शनिवार, 12 मई 2018

दोहा सलिला

दोहा सलिला:
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अनिल अनल भू नभ 'सलिल', पंचतत्वमय सृष्टि। 
मनुज शत्रु बन स्वयं का, मिटा रहा खो दृष्टि
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'सलिल' न हो तो किस तरह, हो निर्जीव सजीव?
पंचतत्व संतुलित रख, हो शतदल राजीव
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जीवन चक्र चला सलिल, बरसे बह हो भाप। 
चक्र रोककर सोचिए, जी पाएँगे आप?
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सलिल न तो मरुथल जगत, मिटे किस तरह प्यास? 
हास न होगी अधर पर, शेष न होगी आस
अगर चाहते आप हो, सकल सृष्टि संजीव। 
स्वच्छ सलिल-धारा रखें, खुश हों करुणासींव।  
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