रविवार, 28 अक्तूबर 2018

दोहा सलिला

दोहा सलिला
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रहे प्रदीपा आत्म जब, तभी मिले आनंद।
सलिल न भव की फिक्र कर, सुन-गा गुरु के छंद।।
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अर्थ न होता अर्थ में, व्यर्थ अर्थ की होड़।
कर संजीव अनर्थ कुछ, घट जाए कुछ जोड़।।
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दुविधा से सुविधा मिले, रखे हाथ पर आत्म।
बैठ रहो सुख-शांति से, साथ रहे परमात्म।।
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पग उत्तर की चाह में, जा दक्षिण की ओर।
प्रत्युत्तर दे रहे हैं, मचा-मचाकर शोर।।
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जो है बाहर समझ के, व्याप्त वहीं पर आप।
समझ रहा जो नासमझ,बिन समझे कर जाप।।
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संजीव
२७-१०-२०१८
७९९९५५९६१८

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