बुधवार, 10 अक्तूबर 2018

निकष पर: काल है संक्रांति का

निकष पर: काल है संक्रांति का 
[पुस्तक विवरण- काल है संक्रांति का, गीत-नवगीत संग्रह, आई.एस.बी.एन. ८१-७७६-१०००-७, आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल',प्रथम संस्करण २०१६, आकार २२ से.मी. x १३.५ से.मी., आवरण बहुरंगी, पेपरबैक जैकेट सहित, पृष्ठ १२८, मूल्य जन संस्करण २००/-, सजिल्द पुस्तकालय संस्करण ३००/-, विश्ववाणी हिंदी संस्थान, समन्वय प्रकाशन, ४०१  विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, चलभाष ७९९९५५९६१८, ९४२५१८३२४४, salil.sanjiv@gmail.com]
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राकेश खंडेलवाल, कनाडा   
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जिस संक्रान्ति काल की अब तक जलती हुई प्रतीक्षायें थीं
आज समय के वृहद भाल पर वह हस्ताक्षर बन कर उभरा
नवगीतों ने नवल ताल पर किया नई लय का अन्वेषण
एक छन्द में हुआ समाहित बरस-बरस का अन्तर्वेदन
सहज शब्द में गुँथा हुआ जो भाव गूढ़, परिलक्ष हो रहा
उपन्यास जो कह न सके हैं, वह रचना में व्यक्त हो रहा
शारद की वीणा के तारों की झंकृत होती सरगम से
सजा हुआ हर वाक्य, गीत में मुक्तामणियों जैसा सँवरा
हर रस के भावों को विस्तृत करते हुये शतगुणितता में
शब्द और उत्तर दोनों ही चर्चित करते हर कविता में
एक शारदासुत के शब्दों का गर्जनस्वर और नियोजन
वाक्य-वाक्य में मंत्रोच्चारों सा परिवर्तन का आवाहन
जनमानस के मन में जितना बिखरा सा अस्पष्ट भाव था
बहते हुये सलिल-धारा में शतदल कमल बना, खिल निखरा
अलंकार के स्वर्णाभूषण, मधुर लक्षणा और व्यंजना
शब्दों की संतुलित प्रविष्टि कर, हाव-भाव से छंद गूँथना
सहज प्रवाहित काव्य सुधामय गीतों की अविरल रस धारा
जितनी बार पढो़, मन कहता एक बार फिर पढें दुबारा
इतिहासों पर रखी नींव पर नव-निर्माण नई सोचों का
नई कल्पना को यथार्थ का दिया कलेवर इसने गहरा.
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चंद्रसेन विराट, इंदौर 
                   आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' वह चमकदार हस्ताक्षर हैं जो साहित्य की कविता विधा में तो चर्चित हैं ही किंतु उससे कहीं अधिक वह सोशल मीडिया के फेसबुक आदि माध्यमों पर बहुचर्चित, बहुपठित और बहुप्रशंसित है। वे जाने-माने पिंगलशास्त्री भी हैं, और तो और उन्होंने उर्दू के पिंगलशास्त्र 'उरूज़' को भी साध लिया है। काव्य-शास्त्र में निपुण होने के अतिरिक्त वे पेशे से सिविल इंजिनियर रहे हैं। मध्य प्रदेश लोक निर्माण विभाग में कार्यपालन यंत्री के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। यही नहीं वे मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के अधिवक्ता भी रहे हैं। इसके पूर्व उनके चार ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं। यह पाँचवी कृति 'काल है संक्रांति का' गीत-नवगीत संग्रह है। 'दिव्य नर्मदा' सहित अन्य अनेक पत्रिकाओं का सफल संपादन करने के अतिरिक्त उनके खाते में कई महत्वपूर्ण ग्रंथों का संपादन अंकित है। गत तीन दशकों से वे हिंदी के जाने-माने प्रचलित और अल्प प्रचलित पुराने छंदों की खोज कर उन्हें एकत्रित कर रहे हैं और आधुनिक काल के अनुरूप परिनिष्ठित हिंदी में उनके आदर्श उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। यही उनके सारस्वत कार्य का वैशिष्ट्य है जो उन्हें लगातार चर्चित रखता आया है। फेसबुक तथा अंतरजाल के अन्य कई वेब-स्थलों पर छंद और भाषा-शिक्षण की उनकी पाठशाला / कार्यशाला में कई-कई नव उभरती प्रतिभाओं ने अपनी जमीन तलाशी है।
                   १२७ पृष्ठीय इस गीत-नवगीत संग्रह में उन्होंने अपनी ६५ गीति रचनाएँ सम्मिलित की हैं। उल्लेखनीय है कि संग्रह में किसी की भूमिका नहीं है। और तो और स्वयं कवि की ओर से भी कुछ नहीं लिखा गया है। पाठक अनुक्रम देखकर सीधे कवि की रचनाओं से साक्षात्कार करता है। यह कृतियों के प्रकाशन की जानी-मानी रूढ़ियों को तोड़ने का स्वस्थ्य उपक्रम है और स्वागत योग्य भी है। उल्लेख्य है कि उन्होंने किसी-किसी रचना के अंत में प्रयुक्त छंद, यथा पृष्ठ २९, ५६, ६३, ६५, ६७ आदि। गीत रचना को हर बार नएपन से मण्डित करने की कोशिश कवि ने की है जिसमें 'छंद' का नयापन एवं 'कहन' का नयापन स्पष्ट दिखाई देता है। सूरज उनका प्रिय प्रतीक रहा है और कई गीत सूरज को लेकर रचे गए हैं। 'काल है संक्रांति का, तुम मत थको सूरज', 'उठो सूरज! गीत गाकर , हम करें स्वागत तुम्हारा', 'जगो सूर्य आता है लेकर अच्छे दिन', 'उगना नित, हँस सूरज!', 'आओ भी सूरज!, छँट गए हैं फूट के बादल', 'उग रहे या ढल रहे तुम, कान्त प्रतिपल रहे सूरज', सूरज बबुआ चल स्कूल', 'चंद्र-मंगल नापकर हम चाहते हैं छुएँ सूरज' आदि। कविताई की नवता के साथ रचे गए ये गीत-नवगीत कवि-कथन की नवता की कोशिश के कारण कहीं-कहीं अत्यधिक यत्नज होने से सहजता को क्षति पहुँची है। इसके बावजूद छंद की बद्धता, उसका निर्वाह एवं कथ्य में नवता के कारण इन गीत रचनाओं का स्वागत होगा, ऐसा मेरा विश्वास है।
डॉ. श्याम गुप्त, लखनऊ -
                   ‘काल है संक्रांति का’ की सार्थकता का प्राकट्य मुखपृष्ठ एवं शीर्षक से ही हो जाता है| वास्तव में ही यह संक्रांति-काल है, सभी जन व वर्ग भ्रमित अवस्था में हैं| एक और अंग्रेज़ी का वर्चस्व, चमक-धमक वाली विदेशी संस्कृति दूर से सुहानी लगती है; दूसरी और हिंदी –हिंदुस्तान का, भारतीय स्व संस्कृति का प्रसार जो विदेश बसे को भी अपनी मिट्टी की और खींचता है| समन्वय ही उचित पंथ है।  सलिल जी की साहित्यिक समन्वयक दृष्टि का एक उदाहरण है- "गीत अगीत प्रगीत न जानें / अशुभ भुला शुभ को पहचानें|" सलिल जी लक्षण शास्त्री हैं| साहित्य, छंद आदि के प्रत्येक भाव, भाग-विभाग का व्यापक ज्ञान व वर्णन कृति में है| विभिन्न छंदों, मूलतः सनातन छंदों– दोहा, सोरठा, हरिगीतिका, आल्ह छंद, लोकधुनों के आधार पर नवगीत रचना दुष्कर कार्य है| वस्तुतः ये विशिष्ट नवगीत हैं, प्रायः रचे जाने वाले अस्पष्ट संदेश वाले तोड़-मरोड़कर लिखे जानेवाले नवगीत नहीं हैं| सोरठा पर आधारित एक गीत देखें- ‘आप न कहता हाल, भले रहे दिल सिसकता| / करता नहीं ख़याल, नयन कौन सा फड़कता||’ कृति की भाषा सरल, सुग्राह्य, शुद्ध खड़ीबोली हिंदी व आवश्यकतानुसार भाव-संप्रेषण हेतु देशज व बुंदेली का भी प्रयोग है- यथा ‘मिलती कायं नें ऊंची वारी/ कुरसी हमकों गुइयाँ|’ उर्दू के गज़लात्मक गीत का एक उदाहरण देखें— ‘ख़त्म करना अदावत है / बदल देना रवायत है / ज़िंदगी गर नफासत है / दीन-दुनिया सलामत है|’अधिकाँश रचनाओं में उपदेशात्मक शैली के साथ वर्णानात्मक व व्यंगात्मक शैली भी यथास्थान है | कथ्य-शैली मूलतः अभिधात्मक शब्द भाव होते हुए भी अर्थ-व्यंजना युक्त है | एक व्यंजना देखिये –‘अर्पित शब्द हार उनको / जिनमें मुस्काता रक्षाबंधन’ लक्षणा का भाव देखें– ‘राधा हो या आराधा सत शिव / उषा सदृश्य कल्पना सुंदर|’

विविध अलंकारों की छटा सर्वत्र विकिरित है –‘अनहद अक्षय अजर अमर है /अमित अभय अविजित अविनाशी |’ में अनुप्रास का सौंदर्य है| ‘प्रथा की चूनर न भाती ..’ व उनके पद सरोज में अर्पित / कुमुद कमल सम आखर मनका|’ में उपमा दर्शनीय है| ‘नेता अफसर दुर्योधन, जज वकील धृतराष्ट्र..’ में रूपक की छटा है तो ‘कुमुद कमल सम आखर मनका’ में श्लेष अलंकार है| उपदेशात्मक शैली में रसों की संभावना कम ही रहती है तथापि ओबामा आते, मिलती कायं नें, लेटा हूँ में हास्य-श्रृंगार का प्रयोग है| ‘कलश नहीं आधार बनें हम..’ में प्रतीक व ‘आखें रहते भी सूर’ व ‘पौवारह’ कहावतों के उदाहरण हैं| ‘गोदी चढ़ा उंगलियाँ थामी/ दौड़ा गिरा उठाया तत्क्षण ‘.. में चित्रमय विम्ब-विधान का सौन्दर्य दृष्टिगत है| पुस्तक आवरण के मोड़-पृष्ठ पर सलिल जी के प्रति विद्वानों की राय एवं आवरण व सज्जाकारों के चित्र, आचार्य राजशेखर की काव्य-मीमांसा का उद्धरण एवं स्वरचित दोहे भी अभिनव प्रयोग हैं| वस्तुपरक व शिल्प सौंदर्य के समन्वित दृष्टि भाव से ‘काल है संक्रांति का’ एक सफल कृति है|माँ शारदा से पहले, ब्रह्म रूप में चित्रगुप्त की वंदना भी नवीनता है | कवि की हिंदी भक्ति वंदना में भी छलकती है –‘हिंदी हो भावी जग वाणी / जय जय वीणापाणी’ |
यह कृति लगभग १४ वर्षों के लंबे अंतराल में प्रस्तुत हुई है | इस काल में कितनी विधाएँ आईं–गईं, कितनी साहित्यिक गुटबाजी रही, सलिल मौन दृष्टा की भाँति गहन दृष्टि से देखने के साथ साथ उसकी जड़ों को, विभिन्न विभागों को अपने काव्य व साहित्य-शास्त्रीय कृतित्वों से पोषण दे रहे थे, जिसका प्रतिफल है यह कृति| कितना दुष्कर है बहते सलिल को पन्ने पर रोकना उकेरना | समीक्षा लिखते समय मेरा यही भाव बनता था जिसे मैंने संक्षिप्त में काव्य-रूपी समीक्षा में इस प्रकार व्यक्त किया है-
“शब्द सा है मर्म जिसमें, अर्थ सा शुचि कर्म जिसमें | / साहित्य की शुचि साधना जो, भाव का नव धर्म जिसमें |उस सलिल को चाहता है, चार शब्दों में पिरोना ||” 
राजेंद्र वर्मा, लखनऊ- 
                   ''ये गीत शिल्प और विषय, दोनों में बेजोड़ हैं। संग्रह में लोकगीत, सोहर, हरगीतिका, आल्हा, दोहा, दोहा-सोरठा मिश्रित, सार आदि नए-पुराने छंदों में सुगठित ये गीति-रचनाएँ कलात्मक अभिव्यक्ति में सामयिक विसंगतियों और विद्रूपताओं की ख़बर लेते हुए आम आदमी की पीड़ा और उसके संघर्ष-संकल्प को जगर-मगर करती चलती हैं। नवगीत की शक्ति को पहचानकर शिल्प और वास्तु में अधिकाधिक सामंजस्य बिठाकर यथार्थवादी भूमि पर रचनाकार ने आस-पास घटित हो रहे अघट को कभी सपाट, तो कभी प्रतीकों और मिथकों के माध्यम से उद्घाटित किया है। विसंगतियों के विश्लेषण और वर्णित समस्या का समाधान प्रस्तुत करते अधिकांश गीत टटकी भाव-भंगिमा दर्शाते हैं। बिम्ब-प्रतीक, भाषा और टेक्नीक के स्तरों पर नवता का संचार करते हैं। इनमें ऐंद्रिक भाव भी हैं, पर रचनाकार तटस्थ भाव से चराचर जगत को सत्यम्-शिवम्- सुन्दरम् के वैचारिक पुष्पों से सजाता है। गीतकार ने गीतों की भाषा में अपेक्षित लय सुनिश्चित करने के लिए हिंदी-उर्दू के बोलचाल शब्दों को प्राथमिकता दी है; कहीं-कहीं भावानुसार तत्सम शब्दावली का चयन किया है। अधिकांश गीतों में लोक का पुट दिखलायी देता है जिससे पाठक को अपनापन महसूस होता है। आज हम गद्य की औपचारिक शब्दावली से गीतों की सर्जना करने में अधिक लगे हैं, जिसका परिणाम यह हो रहा है कि उनमें मार्मिकता और अपेक्षित संवेदना का स्तर नहीं आ पाता है। भोथरी संवेदनावाली कविता से हमें रोमावलि नहीं हो सकती, जबकि आज उसकी आवश्यकता है। ‘सलिल’ जी ने इसकी भरपाई की पुरज़ोर कोशिश की है जिसका हिंदी नवगीत संसार द्वारा स्वागत किया जाना चाहिए। वर्तमान संग्रह निःसंदेह नवगीत के प्रसार में अपनी सशक्त भूमिका निभा रहा है और आने वाले समय में उसका स्थान इतिहास में अवश्य लिया जाएगा, यह मेरा विश्वास है।... लोक की शक्ति को सोद्देश्य नवगीतों में ढालने हेतु ‘सलिल’ जी साधुवाद के पात्र है।''
रामदेव लाल 'विभोर' लखनऊ-

                   आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' विरचित गीत-कृति "काल है संक्रांति का" पैंसठ गीतों से सुसज्जित एक उत्तम एवं उपयोगी सर्जना है। स्वर-देव चित्रगुप्त तथा वीणापाणी वंदना से प्रारंभ कृति के गीतों का अधिकांश कथ्य नव्यता का पक्षधर है- ''नव्यता संप्रेषणों में जान भरती / गेयता संवेदनों का गान करती'' / ''सरलता-संक्षिप्तता से बात बनती / मर्मबेधकता न हो तो रार ठनती'' / ''लाक्षणिकता, भाव, रस, रूपक सलोने, बिम्ब टटकापन मिले बारात सजती'' / ''नाचता नवगीत के संग लोक का मन / ताल-लय बिन बेतुकी क्यों रहे कथनी?'' ''छंद से अनुबंध दिखता या न दिखता / किंतु बन आरोह या अवरोह पलता''-पृष्ठ १३-१४। 'काल है संक्रांति का' शीर्षक बेजोड़ गीत में सूरज को प्रतीक रूप में रख दक्षिणायन की सूर्य-दशा की दुर्दशा को एक नायाब तरीके से बिम्बित करना गीतकार की अद्भुत क्षमता का परिचायक है। गीत में आज की दशा और कतिपय उद्घोष भरी पंक्तियों में अभिव्यक्ति की जीवंतता दर्शनीय है- ''दक्षिणायन की हवाएँ कँपाती हैं हाड़ / जड़ गँवा, जड़ युवा पीढ़ी काटती है झाड़''-पृष्ठ १५ / "जनविरोधी सियासत को कब्र में दो गाड़ / झोंक दो आतंक-दहशत, तुम जलाकर भाड़"-पृष्ठ १६। कृति के गीतों में राजनीति की दुर्गति, विसंगतियों की बाढ़, हताशा, नैराश्य, वेदना, संत्रास, आतंक, आक्रोश के तेवर आदि नाना भाँति के मंज़र हैं जो प्रभावी ही नहीं, प्रेरक भी हैं। नवगीतकार ने गीतों को नव्यता का जामा पहनाते समय भारतीय वांग्मय व् परंपरा को दृष्टि में रखा है। कृति के कई गीतों में सूरज का प्रतीक है-  "चंद्र-मंगल नापकर हम चाहते हैं छुएँ सूरज" / "हनु हुआ घायल मगर वरदान तुमने दिए सूरज"-पृष्ठ ३७ / "कैद करने छवि तुम्हारी कैमरे हम