गुरुवार, 11 अक्तूबर 2018

दोहे बात की बात में

दोहा सलिला दोहे बात ही बात में * बात करी तो बात से, निकल पड़ी फिर बात बात कह रही बात से, हो न बात बेबात * बात न की तो रूठकर, फेर रही मुँह बात बात करे सोचे बिना, बेमतलब की बात * बात-बात में बढ़ गयी, अनजाने ही बात किये बात ने वार कुछ, घायल हैं ज़ज्बात * बात गले मिल बात से, बन जाती मुस्कान अधरों से झरता शहद, जैसे हो रस-खान * बात कर रही चंद्रिका, चंद्र सुन रहा मौन बात बीच में की पड़ी, डांट अधिक ज्यों नौन? * आँखों-आँखों में हुई, बिना बात ही बात कौन बताये क्यों हुई, बेमौसम बरसात? * बात हँसी जब बात सुन, खूब खिल गए फूल ए दैया! मैं क्या करूँ?, पूछ रही चुप धूल * बात न कहती बात कुछ, रही बात हर टाल बात न सुनती बात कुछ, कैसे मिटें सवाल * बात काट कर बात की, बात न माने बात बात मान ले बात जब, बढ़े नहीं तब बात * दोष न दोषी का कहे, बात मान निज दोष खर्च-खर्च घटत नहीं, बातों का अधिकोष * बात हुई कन्फ्यूज़ तो, कनबहरी कर बात 'आती हूँ' कह जा रही, बात कहे 'क्या बात' *

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