रविवार, 28 अक्तूबर 2018

चंचरीक की याद में

सत-शिव-सुंदर सृजन-पथ,
काव्य-दीप शत बाल।
जगमोहन जग मोहकर,
खुद ही बने मिसाल।
*
आँसू बहे न एक, 
चंचरीक की याद कर।
काव्य-सृजन कर नेक, 
रसानंद का स्वाद चख।।

राम-राम कर राम से, 
न रख काम से काम।
निज मर्यादा मानिए, 
तब प्रसन्न हों राम।।

बिटिया-नारी सिया,
होती जीवन सहचरी।
सुख-दुख में रह साथ, 
बनतीं मनु की प्रेरणा।।

चंचरीक ने सीख दी, 
लेखन किया कमाल।
जगमोहन जग-मोहकर, 
खुद ही बने मिसाल।।
*
श्याम-चरित से सीख, 
करना युग-निर्माण है।
जो जीवन निष्प्राण,
उसमें फूँको प्राण मिल।।

काम करो निष्काम रह, 
कदम-कदम बढ़ नित्य।
मंजिल खुद मस्तक-तिलक
करे याद रख कृत्य।।

उस नटवर से सीख,
रास रचाना-भुलाना।
अन्यायी से जूझकर, 
पाठ न्याय का पढ़ाना।।

जैसी बहे बयार जब, 
ले खुद को तू ढाल।।
जगमोहन जग-मोहकर,
खुद ही बने मिसाल।।
*
कल्कि चरित से सीख, 
तू न भुला निज धर्म दे।
हरदम रखना याद, 
कर्म धर्म का मर्म है ।।

युग-परिवर्तन अटल है, 
पर न भुला गंतव्य।
सबका सबसे हो भला, 
साध्य यही मंतव्य।।

कण-कण में भगवान,
कंकर में शंकर बसे।
जड़-चेतन में राम, 
मान बरत इंसान तू।।

काव्य-दीप संजीव तम
हर लेता नित बाल।
जगमोहन जग-मोहकर,
खुद ही बने मिसाल।।
***
संजीव वर्मा 'सलिल'
विश्ववाणी हिंदी संस्थान 
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