भेजते हैं" / "प्रतीक्षा है उन पलों की गले तुमसे मिलें सूरज"- पृष्ठ ३८। गीतों में लक्षणा व व्यंजना शब्द-शक्तियों का वैभव भरा है। कतिपय यथार्थबोधक बिम्ब सरल व स्पष्ट शब्दों में बिना किसी लाग-लपेट के विद्यमान हैं किन्तु बहुत से गीत नए लहजे में नव्य दृष्टि के पोषक हैं। कई गीतों में पंक्तियाँ मुहावरों व लोकोक्तियों में अद्भुत ढंग से लपेटी गई हैं जिनकी चारुता श्लाघनीय हैं। नवगीत से इतर जो गीत हैं उनका काव्य-लालित्य किंचित भी कम नहीं है। उनमें भी कटाक्ष का बाँकपन है, आस व विश्वास का पिटारा है, श्रम की गरिमा है, अध्यात्म की छटा है और अनेक स्थलों पर घोर विसंगति, दशा-दुर्दशा, सन्देश व कटु-नग्न यथार्थ के सटीक बिम्ब हैं। कृति की भाषा अधिकांशत: खड़ी बोली हिंदी है,कहीं-कहीं आंचलिक शब्दों से गुरेज नहीं है। कतिपय स्थलों पर लोकगीतों की सुहानी गंध है। गीतों में सम्प्रेषणीयता गतिमान है। माधुर्य व प्रसाद गुण संपन्न गीतों में शांत रस आप्लावित है। कतिपय गीतों में श्रृंगार का प्रवेश नेताओं व धनाढ्यों पर ली गयी चुटकी के रूप में है। पूरे तौर पर यह नवगीत कृति मनोरम बन पड़ी है। आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' को इस उत्तम कृति के प्रणयन के लिए हार्दिक साधुवाद।
सुरेन्द्र सिंह पवार, जबलपुर-
                   डॉ. नामवरसिंह के अनुसार ‘‘नवगीत अपने नये रूप’ और ‘नयी वस्तु’ के कारण प्रासंगिक हो सका हैं।’’ बकौल सलिल- नवगीत में 'नव्यता संप्रेषणों में जान भरती, / गेयता संवेदनों का गान करती। / कथ्य होता, तथ्य का आधार खाँटा, / सधी गति-यति अंतरों का मान करती। / अंतरों के बाद, मुखड़ा आ विहँसता, / मिलन की मधु बंसरी, है चाह संजनी। / सरलता-संक्षिप्तता से बात बनती, / मर्म बेधकता न हो तो रार ठनती। / लाक्षणिता भाव, रस, रूपक सलोने, / बिम्ब टटकापन मिलें, बारात सजती। / नाचता नवगीत के संग, लोक का मन / ताल-लय बिन, बेतुकी क्यों रहे कथनी।।' सलिल जी के प्रतिनिधि नवगीतों के केंद्र में वह आदमी है, जो श्रमजीवी है, जो खेतों से लेकर फैक्ट्रियों तक खून-सीना बहाता हुआ मेहनत करता है, फिर भी उसकी अंतहीन जिंदगी समस्याओं से घिरी हुई हैं, उसे प्रतिदिन दाने-दाने के लिए जूझना पड़ता है। ‘मिली दिहाड़ी’ नवगीत में कवि ने अपनी कलम से एक ऐसा ही दृश्य उकेरा है - 'चाँवल-दाल किलो भर ले ले / दस रुपये की भाजी। / घासलेट का तेल लिटर भर / धनिया-मिर्ची ताजी। / तेल पाव भर फल्ली का / सिंदूर एक पुड़िया दे- / दे अमरुद पाँच का, बेटी की / न सहूँ नाराजी। / खाली जेब पसीना चूता, / अब मत रुक रे मन बेजार । / मिली दिहाड़ी, चल बाजार।।' सलिल जी के ताजे नवगीतों में प्रकृति अपने समग्र वैभव और सम्पन्न स्वरूप में मौजूद है। ...