बुधवार, 31 अक्तूबर 2018

मुक्तक

मुक्तक
शुभ कामना
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चंद्रकांता आत्मदीप्ति से, सब जग को जगमग कर दो।
दस दिश में आनंद बिखेरो,श्वास प्रदीपा हो वर दो।।
आस न बेघर हो कोई भी, केवल कृष्ण समर्पित हो-
कर कोशिश का अग्निहोत्र तुम, सलिल-धार निर्झर कर दो।।
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चित्रगुप्त का गुप्त चित्र ही श्वास-आस संचालक है।
विधि-हरि-हर का भी निर्माता, यह ही भाग्य विधाता है।।
बुधि बल लेन-देन सेवा में, है जिसका प्रावीण्य 'सलिल'-
वह कर्मठ ही सत्य अर्थ में अब 'कायस्थ' कहाता है।।
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हुआ सवेरा जगे जन्म हो, मूंदे नयन मरण होता।
साथ न कुछ भी आता-जाता, जोड़ चैन क्यों मनु खोता?
जिससे मिलना हो उस पर हँस, नेह-प्रेम वात्सल्य लुटा-
हो अशोक जग को अशोक कर, 'सलिल' न क्यों तू सुख बोता?
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​समय ग्रन्थ के एक पृष्ठ को संजीवित कर आप रहे बिंदु सिंधु में, सिंधु बिंदु में होकर नित प्रति व्याप रहे हर दिन जन्म नया होना है, रात्रि मूँदना आँख सखे! पैर धरा पर जमा, गगन छू आप सफलता नाप रहे
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