बुधवार, 20 मार्च 2019

हुरहुरे

बुरा न मानो होली है
*
भंग चढ़ाकर बताते हैं पेड़ों को शिव हरे हरे!
देख शिवहरे जी मुस्काए, खाकर गूझे खरे-खरे।।
गुझिया ले मिथिलेश मंजरी के मुँह में हँस डाल रहीं।
गीता लिए गुलाल गाल मीना के कर दे लाल रहीं।।
ले इलायचीवाले पेडे़, इला-सुमन छाया खाएँ।
अंजू-वसुधा भंग चढ़ाकर
झूम कबीरा मिल गाएँ।
भय से भागीं दूर विनीता, मुकुल खोजतीं गईं कहाँ?
आज न छोड़ूँ झट से रँग दूँ मिले माधुरी मुझे जहाँ।

संत बसंत दिख रहे, गुपचुप भाँग गटककर लोटा भर।
रंजन करें विवेक ढोल ले, शोभित नैना मटकाकर।
अमरनाथ बैला पर बैठे, पान चबाएँ लखनौआ।
राजिंदर ठेंगा दिखलाते,  उड़ा रहे हैं कनकौआ।।
अतुल दौड़ते आगे, पीछे हैं अविनाश गुलाल लिए।
इंद्र-सुरेश कबीरा गाते,  जयप्रकाश ठंडाई पिए।
राजकुमार न पीछे रसिया सुना रहे राजा को संग।
श्रीधर दाएँ झूम कबीरा, विजय नाचते लेकर चंग।
सलिल लगाए सबको टीका ले अबीर, हँस गले मिले।
स्नेह साधना नव आशा ले फले सुबह से साँझ ढले।
***
संवस

कोई टिप्पणी नहीं: