मंगलवार, 8 मई 2018

दोहांतरण

आज की कार्य शाला:
कविता का दोहांतरण  
निःशब्द आहट (कविता )
















वीणा विज 'उदित'
लाहौर में जन्मी वीना मैनी, प्रारम्भिक शिक्षा कटनी मध्यप्रदेश, स्नाकोत्तर शिक्षा जबलपुर विश्वविद्यालय से ,।एम् एड में विश्व विद्यालीय स्वर्ण -पदक। भरत-नाट्यम नृत्य व नाटकों में गहन अभिरुचि, अनेक ईनाम। नैशनल कैडेट कोर में सीनियर मोस्ट अंडर आफीसर, मध्य प्रदेश का प्रतिनिधित्व, श्रेष्ठ कैडेट। विवाहोपरांत वीना विज, १९८३ दूरदर्शन व आकाशवाणी जालंधर से जुडी। कटनी में बाड्सले स्कूल एवं जालंधर में एपीजे स्कूल में अध्यापन।सन् २००० तक ढेरों नाटकों टेली–फिल्मों, धारावाहिकों व कई पंजाबी फिल्मों में अभिनय। स्टार-प्लस व लिश्कारा चैनलों पर भी स्टार बेस्ट सैलर और ५२ किश्तों का धारावाहिक ‘वापसी’ किया, लेखन भी। आकाशवाणी जालंधर से कविता-पाठ। सन् २००३ ह्यूस्टन टेक्सास (यूं एस) कवि-सम्मेलन में वाहवाही।
*
शैवालों से घिरा हृदय ऊहापोह में
नैराश्य के भँवर में डोल रहा
संवेदनाएं संघर्षरत उभरने को
अन्तर् -आंदोलित मथित छटपटाहट -।
आते हैं चले जाते हैं भाव-ज्वार
हालात नहीं कलम उठा करूँ अभिव्यक्त
कब मिला आसमां ज़मीं को मेरी
अव्यक्त रहने की बोझिल उकताहट -।
बो दिए हैं दरीचों में रिसते ख्वाब
पढ़ेगा कौन शब्द ,होकर आत्मसात
दरारों में छिपी व्यथा- गाथा ज़मीं की
विह्वल हो उठी लख बेचैन अकुलाहट -।
हर दीवार इक अक्स छाप देती
इक इबारत हर सूँ नज़र आती
शरद वरद हस्त उड़ेलता शब्द विन्यास
ज्यूं कमल में भ्रमर की उद्वेलित झटपटाहट-।
रह जातीं त्वरित भाव-व्यंजनाएँ अधूरी
मौलिक विचारों की निर्वात कविताएं नहीं पूरी
अन्तस की गहन अनुभूतियाँ हो मुखर
सुनतीं हृदय व्यथा कथा की निःशब्द आहट-।।
*७.५.२०१८*
दोहांतरण












दोहांतरणकर्ता: संजीव 
*
उहापोह में घिर ह्रदय, शैवालों के बीच। 
डोल निराशा भँवर में, रहा आस नव सीच।।
संघर्षित संवेदना, चाहे पुन: उभार।
अंतर आंदोलित-मथित, रहा छटपटा ज्वार।। 
पा न सकी मन की जमीं, नभ; ऐसी अभिशप्त?
कलम उठा कैसे करे, मनोभाव अभिव्यक्त?
रह अव्यक्त उकता रही, बैठ दरीचा खोल। 
आत्मसात कर पढ़ेगा, शब्द कौन? कुछ बोल।।
व्यथा-कथा चुप जमीं की, विव्हल-अकुला खीझ।    
देख रही दीवार हर, अक्स छापती रीझ।। 
हर सूं आती है नज़र, एक इबारत ख़ास। 
शरद वरद कर उड़ेले, रचे शब्द-विन्यास।। 

उद्वेलित छटपटाता, भ्रमर कमल में कैद।  
भाव-व्यंजना अधूरी, त्वरित रहीं नापैद।।
मौलिक चिंतन बिन हुईं, कविताएँ निर्वात। 
अंतर की अनुभूतियाँ, गहन मुखर जज्बात।।
व्यथा-कथा सुन ह्रदय की, बिन आहात हैं मौन। 
वीणा गुंजित तार बिन, संजीवित सुर कौन?
*८.५.२०१८*  

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