शुक्रवार, 4 मई 2018

दोहा शतक: २ छाया सक्सेना

दोहा शतक: २ छाया सक्सेना

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जय जय जय माँ शारदे!, कमलासनी कृपाल।
वेद-ज्ञान वरदायिनी, वर दे करो निहाल।।
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रोजी-रोटी ने किया, तन-मन से मजबूत।
नित श्रम कर हम बन गए,  ईश्वर के नव दूत।।
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मंगल ही मंगल करे, मंगल जन्मे आन।
परम भक्त  सिय-राम के, श्री बलवंत सुजान।।
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सीखा जब  भी जतन से, हुआ बहुत  उपहास।
सहज हास-परिहास कर, जीत गया अहसास।।
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शारद के वरदान ही,  मिटा सके अज्ञान।
सच; अभिमंत्रित मंत्र हैं, वेदपाठ  अभि ज्ञान।।
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हरियाली पाकर धरा, हुई धन्य-धनवान।
मुस्काता नित खेत में, हो किसान बलवान।।
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रमीं रमा हरि सहित ही, प्रमुदित जगत सदैव।
कंचन-कोष कुबेर का, धारण करते दैव।।
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गुलशन-गुलशन गुल खिले, कर गुलशन गुलज़ार ।
अतिथि आगमन भ्रमर का, करे कली सत्कार।।
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चैत महीना बौर का, बासंती  वरदान।
नव कोंपल पुलकित हुईं, पीत वसन परिधान।।
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पवन सुगंधित बौर से, सुरभित श्यामल शाम।
बागों की रौनक बना, फल का राजा आम।।
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हरे-भरे वन-वृक्ष हों, वसुधा पर भरपूर।
गर्मी के अहसास से, होंगे तब सब दूर।।
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अपनों कि अनुभूति तब, होती सबसे खास।
हो जाते जब दूर वे, लगते तब ही पास।।
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कोयल कूकी बाग में, जाग गया विश्वास।
आम-पना से न्यून हो, गर्मी का आभास।।
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गुणवानों का सभी जन, करें सदा सम्मान।
नेक कर्म-ईमान से, लें सज्जन-पहचान।।
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बादल बरसे झूमकर, ओले नाचे साथ।
बिन मौसम बरसात से, पंछी हुए अनाथ।।
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दर्द लेखनी में दिखा, आँखों में कुछ और।
मन की भाषा पढ़ सकें, काश छंद के ठौर।।
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चाँद -चाँदनी मिल गले, बना रहे इतिहास।
तारों के भुज-हार से, हो पूरी मन-आस।।
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दीवारों के कान हैं,  सोच -समझ कर  बोल।
मृदु वाणी वरदान है, जीवन में रस घोल।।
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भुत बात कर; कर रहे, अच्छे दिन बेकार।
काम-काज को गति मिले, तब होगा उद्धार।।
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किससे कैसे कब कहूँ, क्यों मन बोझिल-खिन्न।
समझ नहीं प्रिय पा रहे, काँव-कूक क्यों भिन्न।।
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धरती माँ की गोद में, सीता हुईं विलुप्त।
अवधपुरी का भाग्य 'प्रभु', तुरत हो गया सुप्त।।
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हरियाली होती अगर, धरती पर चहुँ ओर।
मुस्काते मानव सभी, स्वर्णिम  होती भोर।।
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धरा धरा ने धैर्य 'प्रभु', है अधीर निरुपाय।
त्याग कीटनाशक मनुज, प्रकृति न हो असहाय।।
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क्लोरो-फ्लोरो कार्बन, प्रचुर रसायन खाद।
डाल धरित्री को करें, धरा-पुत्र बरबाद।।
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धरती सूखी सूखता, नयनों का भी नीर।
बिन मौसम बरसात से, नहीं मिटेगी पीर।।
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धरती से आकाश तक, फैली तन चहुँ ओर।
बड़ी-बड़ी अट्टालिका, डरती-रुकती भोर।।
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तारे धरती पर उतर, करें नई शुरुआत।
बिन माँगे मोती मिले, तब तो कुछ है बात।।
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राधे- राधे रट रहे, मोहन कृष्ण मुरारि।
राधा जप; बाधा  मिटे, कहते पालनहारि।।
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राहें होती हैं कई, मंजिल केवल एक।
विद्या-बुद्धि-प्रयास से, वरें सफलता नेक।।
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कड़वा सच मत बोलिए, कहें मधुरता घोल।
बिन वृक्ष जी सकेगी,  धरा न; पीटें ढोल।।
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क्या सच है; क्या झूठ है?, भला बताए कौन?
जनगण-मन बेचैन क्यों?, नेता हैं क्यों मौन??
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किसने किससे क्या कहा, सुन ले आज सुजान!
भले-बुरे को 'प्रभु' परख, करा सत्य का भान।।
समझाते हैं लोग सब, दीवारों के कान।
बात अगर है भेद की, मत बनिए अनजान।।  ०
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राम-सिया जिस उर बसे, वह कब हुआ अधीर?
भक्ति करो हनुमत सदृश, पवनपुत्र बलवीर।।
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नारी ही नारायणी, सृजन-जगत आधार।
प्रेम-भाव धीरज धरे, चला रही परिवार।।
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अभिशापित हो जी रहे, देखो कैसे लोग।
सच्चाई से दूर हो, सतत बढ़ाते रोग।।
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अहं, मान-सम्मान से, बड़ा जगत में प्यार।
स्वार्थ-भाव को त्यागिए, व्यर्थ जीत या हार।।
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ज्ञानवान बनकर कभी, करें नहीं अभिमान।
प्रेम-भाव जग जीतते, तब बढ़ जाता मान।।
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जीते जी सत्कर्म कर, मानव बने महान।
जीता जो सबके लिए, पूजे उसे जहान।।
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मन में धीरज धारते, बनते बिगड़े कर्म।
नेक भाव मन में रखें,  यह सच्चा है मर्म।।
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जनगण अब जल का करे, सीमित ही उपयोग।
स्वच्छ रहें जल स्त्रोत यदि, गंदा करें न लोग।।
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जल को जीवन जानिए, जल के बिना न जीव।
धरती-जल जब सूखता, कैसे जिएँ सजीव।।
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मानव-मन की थाह को, जान सका है कौन?
काम क्रोध मद लोभ से, पीड़ित जग रो मौन।।
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बच्चों में रच-बस गया, एक सुखद संसार ।
अधिक न माता-पिता से, कोई करता प्यार।।
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कोयल कूक न पा रही, कागा करे न काँव।
गाँव, शहर जैसे हुए, कहाँ मिले अब छाँव।।
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स्नेह, आस-विश्वास की, पूँजी जिसके पास।
वही जगत में आपका, होता सबसे खास।।
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सदाचार-सत्कर्म से, बढ़ता बुद्धि-विवेक।
यदि विचार उत्तम नहीं, कैसे हों हम नेक।।
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छल से छल-छल छलकता, छलिया बनता वीर।
छला गया छलकर अबस, छल के हाथ अधीर।।
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मन के मनके जोड़कर, माला गूँथी एक।
तन-तन मन-मन के हुए, चरों तं-मन नेक।।
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भूल करो मत भूल से, भुला न देना भूल।
भूल अगर हो जाए तो, तनिक न देना तूल।।
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करने को कुछ खास जब, नहीं हमारे पास।
कथ्य-दृश्य; ब्रश-भाव हो, छंद बने कनवास।।
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