नवगीत का जो साँचा आज से ६०-६५ वर्ष पूर्व तैयार किया गया था, कुछ नवगीतकार उसी से चिपककर सीमित शब्द, लय और बिम्बात्मक सम्पदा के आधार पर केवल पुनरावृत्ति कर रहे हैं। सलिल जी जैसे नवगीतकार ही हैं, जो लीक से हटने का साहस जुटा पा रहे हैं, जो छंद को भी साध रहे हैं और बोध को भी सलिल जी के इन नवगीतों में परम्परागत मात्रिक और वर्णिक छंदों का अभिनव प्रयोग देखा गया है विशेषकर दोहा, सोरठा, हरिगीतिका, आल्हा और सवैया का। इनमें लोक से जुड़ी भाषा है, धुन है, प्रतीक हैं। इनमें चूल्हा-सिगड़ी है, बाटी-भरता-चटनी है, लैया-गजक है, तिल-गुड़ वाले लडुआ हैं, सास-बहू, ननदी-भौनाई के नजदीकी रिश्ते हैं, चीटी-धप्प, लँगड़ी, कन्नागोटी, पिट्टू, कैरम हैं, रमतूला , मेला, नौटंकी, कठपुतली हैं। ‘सुन्दरिये मुंदरिये, होय’, राय अब्दुला खान भट्टी उर्फ दुल्ला भट्टी की याद में गाये जाने वाला लोहड़ी गीत है, ईसुरी की चौकड़िया फाग पर आधारित - ‘मिलती काय ने ऊँचीवारी, कुर्सी हमखों गुंइया है’। सलिल जी के इन गीतों / नवगीतों को लय-ताल में गाया जा सकता है, ज्यादातर तीन से चार बंद के नवगीत हैं। इनमें फैलाव था विस्तार के स्थान पर कसावट है, संक्षिप्तता है। भाषा सहज है, सर्वग्राही है। सूत्रों जैसी भाषा आनंदित करती है। सलिल जी ने अपने सामाजिक स्तर, आंचलिक भाषा, उपयुक्त मिथक, मुहावरों और अहानो (लोकोक्तियों) के माध्यम से व्यक्तिगत विशिष्टाओं का परिचय देते हुए हमें अपने परिवेश से सहज साक्षात्कार कराया है, इसके लिये वे साधुवाद के पात्र हैं। ‘उम्मीदों की फसल उगाते’ और ‘उजियारे की पौ-बारा’ करते ये नवगीत नया इतिहास लिखने की कुब्बत रखते हैं।" ४० 
अमरनाथ, लखनऊ-
                   "नए अंदाज और नए कलेवर में लिखी इन रचनाओं में राजनीतिक, सामाजिक व चारित्रिक प्रदूषण को अत्यन्त सशक्त शैली में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया गया है। भूख, गरीबी, धन, धर्म, बन्दूक का आतंक, तथाकथित लोकतंत्र व स्वतंत्रता, सामाजिक रिश्तों का निरन्तर अवमूल्यन आदि विषयों पर कवि ने अपनी बेबाक कलम चलाई है। अच्छाई, शुभलक्षणों व जीवन्तता के वाहक सूर्य को विभिन्न रूपों में याद करते हुए, उससे फरियाद करते हुए कवि ने उस पर नौ कवितायें रच डाली। काल है संक्रान्ति का जो इस पुस्तक का शीर्षक भी है केवल सूर्य के उत्तरायण से दक्षिणायन अथवा दक्षिणायन से उत्तरायण परिक्रमापथ के संक्रमण का जिक्र नहीं अपितु सामाजिक संक्रान्ति को उजागर करती है- 'स्वभाषा  को  भूल, इंग्लिश से लड़ाती लाड़ / टाल दो दिग्भ्रान्ति को, तुम मत रुको सूरज। / प्राच्य पर पाश्चात्य का अब चढ़ गया है रंग / कौन किसको सम्हाले, पी रखी मद की भंग।/ शराफत को शरारत नित कर रही है तंग / मनुज-करनी देखकर है खुद नियति भी दंग। / तिमिर को लड़, जीतना, तुम मत चुको सूरज। / काल  है  संक्रांति  का, तुम मत थको सूरज।। (पृष्ठ-१६-१७) कवि ने एक तरफ बुन्देली के लोकप्रिय कवि ईसुरी के चौकड़िया फागों की तर्ज पर बुंदेली भाषा में ही नया प्रयोग किया है तो दूसरी ओर पंजाब के दुल्ला भाटी के लोहड़ी पर्व पर गाए जाने वाले लोकगीतों की तर्ज पर कविता को नया आयाम दिया है- मिलती काय नें ऊँची वारी, कुरसी हम खों गुइयाँ। / अपनी दस पीढ़ी खें लाने, हमें जोड़ रख जानें / बना लई सोने की लंका,  ठेंगे पे राम-रमैया। (मिलती काय नें-पृष्ठ-५२) तथा 'सुंदरिये मुंदरिये, होय! सब मिल कविता करिए होय। / कौन किसी का प्यारा होय, स्वार्थ सभी का न्यारा होय। (सुंदरिये मुंदरिये होय -पृष्ठ-४९) किसी जमाने की विशेष पहचान, लुप्तप्राय  बुंदेली सोहरगीत की बानगी देखें- 'ओबामा आते देश