शनिवार, 19 मई 2018

साहित्य त्रिवेणी १: डॉ. इला घोष -वैदिक एवं लौकिक संस्कृत में प्रयुक्त छन्द-एक परिचय

१. वैदिक एवं लौकिक संस्कृत में प्रयुक्त छंद-एक परिचय
-डाॅ. श्रीमती इला घोष
*
यह सम्पूर्ण सृष्टि छंदोमयी है। प्रत्येक तत्त्व की रूप-रचना, गति और स्थिति एक विशेष छंद, लय और ताल से होती है। नदियाँ जब कल-कल करती बहती हैं, तब एक छंदोमय मधुर ध्वनि की सृष्टि करती हैं। नदी की छोटी-बड़ी लहरों का उठना गिरना भी छंदायित होता है। वायु के बहने, निर्झर के झरने, मेघों के बरसने, पुष्प के खिलने, पंछी के उड़ने, भौंरों के गुनगुनाने और कोयल के कूकने में भी एक छंद होता है, एक आरोह-अवरोह, गुरु-लघु का एक क्रम ताल और लय की निश्चित अन्विति या संगति। सभी कलाएँ, चाहे वह काव्य कला हो अथवा संगीत, नृत्य, चित्र, भास्कर्य आदि सृष्टि के इस छंद का अनुसरण कर ही आनंद की सृष्टि कर पाती हैं। श्रेष्ठ कला साधक या सर्जक वह होता है जो इस नैसर्गिक छंद को अपनी रचना में रूपायित कर पाता है।कला के आस्वाद और कला-सर्जन दोनों के लिये छंद ज्ञान आवश्यक है। जहाँ छंद है, वहाँ श्री, सौंदर्य या शोभा है। साथ ही आनंद और मंगल भी।
=कोश एवं साहित्य में ‘छंद’ शब्द के कई अर्थ प्राप्त होते हैं- आच्छादन, निवेदन अर्पण, इच्छा, प्रसादन तथा पद्य रचना के लिये प्रयुक्त वृत्त (छंद)। अनेक अर्थों के होते हुये भी यह शब्द काव्य के छंद (वर्णों की निश्चित संख्या, यति और गति की विशिष्ट व्यवस्था) के अर्थ में रूढ़ हो गया है। छंद शब्द की व्युत्पत्ति दो प्रकार से की गई है-
=प्रथम-आच्छादन अर्थ वाली ‘छदि’ धातु से- छंद रस या भावों को आच्छादित (आवृत) करते है, अतः, छंद कहे जाते हैं- 'यदस्मा आच्छादयंस्तस्माच्छन्दांसि।' १ आचार्य यास्क भी छंद का निर्वचन इसी अर्थ में करते हैं- छंदांसि छादनात्।२ कवि काव्य के रस भाव या वर्ण्य विषय को छंद के आवरण में संतुलित, व्यवस्थित एवं संरक्षित कर प्रस्तुत करता है। छंद उन रस आदि को बिखरने से बचाते हैं।
=द्वितीय- आह्लादन अर्थ वाली ‘चन्द्’ धातु से। ‘छंद’ कवि, पाठक, भावक, श्रोता सभी को आनंदित करते हैं। विश्व का प्रथम काव्य ‘ऋग्वेद’ छंदोंमय है। सभी वेदमंत्र छंदबद्ध हैं। अतः, संपूर्ण वेद को ही ‘छंद’३ या ‘छंदस्’४ कहा गया है। ये मंत्र/स्तोत्र देवताओं को आनंद देेते थे।
ऋषि और देवता के मध्य संयोग के माध्यम छंद ही थे। अतः, वेदमंत्रों के अध्ययन-अध्यापन, जप-होम आदि के प्रसंग में ऋषि और देवता के साथ छंद का ज्ञान भी अनिवार्य माना गया था।५
छंदों के इस महत्त्व के कारण इसकी गणना षड्वेदागें में की गई तथा इसे वेद-पुरुष का पाद (चरण) कहा गया- छंद: पादौ तु वेदस्य।६
जिस प्रकार पुरुष की गति और स्थिति पादों से होती है। उसी प्रकार वेदों की गति और स्थिति का आधार छंद ही है। छंद संबंधी प्राचीनतम उल्लेख ऋग्वेद में प्राप्त होता है। ‘पुरुषसूक्त’ में छंद की उत्पत्ति सृष्टि की उत्पत्ति के साथ ही विराट् पुरुष से कही गई है- 'छंदांसि जज्ञिरे तस्मात्।७
