रविवार, 20 मई 2018

मुक्तिका: जिंदगी की इमारत

जिंदगी की इमारत में,  नींव हो विश्वास की।
प्रयासों की दिवालें हों,  छत्र हों नव आस की।
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बीम संयम की सुदृढ़,  मजबूत  कॉलम नियम के।
करें प्रबलीकरण रिश्ते, खिड़कियाँ हों हास की।।
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कर तराई प्रेम से नित, छपाई कर नीति से।
ध्यान  धरना दरारें बिलकुल न हों संत्रास की।।
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रेत कसरत, गिट्टियाँ शिक्षा, कला सीमेंट हो।
फर्श श्रम का,  मोगरा सी गंध हो वातास की।।
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उजाला शुभकामना का,  द्वार हो सद्भाव का।
हौसला विद्युतिकरण हो, रौशनी सुमिठास की।।
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फेंसिंग व्यायाम, लिंटल मित्रता के हों 'सलिल'।
बालकनियाँ पड़ोसी अपनत्व के अहसास की।।
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वरांडे हो मित्र, स्नानागार सलिला सरोवर।
पाकशाला तृप्ति, पूजास्थली हो सन्यास की।।
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7999559618, 9425183244
salil.sanjiv@gmail.com

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