में, करो पहुनाई। / चोला बदल कें आई किरनिया, सुसमा के संगे करें कर जुराई। / ओबामा आये देश में, करो पहुनाई। (ओबामा आते -पृष्ठ-५३)' कवि केवल नवगीत में ही माहिर नही है अपितुं छांदिक गीतों पर भी उसकी पूरी पकड़ है। उनका हरिगीतिका छंद देखे- 'पहले गुना, तब ही चुना। / जिसको तजा वह था घुना। / सपना   वही  सबने बुना / जिसके लिए सिर था धुना।' (पहले गुना -पृष्ठ-६१) यह पठनीय नवगीत-गीत संकलन नए-नए बिम्ब और प्रतीक लेकर आया है। बुन्देली और सामान्य हिन्दी में रचे गए इन गीतों में न केवल ताजगी है अपितु नयापन भी है। हिन्दी, उर्दू, बुन्देली, अंग्रेजी व देशज शब्दों का प्रयोग करते हुए इसे आमजन के लिए पठनीय बनाने का प्रयास किया गया है। हिन्दीभाषा को विश्व पटल पर लाने की आकांक्षा समेटे यह ग्रंथ हिन्दी व बुन्देली पाठकों के बीच लोकप्रिय होगा, ऐसी मेरी आशा है।
डाॅ. अंसार क़म्बरी, कानपुर
                  "आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी गीत-नवगीत संग्रह ‘‘काल है संक्रांति का’’में अपनी उत्कृष्ट अनुभूति एवं उन्नत अभिव्यक्ति व्दारा काव्य का ऐसा उदात्त रूप प्रस्तुत करते हुए तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक एवं साहित्यिक परिस्थितियों को साकार कर मानव-मनोवृृत्तियों की अनेक प्रतिमायें (बिंब) चित्रित करते हैं। आत्मनिरीक्षण और शुक्ताचरण की प्रेरणा देते हुये कविवर आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है तथा नवगीत को नए आयाम दिए हैं। विचार बोझिल गद्य-कविता की शुष्कता से मुक्ति के लिये गीत एवं नवगीत मात्रिक छंद को सलिल जी ने प्रस्तुत संग्रह में बड़ी सफलता से प्रस्तुत किया हैं। उनकी भाषा भाव-सम्प्रेषण में कहीं अटकती नहीं है। उन्होंने आम बोलचाल के शब्दों को धड़ल्ले से प्रयोग करते हुये आंचलिक भाषाओं का भी समावेश किया है जो उनके गीतों का प्राण है। उनके गीत नवीन विषयों को स्वयम् में समाहित करने के उपरान्त अपनी अनुशासनबध्दता यथा- आत्माभिव्यंजकता, भाव-प्रवणता, लयात्मकता, गेयता, मधुरता एवं सम्प्रेषणीयता आदि प्रमुख तत्वों से सम्पूरित हैं अर्थात उन्होंने हिन्दी-गीत की निरंतर प्रगतिशील बहुभावीय परम्परा एवं नवीनतम विचारों के साथ गतिमान होने के बावजूद गीति-काव्य की सर्वांगीणता को पूर्णरुपेण समन्वित किया है।" ‘सलिल’ जी आदर्शवादी संचेतना के कवि हैं लेकिन यथार्थ की अभिव्यक्ति करने में भी संकोच नहीं करते। अपने गीतों में उन्होंने भारतीय परिवेश की पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक आदि विसंगतियों को सटीक रूप में चित्रित किया है। निस्संदेह, उनका काव्य-कौशल सराहनीय एवं प्रशंसनीय है। उनके गीतों में उनका समग्र व्यक्तित्व स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। 
आचार्य भागवत दुबे जबलपुर