छंद की प्रथम परिभाषा भी ऋग्वेद में प्राप्त होती है। तदनुसार छंद अक्षरों की निश्चित संख्या के द्वारा वाक् को पादों में परिमित करते हैं- 'वाकेन वाकं द्विपदा चतुष्पदाऽक्षरेण मिमते सप्तवाणी।८
कात्यायन ने सर्वानुक्रमणी में छंद को इसी रूप में परिभाषित किया है- यदक्षरपरिमाणं तच्छंद:।
अर्थात अक्षरों की निश्चित संख्या के अनुसार (पद्य) रचना ही छंद है। इसी आधार पर यास्क ने पद्य को ‘मिताक्षर’ और गद्य को अमिताक्षर ग्रंथ (रचना) कहा है।९
वैदिक संस्कृत तथा लौकिक संस्कृत के आधार पर छंदों के दो वर्ग हैं-
१. वैदिक छंद तथा २. लौकिक छंद ।
वैदिक छंद - अक्षर-गणना पर आधारित होने के कारण वैदिक छंद ‘अक्षर छंद’ कहे जा सकते हैं। अक्षर से अभिप्राय स्वर वर्ण से हैं। अक्षरों की संख्या प्रत्येक चरण में एक से लेकर छब्बीस तक हो सकती है। इस दृष्टि से ये छंद २६ हैं।
इन्हें तीन वर्गों में रखा गया है।
(१) गायत्रीपूर्व पाँच छंद- गायत्री छंद के पहले के पाँच छंद ऋक् प्रतिशाख्य(१७/१७) के अनुसार इनके नाम और अक्षर संख्या इस प्रकार है-
मा (प्रत्येक चरण में एक, कुल अक्षर संख्या चार)
प्रमा (प्रत्येक चरण में दो, कुल अक्षर संख्या आठ)
प्रतिमा (प्रत्येक चरण में तीन, कुल अक्षर संख्या बारह)
उपमा (प्रत्येक चरण में चार, कुल अक्षर संख्या सोलह)
समा (प्रत्येक चरण में पाँच, कुल अक्षर संख्या बीस)
भरत के नाट्य शास्त्र (१५/४३-४४) में इनके नाम क्रमशः उक्त, अत्युक्त, मध्यम, प्रतिष्ठा तथा सुप्रतिष्ठा कहे गये हैं।
(२) प्रथम सप्तक के सात छंद-
गायत्री (प्रत्येक चरण में छह अक्षर, कुल अक्षर संख्या चैबीस)
उष्णिक् (प्रत्येक चरण में सात अक्षर, कुल अक्षर संख्या अट्ठाईस)
अनुष्टुप् (प्रत्येक चरण में आठ अक्षर, कुल अक्षर संख्या बत्तीस)
बृहती (प्रत्येक चरण में नौ अक्षर, कुल अक्षर संख्या छत्तीस)
पंक्ति (प्रत्येक चरण में दस अक्षर, कुल अक्षर संख्या चालीस)
त्रिष्टुप् (प्रत्येक चरण में ग्यारह अक्षर, कुल अक्षर संख्या चवालीस)
जगती (प्रत्येक चरण में बारह अक्षर, कुल अक्षर संख्या अड़तालीस)
ये वेदों के बहु प्रयुक्त प्रसिद्ध छंद हैं। इनमें अक्षरों की संख्या उत्तरोत्तर चार (प्रत्येक चरण में एक) बढ़ती जाती है।१०
(३) द्वितीय सप्तक के सात छंद-
इन्हें ‘अतिछंद’ भी कहा गया है। इनके नाम एवं अक्षर संख्या इस प्रकार हैं-
अतिजगती (१३ x ४ = ५२ अक्षर)
शक्वरी (१४ x ४ = ५६ अक्षर)
अतिशक्वरी (१५ x ४ =६० अक्षर)
अष्टि (१६ x ४ = ६४ अक्षर)
अत्यष्टि (१७ x ४ =६८ अक्षर)
धृति (१८ x ४ =७२ अक्षर)
अतिधृति (१९ x ४ =७६ अक्षर)
४) तृतीय सप्तक के सात छन्द-
कृति (२० x ४ =८० अक्षर)
प्रकृति (२१ x ४ =८४ अक्षर)
आकृति (२२ x ४ = ८८ अक्षर)
विकृति (२३ x ४ = ९२ अक्षर)
संस्कृति (२४ x ४ = ९६ अक्षर)
अभिकृति (२५ x ४ = १०० अक्षर)
उत्कृति (२६ x ४ = १०४ अक्षर)
यद्यपि यहाँ वैदिक छंदों की कुल अक्षर संख्या चार चरणों के आधार पर गिनी गई है किंतु उल्लेखनीय यह है कि इन में से कई छंदों में पाद संबंधी कोई निश्चित नियम नहीं है उदाहरण के लिये ऋग्वेद में त्रिपदा गायत्री का प्रयोग अधिक है यथा प्रथम मण्डल के प्रथम सूक्त में-
अट्ठग्निमी“डे पुट्ठरोहि“तं यट्ठज्ञस्य“ देट्ठवमृत्विज“म्। होता“रं रत्नट्ठधात“मम्।। यहाँ आठ-आठ अक्षरों के तीन पाद हैं।
गायत्री छंद में एक से लेकर पाँच तक पाद पाये जाते हैं। अक्षर संख्या भी न्यूनाधिक हो सकती है। इसके आधार पर गायत्री के कई भेद हो जाते हैं।
इसी प्रकार त्रिपाद उष्णिक् (ऋग्वेद ७/६६/१६, ५/५३/५) और त्रिपाद अनुष्टुप् (ऋग्वेद ३/२५/४, ७/२२/४) भी पाये जाते हैं। अत्याष्टि और धृति सात पादों में तथा अतिधृति आठ पादों (ऋग्वेद १/१२७/६) में भी देखे जाते है।
लौकिक छंद- लौकिक संस्कृत के छंदों का विकास वैदिक छंदों से ही हुआ है। श्रुति माधुर्य तथा संगीतमय आरोह अवरोह या लय की दृष्टि से लौकिक छंदों में अक्षरों, तथा पादों की निश्चित संख्या के साथ ही वर्णों के गुरु-लघु क्रम को भी निर्धारित कर दिया गया है। लौकिक छंद के आद्य प्रयोक्ता महर्षि वाल्मीकि माने गये हैं तथा उनके मुख से निःसृत-‘मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वती समाः।’११
यह पद्य प्रथम लौकिक छंद है। महाकवि भवभूति ने इनके इस ‘अनुष्टुप्’ को छंद का नूतन अवतार कहा है।१२ नूतन अवतार से अभिप्राय पूर्व में विद्यमान (वैदिक) छंद की नवीन रूप में प्रस्तुति से है।
लौकिक छंदों के दो प्रमुख भेद हैं-
१. जाति या मात्रिक छंद- इनमें चरणों की व्यवस्था मात्राओं की संख्या के आधार पर होती है। जाति का सबसे प्रचलित छंद ‘आर्या’ है। आर्या के भी पथ्या, विपुला, चपला, गीति, उद्गीति आदि नौ अवान्तर भेद होते हैं। गोवर्धन कवि की ‘आर्यासप्तशती’ (सात सौ आर्यायें) आर्या छंद का सर्वाेत्तम उदाहरण है। (इस विरासत को ग्रहण कर हिंदी में दोहा सतसई प्रकाशन की परंपरा का सूत्रपात हुआ- सं.)
मात्रिक छंद के अन्य भेदों में वैतालीय, औपछान्दसिक, मात्रासमक आदि आते हैं।
२. वृत्त या वर्णिक छंद- इसके प्रत्येक पाद में वर्णों की गणना की जाती है। इन वर्णों का क्रम गणों से निर्धारित होता है। प्रत्येक गण में तीन वर्ण होते हैं। गण आठ हैं, जो लघु-गुरु के निश्चत क्रम के सूचक हैं। जैसे- नगण - ।।। (तीनों वर्ण लघु), मगण - ऽऽऽ (तीनों वर्ण गुरु), भगण - ऽ।। (गुरु, लघु, लघु) आदि।
लौकिक छंदों में अक्षरों की संख्या वैदिक छंदों के अनुरूप है। गण (गुरु-लघु) व्यवस्था लौकिक छंदों की अपनी विशेषता है। ‘अनुष्टुप्’ को छोड़कर अन्य छंदों के नाम भी नये हैं। ये नाम प्रायः नैसर्गिक तत्त्वों, परिदृश्यों, पुष्प, वनस्पति, पशु-पक्षियों की गतिविधि आदि से लिये गये हैं, जैसे-पुष्पिताग्रा, मालिनी, स्रग्धरा विद्युन्माला, वसंततिलका, शिखरिणी, भुजंगप्रयात, भ्रमर विलसितम्, जलधरमाला, मत्तमयूरी, हरिणी, शार्दूलविक्रीडित, आदि। वैदिक छंदों में जहाँ पादों की संख्या निश्चित नहीं है वहीं लौकिक छंदों में पादों की संख्या सुनिश्चित (चार) है।
वर्णिक छंद के तीन वर्ग हैं-
(१) समवृत्त - इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, वंशस्थ, वसन्ततिलका, मालिनी, मन्दाक्रान्ता आदि।
(२) अर्द्धसमवृत्त - अपरवक्त्र, पुष्पिताग्रा, वियोगिनी आदि।
(३) विषमवृत्त - उद्गता, गाथा एवं उपजाति के कतिपय भेद।
वैदिक एवं लौकिक छंदों के प्रस्तार योग से तेरह करोड़ चालीस लाख सत्रह हजार सात सौ छब्बीस भेद हो सकते हैं।१३ आचार्य राजशेखर छंदों को काव्यपुरुष के रोम (रोमाणि छन्दांसि)१४ कहकर छन्दों के इस असंख्येय परिमाण को ही द्योतित करते हैं। छंदों का विवेचन जिस शास्त्र में हुआ, उसे ‘छन्दोविचिति’१५ कहा गया है अर्थात् छन्दों की वि-विशेष रूप से चिति-चयन या संग्रह करने वाला शास्त्र। ‘छंदोऽनुशासन’ ‘छंदोविवृति’, ‘छंदोमान’ आदि इसके अन्य नाम है।
वैदिक और लौकिक छंदों का प्रसिद्ध ग्रंथ आचार्य पिंगल रचित ‘छंद:सूत्र’ है। परवर्ती ग्रंथों में जयदेव का जयदेवच्छंद: (१० वीं श.), जयकीर्ति का छंदोंऽनुशासनम् (१० वीं श.) केदारभट्ट का वृत्तरत्नाकर(११ वीं श.) क्षेमेंद्र का सुवृत्ततिलक (११वीं श.) हेमचन्द्र का छंदोंऽनुशासनम् (११ वीं श.), गंगादास की छ्न्दोमंजरी (१४ वीं श.), कवि राजशेखरभट्ट का वृत्तमौक्तिक (१६ वी श.) आदि प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त अन्य शास्त्रों में भी आनुषग्कि रूप से छंदोविवेचन हुआ है यथा ऋक्प्रातिशाख्य, सर्वानुक्रमणी, नाट्यशास्त्र (अध्याय-१५.१६) तथा अग्निपुराण(अ.३२८-३३५) आदि में। वैदिक साहित्य और लौकिक साहित्य दोनों के ज्ञान के लिये ही छंदशास्त्र एक अनिवार्य उपयोगी विद्या मानी गई है।
आचार्य क्षेमेंद्र के अनुसार जैसे सज्जनों की शोभा सुवृत्त (अच्छे आचरण) से होती है उसी प्रकार प्रबंध (काव्य) की शोभा भी सुवृत्त (छंदों) से होती है- 'सुवृत्तैरेव शोभन्ते प्रबन्धाः सज्जना इव।'१६
उनके अनुसार उत्तम कवि को विषय-वस्तु, रस एवं भाव के अनुरूप छंदों का चयन करना चाहिये।१७
शास्त्र में अर्थ की स्पष्टता एवं प्रसाद गुण के लिये अनुष्टुप् छंद का प्रयोग किया जाना चाहिये। इसी प्रकार शास्त्र काव्य (धर्म-अर्थ आदि पुरुषार्थों का निरूपण करने वाले काव्य) में दीर्घ वृत्तों की योजना उचित नहीं है। उपदेश प्रधान रचनायें भी अनुष्टुप् में होनी चाहिये। सर्गबंध (महाकाव्य) के प्रारंभ में, कथा के विस्तार में, शांत रस के प्रसंग में अनुष्टुप् का उपयोग ही प्रशंसनीय होता है-
'आरंभे सर्गबंधस्य कथाविस्तारसङ्ग्रहे।
शमोपदेशवृत्तान्ते संत: शंसन्त्यनुष्टुभम्।।१८
श्रृंगार रस में- आलंबन विभाव, नायिका के सौंदर्य वर्णन, वसंत आदि के वर्णन में उपजाति छंद; विशेष काव्य सौंदर्य की सृष्टि करता है। षाड्गुण्य युक्त नीति (राजनय) के वर्णन में वंशस्थ की विशेष शोभा होती है। वीर और रौद्र रस के सटर (मिश्रण) में वसंततिलका, वर्षा-प्रवास-वियोग-आदि के वर्णन में मंदाकांता, राजाओं की शौर्य स्तुति में शार्दूल-विक्रीडित, पवन के वेगादि वर्णन में स्रग्धरा वृत्त का प्रयोग किया जाना चाहिये। यद्यपि महाकवि अपनी रचनाओं में प्रसंगानुकूल नाना छन्दों का प्रयोग करते हैं फिर भी संस्कृत-काव्य जगत् में कुछ कवि अपने विशिष्ट छंद प्रयोगों के लिये जाने जाते हैं जैसे- पाणिनि ‘उपजाति’ के लिये, महाकवि कालिदास ‘मंदाकांता’ के लिये, भारवि ‘वंशस्थ’ के लिये, भवभूति ‘शिखरिणी’ के लिये, रत्नाकर ‘वसंततिलका’ के लिये तथा राजशेखर ‘शार्दूलविक्रीडित’ के लिये प्रसिद्ध हैं।
