सोमवार, 28 मई 2018

घनाक्षरी

चित्र पर रचना

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छंद: कवित्त, घनाक्षरी. मनहरण
विधान: वर्ण ८,८,८,७  पदांत गुरु
* श्रीधर प्रसाद द्विवेदी
कंचन वरण अंग वसन सपीत रंग, कंचन के आभरण सोह अंग अंग हैं।
बेंदीसँग बेसरकी संगति लावण्यमयी,  कंचन के कंकण नगीने बहु रंग हैं।
श्रवण समीप लोल कुण्डल सुडौल गोल, सौम्य मुख- मंडल भी नम्र कवि दंग हैं।
प्रतिमा सौन्दर्य की आ बैठी है साकार रूप, अथवा सलज्ज रति, पति जो अनंग हैं ।।
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* संजीव वर्मा 'सलिल' 
रूपसी है अप्सरा है, या उषा पीतांबरा है, रति पति देखके, लजाई-मुस्कुराई है?  
हरिद्रा ने हरिद्रा के, गात हरिद्रा मली या, माखन-मलाई ढली, रूप की लुनाई है?
चाह-दाह है अथाह, बाँह में लिए पनाह, आह-वाह हाथ जोड़, करे पहुनाई है
अपने के सपने ने, दिन में भी रात करी, कोई और देख न ले, पलकें झुकाई है।।
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