                  " ...पाठक-मन को रिझाते ये गीत-नवगीत देश में व्याप्त गंभीर समस्याओं, बेईमानी, दोगलापन, गरीबी, भुखमरी, शोषण, भ्रष्टाचार, उग्रवाद एवं आतंक जैसी विकराल विद्रूपताओं को बहुत शिद्दत के साथ उजागर करते हुए गंभीरता की ओर अग्रसर होते हैं।...समीक्ष्य कृति में 'अच्छे दिन आने वाले' नारे एवं स्वच्छता अभियान को सटीक काव्यात्मक अभिव्यक्ति दी गयी है। 'दरक न पायें दीवारें' नामक नवगीत में सत्ता एवं विपक्ष के साथ-साथ आम नागरिकों को भी अपनी ज़िम्मेदारियों के प्रति सचेष्ट करते हुए कवि ने मनुष्यता को बचाये रखने की आशावादी अपील की है। कवि आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने वर्तमान के युगबोधी यथार्थ को ही उजागर नहीं किया अपितु अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के प्रति सुदृढ़ आस्था का परिचय भी दिया है।"
चंद्रकांता अग्निहोत्री, पंचकूला- 
शब्द, अर्थ, प्रतीक, बिंब, छंद, अलंकार जिनका अनुगमन करते हैं और जो सदा सत्य की सेवा में अनुरत हैं, ऐसे मनीषी आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल’ जी की नवीन कृति 'काल है संक्रांति का' में कवि ने कई नए प्रयोग सफलता पूर्वक किये हैंनवीन की चाह में शाश्वत मूल्यों को तिलांजलि न देकर आरंभ में ही 'वंदन'-’स्तवन’ में चित्रगुप्त प्रभु व शारदा माँ की स्तुति कर एक आध्यात्मिक यात्री की तरह वे अपने पूर्वजों का स्मरण भी करते हैं: कलश नहीं आधार बन सकें / भू हो हिंदी धाम। / सुमिर  लें पुरखों को हम आओ करें प्रणाम। समाज की विद्रूपताओं को देख कवि हृदय विचलित हो काव्य रचना करता है- ‘झोंक दो आतंक-दहशत / तुम जलाकर भाड़ / तुम मत झुको सूरज’ 'सलिल' जी की सभी रचनाएँ श्रेष्ठ हैं‘काल है संक्राति का’ का उद्घोष सभी रचनाओं में परिलक्षित होता है। उठो पाखी, संक्रांति / काल है, उठो सूरज, छुएँ सूरज, सच की अर्थी, लेटा  हूँ, मैं लडूंगा, उड़ चल हंसा, लोकतंत्र का पंछी आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। अधिकांश बिंब व प्रतीक नए व मनोहारी हैं। कवि ने अपनी भावनाओं को बहुत सुंदरता से प्रस्तुत किया हैइनकी कविताओं की मुख्य विशेषता है घोर अन्धकार में भी आशावादी होना। प्रस्तुत संग्रह हमें साहित्य के क्षेत्र में आशावादी बनाता है। यह पुस्तक अमूल्य देन  है साहित्य को। कथ्य व शिल्प की दृष्टि से सभी रचनाएं श्रेष्ठ हैं पुस्तक पठनीय ही नहीं संग्रहणीय भी है
राजेश कुमारी, देहरादून-

                   "ये  गीत-नवगीत एक बड़े कैनवस पर वैयक्तिक जीवन के आभ्यांतरिक और चयनित पक्षों को उभारते हैं, रचनाकार के आशय और अभिप्राय के बीच मुखर होकर शब्द अर्थ छवियों को विस्तार देते हैं जिनके मर्म पाठक को सोचने पर मजबूर कर देते हैं। ‘खासों में ख़ास’ रचना में कवि ने व्यंगात्मक शैली में पैसों के गुरूर पर जो आघात किया है देखते ही बनता है| ‘तुम बंदूक चलाओ तो’ आतंकवाद जैसे सामयिक मुद्दे पर कवि की कलम तीक्ष्ण हो उठती है जिसके पीछे एक लेखक, एक कवि की हुंकार है वो ललकारता है। मजदूर जो सुबह से शाम तक परिश्रम करता है अपना पसीना बहाकर  दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ कर पाता है- "चूड़ी - बिंदी दिला न पाया / रूठ न मों से प्यारी / अगली बेर पहलऊँ लेऊँ / अब तो दे मुस्का री" - मिली दिहाड़ी चल बाज़ार। अंधविश्वास, ढकोसलों,रूढ़िवादिता जैसे विषयों के विरोध और उन्मूलन हेतु रची गयी रचनाओं से भी समृद्ध है यह संग्रह|"




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