केवल काव्य-बोध, काव्यपाठ और काव्य रचना के लिये ही छंद ज्ञान आवश्यक नहीं था, अपितु नाट्य प्रयोग और अभिनय के लिये भी छंद ज्ञान आवश्यक माना गया है, क्योंकि छंद वाचिक अभिनय (वाणी से किया जाने वाला पाठ्य(जमगज) का अभिनय, स्वरों का उतार-चढ़ाव, तार-मंद्र, द्रुत-विलंबित आदि) के महत्त्वपूर्ण अंग हैं। आचार्य भरत के अनुसार छंद शब्द के तनु (शरीर) हैं, शब्द और छंद मिलकर ही नाट्य प्रयोग को चरम उत्कर्ष पर पहुँचाते हैं ।१९
छंद ही वाक् को गेय बनाते हैं। यही कारण है कि साममंत्रों के उद्गाता को विशेष रूप से ‘छंदोंगः’ कहा जाता था। वेदाग् के रूप में तो छंदों का अध्ययन किया ही जाता था, स्वतंत्र शास्त्र या कला के नाते भी छंदों का ज्ञान अर्जित किया जाता था। प्राचीन भारत की चैंसठ कलाओं में ‘छंदोंज्ञान’ को भी एक कला के रूप में परिगणित किया गया था।२०
यद्यपि मान्य अवधारणा के अनुसार पद्य में ही छंदों की योजना मानी जाती है किन्तु सत्य यह है कि प्रत्येक सार्थक शब्द लघु-गुरु की एक विशिष्ट लय से युक्त होता है। अतः, ऋग्यजुष् के परिशिष्ट में कात्यायन मुनि कहते हैं- 'छंदोंभूतमिदं सर्वं वाड्मयं स्याद् विजानतः।'
अर्थात यह सम्पूर्ण वाङ्मय ही ‘छंदमय’ है। छंद के कलेवर या शरीर में ही वाग् मूर्त होती है। इस छंदमय शरीर में ही काव्य की आत्मा ‘रस’ की सत्ता होती है। छंद के इस मर्म और महत्त्व को समझते हुये ही भरत मुनि ने कहा है- 'छंदोंहीनो न शब्दोऽस्ति।२१ ऐसा कोई शब्द नहीं है जो छंद से रहित हो।
छंदज्ञान मनुष्य को लयबद्ध मनोरम वाणी के प्रयोग की क्षमता तो प्रदान करता ही है, जीवन में भी एक लय, सामंजस्य और सौन्दर्य की सृष्टि करता है।
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१. शतपथ ब्राह्मण- ८.५.२.१, २. निरुक्त- ७.३, ३. निरुक्त- १.१, ४. अष्टाध्यायी- ६.४.७५, ७.१.८७.१.८, ७.१.१०, ५. बृहद्देवता- ८.१३७, ६. पाणिनीयशिक्षा- ४१, ७. ऋग्वेद- १०.१२१.९, ८. ऋग्वेद- १.१६४.२४, ९. निरुक्त- १.३.९, १०. सप्तछन्दांसि चतुरुत्तराणि। अथर्ववेद ८.९.१९,
११. रामायण- १.२.१५, १२. उत्तररामचरितम् - अंक २, १३.. नाट्यशास्त्र- १५.७७-७८, १४. काव्य मीमांसा- अध्याय ३, १५. काव्यमीमांसा- अध्याय ३, सुवृत्ततिलक-३.६, १६. सुवृत्ततिलकम्- ३.१२, १७. सुवृत्ततिलकम्- ३.७, १८. सुवृत्ततिलकम्- ३.१६, १९.. नानावृत्तनिष्पन्ना शब्दस्यैषा तनुः स्मृता। / एवं तूभयसंयोगो नाट्यस्योद्योतकः स्मृतः।। नाट्यशास्त्र- १५.४२, २०. कामसूत्र- १.३.१५, .२१. नाट्यशास्त्र- १६.४१
संपर्क: -डाॅ. श्रीमती इला घोष, २१ आदित्य काॅलोनी, नर्मदा रोड, जबलपुर (म.प्र.)

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