सोमवार, 1 अक्तूबर 2018

एक रचना

पुरुखों!                       
तुम्हें तिलोदक अर्पित 
*
मन-प्राणों से लाड़-प्यार दे 
तुमने पाला-पोसा             
हमें न भाये मूल्य, विरासत
पिछड़ापन कह कोसा           
पश्चिम का परित्यक्त ग्रहणकर 
प्रगतिशील खुद को कह     
दिशाहीनता के नाले को   
गंगा कह जाते बह           
सेवा भूल, चाहते मेवा       
स्वार्थ
साधकर हों गर्वित
*
काया-माया साथ न देगी
छाया छोड़े हाथ
सोच न पाए, पीट रहे अब
पछता अपना माथ
थोथा चना, घना बजता है
अब समझे चिर सत्य
याद आ रहा पल-पल बचपन
लाड़ मिला जो नित्य
नाते-ममता मिली अपरिमित
करी न थी अर्जित
*
श्री-समृद्धि दी तुमने हमको
हम देते तिल-पानी
भूल विरासत दान-दया की
जोड़ रहे अभिमानी
भोग न पाते, अगिन रोगों का
देह बनी है डेरा
अपयश-अनदेखी से अाहत
मौत लगाती फेरा
खाली हाथ न फैला पाते
खुद के बैरी दर्पित
***
संजीव
१-१०-२०१८

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