भाषण आरंभ किया जोरदार ठहाके से सभागार गूँज उठा, संभवतः तुम्हें भी कुछ भूल हो जाने का अनुमान हुआ हो,  तुमने दुबारा आरंभ किया फिर वही ठहाका, तुम हतप्रभ हुए पर हार नहीं मानी, एक पल रुककर कुछ सोचा और फिर बिना किसी भूल-चूक के बिना कागज की सहायता लिए भाषण पूर्ण किया, सभागार करतल ध्वनि से गूँज उठा।

उच्चतर माध्यमिक वर्ग के कुछ वक्ताओं के बाद मेरे नाम की घोषणा हुई। माध्यमिक वर्ग को बापू का जीवनी तथा उच्चतर माध्यमिक वर्ग को बापू के संस्मरण सुनाना थे। अंत में दोनों वर्गों से कुछ अन्य विद्यार्थी काव्य पाठ करने वाले थे। मैंने पूर्व वक्ताओं द्वारा बापू का जीवनी के कुछ अनुल्लिखित पक्षों के साथ कुछ संस्मरण, गरम दल-नरम दल के टकराव आदि की चर्चा कर एक कविता सुनाकर हुए समापन किया,  सभागार में देर तक करतल ध्वनि गूँजती रही। मुख्य अतिथि ने अपने वक्तव्य में हम दोनों की विशेष प्रशंसा की।

समारोह के पश्चात सभी से अच्छी प्रस्तुति के लिए बधाई मिल रही थी किंतु गुरु जी के चरण स्पर्श करने पर उन्होंने एक शब्द भी न कहा, मेरे मन को ठेस लगी, मैं सिर झुकाए सोचता रहा गुरु जी का आशीष क्यों नहीं मिला?,  क्या गल्ती हुई? गल्ती हुई तो इतनी तालियाँ और प्रशंसा क्यों मिली? सच कहूँ तो एक पल के लिए यह भी लगा कि तुम उनके 'अनुज' हो, तुमसे चूक हुई, तुम दो बार 'गाँधी जी का जन्मदिन' के स्थान पर 'गणेश जी का जन्मदिन' कह गए पर तीसरी बार सुधारकर पूरा भाषण प्रभावी ढँग से- दिया। शायद इसलिए गुरु जी नाराज हैं लेकिन तुम्हारी गलती के कारण मुझसे नाराज क्यों हैं? ऐसा लगा वे पक्षपात कर रहे हैं, मुझे मेरा श्रेय नहीं दे रहे। मन आहत हुआ, कुछ देर बाद सबके चले जाने पर गुरु जी बोले 'तुम दोनों से सबसे अधिक आशा थी,  तुम्हीं दोनों ने निराश किया। इसने एक नहीं दो-दो बार गलती की।'
'पर बाद सुधार भी तो ली थी' मैंने धीरे से कहा कि उनकी नाराजी कम हो।
'बाद में सुधारने से- पहले का गलत मिट जाता है क्या? टूटे धागे को जोड़ देने पर भी गाँठ तो पड़ जाती है न?'

तुमने माफी माँगी और कहा 'संजीव तो बहुत अच्छा बोले।'

गुरु जी ने तीखी निगाह से- मुझे देखा फिर कहा 'यह तो पहली बार बोल रहा था, गल्ती की फिर सुधारी पर तुम तो कई बार बोल चुके हो,  अच्छा बोलते हो फिर क्यों गलती की?'

'इसने गलती की? कब? क्या?  इसे तो सबसे अधिक तालियाँ मिलीं, ईनाम भी।' तुम्हारे मुँह से निकला।

मैं मुँह लटकाए-सिर झुकाए हाथ में पकड़े पुरस्कार को देखते हुए अपना गलती कोशिश करने पर भी समझ नहीं पा रहा था।

'ताली और ईनाम से क्या होता है? गलत तो गलत ही रहेगा। तुम्हें बापू के संस्मरण सुनाना थे तुमने जीवनी क्यों सुनाई? इतने पर भी रुके नहीं, कविता भी सुना दी। क्यों?, क्या तुम्हें पता है कितनी बड़ी गलती का है तुमने? तुम्हारे कारण ३ बच्चे तैयारी करने के बाद भी कुछ नहीं सुना सके क्योंकि अतिथियों ने जो समय दिया था, वह समाप्त हो गया था।
तुम अकेले ४ वक्ताओं का समय खा गए।

अगर तुमसे पहलेवाले वह सब सुना देते जो तुमने कहा और तुम्हें मौका न मिलता तो कैसा लगता?  क्या तुम्हारे ईनाम से उन बच्चों को अवसर न मिलने की भरपाई हो जाएगी?

मैं निरुत्तर था। तुम्हें शब्दानुशासन तोड़ने और मुझे विषयानुशासन व समयानुशासन तोड़ने के लिए प्रताड़ित कर रहे गुरु ने जो सीख दी, उसे कैसे और क्यों भुला दूँ? गुरु से घात क्यों करूँ?

समय, विषय और शब्द का अनुशासन जिन्हें स्वीकार्य न हो वे स्वीकार करें या पटल छोड़ दें। मुझे पटल भंग करना स्वीकार्य है, अनुशासन भंग करना नहीं। जिन्हें उच्छृंखलता  पसंद हो, वे स्वतंत्र पटल बना लें।

गुरु पूर्णिमा हो, न हो, गुरु जी और उनकी सीख जीवन का पाथेय बनकर मेरे साथ है,  तुम्हारे साथ भी होगी, जिन्हें यह सीख देनेवाले गुरु नहीं मिले उनके लिए अफसोस ही किया जा सकता है। गुरु-चरणों में नमन।
तुम्हारा बालमित्र

कोई टिप्पणी नहीं: