शनिवार, 26 मई 2018

साहित्य त्रिवेणी १२ - डॉ. वसुंधरा उपाध्याय -कुमाऊँ लोकगीतों में छंद

१२. कुमाऊनी लोकगीत में छंद : एक विमर्श

डाॅ0 वसुंधरा उपाध्याय
सहा. प्राध्यापक हिंदी विभाग
  एल.एस.एम.रा.स्ना.महा. पिथौरागढ़ 
भारत के अन्य भागों की तरह कुमाऊँ में लोक साहित्य की परंपरा उतनी ही पुरानी है जितनी पुरानी मानव जाति है। लोकगीत, लोक कथा, लोकोक्ति, पहेली आदि की परपंरा सनातन से मौखिक रही है। लिपिबद्ध किए जाने के कारण शिष्ट साहित्य की परपंरा हर देश में क्रमबद्ध रूप में मिलती है, लेकिन लोकसाहित्य की नहीं। लोकसाहित्य की उत्पत्ति तथा विकास की कथा बहुत रोचक है। लोकगीतों का बीज सबसे प्राचीन-पवित्र ग्रंथ ऋग्वेद में मिलता है। जिन गाथाओं का उल्लेख स्थान-स्थान पर प्राचीन साहित्य में उपलब्ध है। ये गाथाएँ लोकगीतों की पूर्व प्रतिनिधि हैं। पद्य / गीत के अर्थ में 'गाथा' शब्द का प्रयोग ऋग्वेद में अनेक स्थलों पर है।१ लोकसाहित्य की परिधि में मानव के समस्त आचार-विचार की विरासत आ जाती है। इसमें मानव का पारंपरिक रूप प्रत्यक्ष हो उठता है। इसका प्रमुख स्रोत लोक मानस होता है। इनमें संस्कार एवं परिमार्जन की चेतना कार्य नहीं करती। लौकिक-धार्मिक विश्वास, धार्मिक गाथाएँ व कथाएँ, कहावतें, पहेलियाँ आदि लोक साहित्य के अंग हैं। हम लोकवार्ता (फोक लोर) का अर्थ जन-साहित्य / ग्रामीण कहानी  नहीं, जन की वार्ता करते हैं।२
'लोक' शब्द अपनी परिसीमा में अत्यंत व्यापक और सम है। ‘यह ब्रह्म की ही तरह अनंत, अक्षर और असीम है। जीवन का प्रतीक और पर्याय है। 'लोक' की सीमा केवल ग्राम या साधारण जनता तक सीमित नहीं है। ऐसा संकीर्ण अर्थ बहुत बड़ी साहित्यिक,सामाजिक और सांस्कृतिक भूल का द्योतक है। समस्त चराचर में लोक की अलंकृति ही परम उपादेय और मांगलिक है। लोकसाहित्य का आशय है जन साहित्य। लोकसाहित्य के सुंदर रूप को जड़ विज्ञान ने कृत्रिम तथा नीरस कर डाला है। फलस्वरूप इसका आध्यात्मिक स्रोत सूखता जा रहा है। जड़ विज्ञान के कारण पंचतत्व निर्मित मानव पशु ने अपने मूल स्रोत आत्मा और संस्कृति के हिमालय का परित्याग कर पाशविकता का वरण किया है। लोक साहित्य विकृत हो चला है। लोकसाहित्य के आत्मवाद द्वारा ही बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय की परिकल्पना सम्भव है। भारतीय जीवन दर्शन में अंतर्निहित शालीन गौरव प्रिय-अप्रिय, सुख-दुख से कभी पराजित नहीं होता था। भारतीय जीवन-दर्शन ने हृदय से अपराजित होकर अविचल जीवन दृष्टि और 'अकुतोभावमय' के भाव से जीवन को ग्रहण किया है -‘सुखं वा यदि वा दुःखं, प्रियं वा यदि वाडप्रियं प्राप्तं प्राप्तं मुपासीत हृदये न पराजितः। - महाभारत शांति पर्व।२५.२६
इसीलिए वह मृत्यु की ओर से निर्भय था। जीवनरस की मादकता प्राप्त करने वाले को मृत्यु से डर कहाँ? एक लोकगीत में हृदय के समस्त उल्लास ओर घुमड़ते दर्द को दुनिया में बाँटकर, दर्द को दवा में परिणत कर विश्व के कण-कण में जीवन-रस को सहेजकर सभी प्राणियों में दीप्ति एवं तृप्ति देने की महती सदिच्छा रखने वाले लोक गीतकार की दतन्नी फूट पड़ती है-
'रसवा को भेजली भवरवां के संगियाॅ / रसवा ले अइले हो थोर
एतना ही रसवा में केकरा के बॅटबों / सगरी नगरिया  हित मोर।
लोकसाहित्य का यही मधु हमें तन्मय कर देता है। इससे हमें अलौकिक आनंद की प्राप्ति होती है। अचल अनुरक्ति मिलती है और मिलती है हमें 'जिजीविषा की अदम्य शक्ति'।३
परंपरा और प्रयोग की दृष्टि से कुमाऊँनी साहित्य को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। मौखिक और लिखित। हिमालय के उपकंठ में स्थित कुमाऊँनी बोली के उद्भव के साथ ही उसका लोक साहित्य भी परंपरित हुआ। क्षेत्रीय विस्तार की दृष्टि से वर्तमान में अल्मोड़ा, नैनीताल और पिथौरागढ़ जनपद के अंतर्गत कुमाऊँनी भाषा/बोली में प्रचलित लोकसाहित्य कुमाऊँनी लोक साहित्य कहलाता है। अन्य भारतीय लोक साहित्यों की तरह  कुमाऊँ के लोकसाहित्य का अपना विशिष्ट महत्व है। कुमाऊँनी लोक साहित्य की परंपरा प्राचीन समृद्ध और व्यापक है। यह आज तक कंठानुकंठ ‘श्रुति’ रूप में अजस्र रूप से प्रवाहित है। यहाॅं की प्रकृति जलवायु एवं विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों का यहाॅं के लोक जीवन पर अत्यंत गहरा प्रभाव पड़ा है।
कुमाऊँनी लोकसाहित्य की कई विधाओं में श्रव्य और दृश्य के गुण एक साथ हैं। कुमाऊँनी के हजयोड़ा, चाँचरी, छपेली आदि गीत प्रमुख रूप से सुने और देखे जाते हैं। लोक की अधिकांश साहित्यिक अभिव्यक्ति गेय होती है। गीत में कविता का एक स्फुट भावशाली मनोभाव दृश्य या जीवन को लेकर उसकी समस्याओं में केंद्रित हो जाता है। गीतों में माधुर्य की प्रधानता है। इसमें मानसिक स्वरूपों, सूक्ष्म मनोभावों और मनोगतियों की सुषमा व संगीत्मकता की प्रधानता है। गीतों में ध्वन्यात्मकता या नाद सौंदर्य पर रचनाकार का ध्यान केंद्रित रहता है। जिन रचनाओं में छोटी-छोटी भावनाएॅं एकरूप होकर गेय हो जाती हैं, उन्हें गीत कहते हैं। अपने लघु कलेवर में गीत पूर्ण तथा मार्मिक होता है। इसमें भावनाएँ इतनी घनीभूत हो जाती हैं कि प्रत्येक शब्द की अपनी निजी व्यंजना पाठकों तथा श्रोताओं के मन को अपनी ओर खींच लेती है। गाँव के प्रायः निरक्षर लोग नीतिशास्त्र, धर्मशास्त्र या व्यवहारिक ज्ञान पुस्तकों को पढ़कर नहीं पा सकते थे। घर-गृहस्थी के कार्यों में संलिप्ततता के कारण वे किसी विद्वान या उपदेशक के पास बैठने का समय भी न पा सकते थे। इस कमी को दूर करने के लिए वाक् द्वारा सरल शब्दों में कही गयी गूढ़ार्थ युक्त वार्ताएँ ही उनकी गुरु हैं।४
लोकगीत लोकमानस की सुख-दुखात्मक अनुभूति ही अगेय़, गेय और वाचिक लोकगीत के रूप में फूट पड़ती है। गेयता ही लोकगीत को जनसामान्य तक पहुँचाती है। लोकगीतों की प्रकृति सामाजिक है। समाज से प्राप्त और समाज के लिए अर्पित लोकगीत का मूल प्रेरक समाज है। सामाजिक प्रकृति और परिवेश के प्रभाव में लोकगीतों का सृजन होता है। अपनी रचना विधि में समाज सापेक्ष कल्पना का सार्थक हस्तक्षेप ही लोकगीत का उत्स है, जहाँ समाज की उपेक्षा का प्रश्न ही नहीं उठता। लोकगीतों का सहज विकास जीवन की व्यापक परिस्थितियों के प्रभाव के कारण हुआ है। सभी सामाजिक गतिविधियाँ, पर्व, प्रकाश, उत्साह, उछाह का प्रेरक लोकगीत ही है।
लोकगीत मूलतः सामाजिक स्थितियों का पुनर्सृजन है। सामाजिक आदर्श, नियम-संयम, जीवन-मूल्य, रीति-नीति, संस्कृति-सभ्यता के अनुरूप इसकी गूँज होती है। इस गूँज में अंतर भी होता है। विविध सामाजिक सभ्यता के आचार-विचार,  परंपराओं, परिवेश और परिप्रेक्ष्य स्तरों के अनुसार ‘यह मानवीय सुख-दुख की जमीन में उगा हुआ वह पौधा है जो निरंतर खुली धूप, ताजी हवा व स्वच्छ पानी से पुष्ट होता हुआ मानव मात्र को छाँह और फल देने वाला विशाल वट वृक्ष बन गया है। लोकगीतों का विकास प्रत्येक देश की सामाजिक सरंचना के अनुरूप होता है। सामाजिक परिवर्तन का पूरा असर लोकगीतों पर पड़ा है।
साहित्यिक दृष्टि से काव्यात्मक गुणों की अभिजात्यता के अभाव में भी इनका अपना अलग ही नैसर्गिक सौंदर्य होता है। यह लोकजीवन की धरती से स्वतः स्फूर्त जलधार की तरह उद्गमित होते है। इनमें लोकमानस का आदिम और जातीय संगीत सन्निहित रहता है। अतः, लोकभाषा अथवा बोली में लोक हृदय से प्रकृत सहज और स्वाभाविक रूप से प्रस्फुटित भावमय मौखिक और गेय उद्गार ही लोकगीत हैं। लोकगीतों में किसी प्रकार का प्रयत्नज अलंकरण एवं उक्ति वैचित्र्य नहीं होता, न ही उनमें इस रूढ़ कल्पना और दुर्बोधता होती है। ये गीत धरती से उगते हैं। प्रकृति इन्हें पल्लवित, पुष्पित और सुरभित करती है। किसी एक व्यक्ति द्वारा रचित होने पर भी इनमें निर्वैयक्तिकता होती है। लोकगीत आंचलिक संस्कृति के मुँहबोले चित्र हैं। इनमें रागात्मकता, लयात्मकता, स्वतःस्फूर्तता, अनुभूति प्रवणता, गतिशीलता, वस्तु तथ्यता व लोकमानस की सहजता मिलती है।
कुमाऊॅंनी लोकगीत हमारे समाज में अनेक अवसरों पर अलग-अलग गीत गाए जाते हैं। इनके वर्गीकरण हेतु समग्र रूप से पहचान आवश्यक है।लोक साहित्य के विद्वान अध्येताओं ने कुमाऊँनी लोकगीत के वर्गीकरण का विषयगत आधार ही अपनाया है। लोकगीतों का तात्पर्य सामान्यतः लघु कलेवर वाले मुक्तक गीतों से ही समझा जाता है।  लोकगीतों के अंतर्गत कुमाऊँ की मुक्तक गीत पद्धतियों का परिचय इस प्रकार है-
१. न्यौली
न्यौली कुमाऊँनी गीतों की एक गायन पद्धति है। न्यौली की उत्पत्ति ‘नवल’ या ‘नवेली’ शब्द से है। ‘न्यौली’ में नवेली को आलंबन मानकर या संबोधित कर गाए जानेवाले  प्रेमपरक गीतों का प्रतिपाद्य विषय श्रृंगार है।५ न्यौली में श्रृंगार की चारों स्थितियों पूर्वराग, मान, प्रवास और करूण में से प्रवास का आधिक्य है। संयोग में प्रिय-मिलन की आकुलता छेड़-छाड़, हास-परिहास, उत्कंठा, उपालंभ, सुख-कामना आदि दशाओं का चित्रण होता है। वियोग में प्रोषितपतिका की अतलस्पर्शी पीड़ा हिलोर लेती है। विरह की संपूर्ण अंतदर्शाओं-अभिलाषा, चिंता, स्मृति, गुणकथन, उद्वेग, उन्माद, प्रलाप, अश्रु व जड़ता का मार्मिक अंकन न्यौली गीतों में है।
संयोग श्रृंगार
सिल्गड़ी का / पाल चाल, कलूॅं फुल्या लाल।
छोड़ सड़ी पिछोड़ी चाल, फल्जू माया जाल।२
विप्रलंभ श्रृंगार विरह लोकगीतों का प्राण है। न्योली गीतों की नायिका प्रोषितपतिका है। प्रिय प्रवासी है-
ऊॅंचा धुरा सुको डाण, पानी की तुडुक। /  अगास बादल रिट्यो, रवे ऊॅंछी धुडुक।६४ 
सौंदर्य वर्णन
के कालि धमेली का बीच टसर को फुंद। / इसी ठसक ले हिट टुटि पड़ो छंद।६७० 
प्रेम निरूपण 
तु है जाली माता सुवा, मै है जू जोगी१७५/ काली बाकरी बन लैछ, बन की बनै छ।
कै थे कयो क्या हुन्या हो, म नही मनै छ।३३४ 
ऋतु वर्णन और बारहमासा 
अगास को दल बादल घुड़ घुड़ घुड़ कुँछ। / छिया मै नासूर है गो, सुड़ सुड़ सुट कुँछ।११५
प्रकृति वर्णन 
सर्ग भरी तारा छिया बीच में जुनु लागी। / तेरि सुवा मैलं भेटी, बाटै मे रून लागी।
अलंकार योजना 
के कालो कलेजी रंग, के कालो क्वीचन। / के दुख हलि का बल्द, के दुख मै छन।१०१२ 
२.जोड़ 
जोड़ का शाब्दिक अर्थ है योग या संधि।  अपने व्यापक अर्थ में गेयता की दृष्टि से जोड़ का तात्पर्य हुआ 'वह लय अथवा पंक्ति जो एक भाव, लय अथवा पंक्ति को दूसरे से जोड़ती है। कुमाऊँनी गीतों में ध्रुवक, टेक या स्थायी के पश्चात पल्लव, संपद या अंतरे  के रूप में आने वाली पक्तियों को जोड़ कहा जाता है। गीतों में टेक पद के पश्चात पक्तियाँ निर्मित करने की प्रक्रिया 'जोड़ मारना' कहा जाता है। जोड़ों का सिलसिला अटूट-अबाध रहता है। जोड़ अपने कलेवर व अर्थवत्ता में हिंदी के दोहा-चौपाई, उर्दू के शेर तथा अंग्रेंजी के कपलेट से समानता रखता है।६ 
जोड़ और न्यौली 
टेक के बाद गीत की पंक्तियों को जोड़ने की प्रवृत्ति के आधार पर सामान्यतः न्यौली को जोड़ लिया जाता है पर न्यौली और जोड़ में लयात्मक अंतर है। न्यौली सम मुक्तक वर्णिक छंद है और जोड़ विषय मुक्तक वर्णिक। न्यौली को लयात्मक आधार पर जोड़ में नहीं बदला जा सकता, जबकि जोड़ को बड़ी सुगमता से न्यौली में परिवर्तित किया जा सकता है।
जोड़
पाखै की दन्यार। / भूलि जूॅलो दाॅतपाटी, नि भुलूॅ अन्वार।
पाखै की दन्यार, सुवा, पाखै की दन्यार। / भूलि जूॅलो दाॅतपाॅटी, नि भूलि अनवार।
प्रेमिका जिस पर्वत शिखर पर है प्रेमी को वह पर्वत प्रांतर ही रसमय लगता है
घा काटो ओसिलो। / जै धुरा छू मेरि सुवा, ऊ धुरो रसिलो।
सौंदर्य वर्णन में कवि के उपमान इतने सहज हैं कि पाठक को कल्पना में बिंब बांधने का प्रयत्न नहीं करना पड़ता: "हेलसि को घोल। / चुव जसी मसिणि छै पुव जसी गोल।"
कुमाऊँनी लोकसाहित्य के मर्मज्ञ डाॅ0 त्रिलोचन पाण्डे, डाॅ0 केशवदत्त रूवाली, डाॅ कृष्णानंद जोशी, डाॅ0 भवानीदत्त उप्रेती, डाॅ. नारायणदत्त पालीवाल आदि विद्वानों ने जोड़ को 'भग्नौल' नाम से भी निरूपित किया है।७ लयारंभ कर बीच में गद्य प्रयोग की स्वतंत्रता लेकर गद्यांत में वह प्रारंभिक पंक्तियों की तुक पकड़ता है तथा छंदांत में सहगायक भाग लेते है:
झुमुरा की घान/  धोइनि लुकुड़ि रैगे, / खैचीयूॅं कमान, / काॅं उसा मानिख रैगे / काॅ उसे इमान। 
कुमाऊँनी के लिखित साहित्य में ‘गोर्दा’ ने जोड़ छंद का प्रयोग ६-८-६ वर्णों की यति के आधार पर किया है-
मडुवा को बालो देखुलो स्वराज्य जवै तव दुख जालो।
सानण की पाई मुलुक गारत -हजययो लड़ि लड़ि भाई।
३. चाँचरी 
'चाँचरी',चाँचरिया चाँचुड़ी शब्द संस्कृत ‘चर्चरी’ शब्द से विकसित है। जिसका अर्थ है ' नृत्य ताल समन्वित गीत'। डाॅ0 त्रिलोचन पाण्डे चाँचरी की उत्पत्ति चंचरीक से मानते है। चंचरीक की भांति वृत्ताकार घेरे में क्रमशः आगे बढ़ते हुए लोग घेरे को कम करते जाते हैं या पीछे की ओर हटते हुए और हटते हुए उसे बढ़ाते जाते हैं।८
कालिदास के विक्रमोर्वशीयम और श्री हर्ष के नाटकों में 'चर्चरी' का उल्लेख मिलता है। प्राकृत पैंगलम् में चर्चरी छंद का उल्लेख है। अपभ्रंश में जिनदत्त सूरि ने ‘चर्चरी’ की रचना की थी। हिंदी के भक्तिकालीन कवियों कबीर जायसी आदि के काव्य में भी चाँचरी का वर्णन हुआ है। जायसी ने अपने काव्य में लिखा है -'होई फाग भलि चाँचरी जोरी।' ९ 
चाँचरी नृत्यगान शैली भी है। यह मेलों में किया जानेवाला सामूहिक नृत्यगीत है। विविध उत्सवों, त्योहारों और मांगलिक अवसरों पर भी इनका आयोजन होता है। चाँचरी में वाद्ययंत्र के रूप में प्रायः हुड़का बजता है जो मुख्य गायकों द्वारा बजाया जाता है। मुख्य गायक गीत की पंक्ति गाता है, दूसरा उसे दुहराता है:
पुरूष- सुब्दारै की चेलि बसती, द्यो लागो नैनिताला। / स्त्री- रामलाल का च्याल दीवाना, ये बाटा कब आला।
चाँचरी घास काटते, लकड़ी काटते, जंगल आते-जाते, कृषि कार्य करते, पशुचारण करते एकाकी रूप से गाई जाती है। पूजा, नवरात्रि आदि के अवसर पर देवी-देवताओं के मंदिरों में भक्तिभाव से परिपूर्ण मर्यादित चाॅंचरी गाई जाती है: छमा पिनुरी का धुरा देवी छम / छमा पड़ि गो बरफ देवी छम / छमा दैण हये भग्वती देवी छमा / छमा सब की तरफ देवी छम ....
उद्दाम प्रेम एक ऐसी अवस्था होती जब प्रेमी-प्रेमिका दोनों को ही किसी भी प्रकार का बंधन स्वीकार नहीं होता, दुनिया का डर नहीं होता। प्रेमी कहता है: स्यारघाट की नंदी बाना चैजा मेरा घर, / कालि टोपी घुंगरवाली जुल्फी कैकि कंछै डर।
४. झोड़ा -ं
'झोड़ा', इवाड़ा या इवाड का मूल हिंदी 'जोड़ा' शब्द है। कुमाऊॅंनी में 'ज' ध्वनि सुगमता से 'झ' ध्वनि में परिवर्तित हो जाती है। चाँचरी की भाॅति झोड़ा भी कुमाऊॅं की प्रसिद्ध सामहिक नृत्यगान शैली है। झोड़ा' को नेपाल में 'हथज्वाड़' या 'हथजोड़ा' (बुंदेलखंड में हथजोड़ा-सं.) कहा जाता है।  देवी-देवताओं के मंदिरों में झोड़े गाये जाते हैं। इनमें दैवीय शक्ति का गुणगान कर उनके कार्यों को स्मरण किया जाता है। यह मुक्तक और प्रबंध दोनों प्रकार से गाए जाते हैं। सोमेश्वर, अल्मोड़ा और द्वाराहाट आदि क्षेत्रों में मुक्तक झोड़ा का प्रयोग होता है। पिथौरागढ़-जनपद के सोर, सीरा, मुनस्यारी, अस्कोट और चंपावत क्षेत्र में चाँचरी और झोड़ा के समान ही खेल या हथजोड़ा नृत्यगीत प्रचलित है। यह खेल भादों के महीने में गौरा-महेश्वर के आगमन, जन्मोत्सव, विवाह, विसर्जन आदि अवसरों पर आयोजित होते हैं। ''(ओहो) गोरी गंगा भागरथी को क्या भलो रेवाड़ा / (ओहो) खोलि दे माता खोलि भवानी धरम के बाड़ा / (ओहो) के लै रैछै भेट बैना म्यारा दरबारा / (ओहो) द्धी जौयां बाकरा लायूॅं त्यारा दरबारा...... खोलि दे'' 
५. छपेली 
'छपेली' का अर्थ है 'क्षेपण', 'क्षिप्र गति' या त्वरा'। इस नृत्य-गान शैली में नृत्य और गायन दोनों में क्षिप्रता रहती है। छपेली कुमाऊँनी लोकगीतों की एक मुक्तक नृत्यगान शैली है। विवाह, मेलों, उत्सवों, आदि के अवसर पर अनेक गायकों और नर्तकों द्वारा छपेली का मंचन किया जाता है। इसमें नृत्य और गायन दोनों का समावेश होने के कारण इसमें दृश्य और श्रृव्य दोनों में ही आनंद आता है। मुख्य एक गायक और एक नर्तक होता है।'बिर्ति ख्याला पानी बगौ उकाला। / तेरो-मेरो जोड़ों हुछ पगाला।' १
६. बैर 
'बैर' से तात्पर्य है द्वंद या संघर्ष। यह प्रश्नोत्तर शैली में होने वाले गीतात्मक प्रतिद्वन्द्विता है। गायकों में एक दूसरों को पराजित करने की होड़ रहती है। यह प्रश्नोत्तर शैली में होने वाले गीतात्मक प्रतिद्वन्द्विता है। अनेक अवसरों पर इस गीत शैली का प्रयोग होता है। एक गायक गीत शुरू कर प्रश्न पूछता है, दूसरा गायक उत्तर देकर प्रति प्रश्न पूछता है। यह क्रम अबाध गति से चलता है। जो गायक प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाता, हार जाता है। प्रश्न गूढ़, दुरूह, बिंबात्मक, प्रतीकात्मक तथा उक्ति वैचित्र्यपूर्ण होते हैं। इनका समापन मंगलकामना के साथ होता है। 
७. शकुनाखर/फाग 
'शकुनाखर' / 'फाग' कुमाऊँ में विभिन्न संस्कारों के अवसर पर गाये जानेवाले मंगलगीत हैं। संस्कारों से जुड़े होने के कारण इन्हें संस्कार गीत भी कहा जाता है। औद्यान (गर्भाधान), पुत्र जन्म, षष्ठी, नामकरण, व्रतबंध, विवाह आदि संस्कारों के अवसरों पर फाग और शकुनाखर गाए जाते है। धार्मिक उत्सव, देवी-देवताओं की गाथाएँ ‘फाग’ फालगुन के महीने में गाए जानेवाले गीतों से भिन्न है। अन्य प्रदेशों के सोहर, बन्ना-बन्नी, सगुन आदि गीतों की ही भाँति कुमाऊँ में कुछ शगुन गीत कुमाऊँनी भाषा में भी मिलते हैं। इन गीतों में लोक-वेद की रीति का अभूतपूर्ण समन्वय होता है। इनका प्रारंभ आकाश-पाताल, पृथ्वी आदि के देवी-देवताओं की वंदना से होता है। इनमें गणेश-पूजन, मातृ-पूजन, कलश-स्थापन आदि गीतों के साथ परिवार व उसके उसके सदस्यों-संबंधियों के प्रति मंगलकामना निहित रहती है। कामनापरक 'ओछन गीत' में गर्भिणी की स्थिति का मनोवैज्ञानिक चित्रण मिलता है। ''खै लियो बोज्यू, मनै की इछिया जो, / खै लिया बोज्यू, बासमती को भात,
उड़द की दाल, घिरत भुटारो, दाख दाड़ीमा / छोलिड-बिजौरा, कैली-कचैरी, लाखी की सीकारा।''
कन्या की विदाई पर गाए जानेवाले गीत इतने व्यथापूर्ण, करूण व हृदयद्रावक होते हैं कि श्रोता के मानस की सीपी अपने दृगद्वार खोलकर मुक्त अश्रुओं से रोती बालिका का अभिषेक करती जान पड़ती है:  ''छोडू यो छोडू यो बाली त्वीले, / धुलमाटी को खेल, छोड़या बाली माणूनी का खाजा। / किलै छोड़ि, बाली त्वीले, मायूड़ी की कोखकिलै छोड़, यो, बाबा ज्यू के घौर।।''
फाग गीतों में वाक्यांश और पद़ों की पुनरावृत्ति होती है। फाग गायन पद्धति भी है और छंद रूप भी। यह कुमाऊँनी का अर्द्धसम मुक्तक वर्णिक अतुंकात छंद है।
८.होली 
मूलतः बृजशैली का गीत 'होली' समस्त भारत में समान रूप से लोकप्रिय है। पहाड़ की होली का तो ठाठ ही निराला है। संपूर्ण कुमाऊँ में पूस के प्रथम रविवार से होली का गायन आरंभ हो जाता है। शिवरात्रि के दिन रस रंग और श्रृंगारपरक होली गायी जाती है। इससे पूर्व धार्मिक होली गायी जाती है। 'छलड़ी' के दिन सब बेलगाम हो जाते हैं। चार दिनों तक होली चलती है। होलियों का मूल स्वर श्रृंगारी है। सीता-राम, राधा-कृष्ण आदि के साथ रंग में डूबते हुये होली गीत मस्ती का समा बना देते हैं। भोलेनाथ बाबा भी अपने गणों के साथ होली खेलते नृत्य भी करते हैं। देवर-भाभी के गीत स्नेहादि की दृष्टि से मधुर है। 'तू करिले अपनो ब्याह देवर हमरो भरोसो झन करिये। / मैलै बुलाये एकलो हो एकले। / तू ल्याये जन चार देवर हमरो भरोसोझन करिये।''
कहीं किसी गोरी के रस भरे, मद भरे नैनों में रम जाने की कामना करती होली की बात ही निराली है- 'अच्छा हाँ, गोरी नैना तुमारे रसा भरे। / कहो तो ये रमि जाय गोरी नैना तुम्हारे रसा भरे।''
