बुधवार, 10 अक्तूबर 2018

मुक्तिका

एक रचना
(१४ मात्रिक , यति ५-९)
मापनी- २१ २, २२ १ २२
*
आँख में बाकी न पानी
बुद्धि है कैसे सयानी?
.
है धरा प्यासी न भूलो
वासना, हावी न मानी

कौन है जो छोड़ देगा
स्वार्थ, होगा कौन दानी?

हैं निरुत्तर प्रश्न सारे
भूल उत्तर मौन मानी

शेष हैं नाते न रिश्ते
हो रही है खींचतानी
.
देवता भूखे रहे सो
पंडितों की मेहमानी
.
मैं रहूँ सच्चा विधाता!
तू बना देना न ज्ञानी
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संजीव, १०.१०.२०१८

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