बुधवार, 30 मई 2018

doha


दोहा सलिला
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सुमन सु-मन ले गंध दे, महके सारा बाग़।
बारिश हो या गर्मियां, गंध न देता त्याग।।
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अथक सफ़रकर थक गए, यदि न उठ रहे पैर।
तो समझो मंजिल निकट, माँगो सबकी खैर।।
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​​पीछे मुड़ क्या देखना?, देखें आगे राह।
क्या जाने हो किस घड़ी, पूरी मन की चाह ।।
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समय गया कब?, क्या पता?, हाथ न आया वक्त ।
फिर मिल तो दूँगा सबक, तुझे सख्त कमबख्त। ।
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कोरी जीवन स्लेट थी, अब न जगह है शेष।
पाठ सभी बाकी रहे, कैसे लिखूँ अशेष?
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३०.५.२०१८, ०७९९९५५९६१८
​salil.sanjiv@gmail.com

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