होली वसंतोत्सव की श्रेष्ठ-सशक्त लोक परंपरा है। यह फाल्गुनी रंगों में मानव-मन की उल्लास और उन्मादमयी चिरंतन अभिव्यक्ति है। होली के बाद एक दूसरे घर जा जाकर सारे परिवारी जनों के प्रति मंगलकामनाएँ प्रकट की जाती है और अगली फाल्गुन में फिर मिलेंगे ऐसी आकांक्षा भी प्रकट की जाती है। ''आज की होली न्हेगैछ / फागुन ऊॅंलो कैगैछ / गावै खौले देवे असीस हो हो होलकारे / बरस दीवाली बरसै फाग हो हो होलकारे / जोनर जीवे खेलें फाग हो हो होलकारे / आजक बसंत कैका घरा, हो हो होलकारे / जीरौ लाख नरीस हो हो होलकारे'' 'बैठकी होली' शास्त्रीय संगीत के मूलभूत रागों को लेकर गाई जाती है।
९. बालगीत: 
कुमाऊँ में बालगीतों की संख्या बहुत कम है। जब माँ बच्चे को सुलाती है, तब कुमाऊँनी स्त्रियाँ यह गीत गाती हैं-  'हल्लोरी बाला हल्लोरी / तेरी इजा पालुरी का घास जै रैछ / चुचि भरि ल्याली, चाड़े मारि ल्याली / चुचि खाप लालै / चड़ि खेल लगालै / हल्लोरी बाला हल्लोरी' 
स्त्रियाँ बच्चों को खिलाते समय अपने पावों पर बैठाकर पीठ के बल लेटकर मुड़े हुए घुटनों को ऊपर उठाते हुए प्रश्नोत्तर शैली में ‘‘घुगति बासूति’’ नामक गीत गाया जाता हैती हैं- 'घुघुति बासूति, आॅम काॅ छड़ भाड़ में छ। / कि करनैछ खाट हाल नैछ / कि लालि खाट लालि / को खाल दिदि खालि मामा खाल..... / नै नै नै मैं खूल''
ये बालगीत समाप्ति के कगार पर हैं। शहरी अपसंस्कृति ग्राम्य संस्कृति का भक्षण कर रही है। आजकल उत्सवों में भौंडे फिल्मी गीतों पर थिरकने का चलन है। लोग अपनी संस्कृति, अपनी पहचान भुला रहे हैं। कुछ पुराने, लोग जिन्हें शहर का पानी नहीं लगा है, अपनी धरोहर से प्रेम है इन गीतों को गाते-गुनगुनाते हैं। यही हाल रहा तो धीरे-धीरे गीतों की गायन परंपरा किताबों में ही सिमटकर रह जाएगी। स्वतंत्रता के बाद शासकीय, संस्थागत स्तर पर आकाशवाणी दूरदर्शन, अन्य संचार माध्यम, विदेशों में आयोजित लोकगीतों के प्रचार-प्रसार में सांस्कृतिक आदान-प्रदान तथा अर्थोपार्जन हुआ है किंतु समस्याओं का अंत नहीं हुआ।  लोकगीत के अस्तित्व एवं भविष्य का संकट तभी समाप्त हो सकता है जब ऊपरी चमक-दमक से बचे। हमें निष्ठा से अपनी आने वाली सन्तंति को समझाना होगा कि यह लोकगीत ही हमारी भारतीय संस्कृति की धरोहर है। इन्हें सहेजकर रखना होगा नही तो यह धीरे-धीरे लुप्त हो जाएगी।
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संदर्भ ग्रंथ: १. डा.श्रीराम शर्मा, लोक साहित्य: स्वरूप और मूल्यांकन पृ.१-ं२, २. डा. सुधाकर तिवारी, हिंदी लोक साहित्य में प्रकृति  पृ. ५२, ३. उक्त २ पृ. ५३, ४. उक्त २  पृ. ६३,  ५. डॉ. त्रिलोचन पांडे, कुमाऊॅं का लोक-साहित्य पृ. ९४,  ६. पुरवासी: रामलीला स्मारिका १९९०, पर्वतीय अंक, जोड़ और जोड्यूण एक वृहद रचना प्रक्रिया, जगदीश जोशी का लेख पृ.सं. २६-ं२७, ७. डॉ. देवसिंह पोखरिया: कुमाऊॅंनी भाषा साहित्य एवं संस्कृति पृ.३१, ८. कुमाऊॅं का लोक साहित्य पृ.८७, ९. जायसी ग्रंथावली पृ. १२०, १०. कुमाऊॅंनी भाषा साहित्य एवं संस्कृति: देवसिंह पोखरिया पृ. ४६।
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