मंगलवार, 29 मई 2018

साहित्य त्रिवेणी ८ अरुण कुमार निगम -छतीसगढ़ी भाषा में छंद की विकास यात्रा

८. छत्तीसगढ़ी भाषा में छंद की विकास यात्रा
अरुण कुमार निगम
परिचय: जन्म ४.८.१९५६ दुर्ग, छत्तीसगढ़। आत्मज: स्व. सुशीला-स्व. कोदूराम “दलित”। जीवन संगिनी: श्रीमती सपना निगम। लेखन विधा: छत्तीसगढ़ी व हिंदी में छंद, कविता, गीत , बाल गीत, गजल, प्रकाशित: शब्द गठरिया बाँध (हिंदी छंद संग्रह) , छंद के छ ( छत्तीसगढ़ी छंद संग्रह, विधान सहित) , चैत की चंदनिया (हिंदी कविता-गीत संग्रह), संप्रति: से. नि. मुख्य प्रबंधक भारतीय स्टेट बैंक, संपर्क: एच. आई. जी. १/२४ , आदित्य नगर, दुर्ग ४९१००१, चलभाष: ८३१९९ १५१६८, ९९०७१ ७४३३४, ई मेल: arun.nigam56@gmail.com।
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मान्यता है कि विश्व की प्रथम कविता महाकवि वाल्मीकि के मुख से प्रणयरत क्रौंच पक्षी का वध देखकर अनुष्टुप छंद के रूप में जन्मी थी। छत्तीसगढ़ में भी मान्यता है कि वाल्मीकि का आश्रम ग्राम तुरतुरिया में स्थित था, अतः छत्तीसगढ़ की माटी में ही छंद ने जन्म लिया। लोक मान्यता है कि महाकवि कालिदास ने अपने अमर महाकाव्य मेघदूत की रचना छत्तीसगढ़ के सरगुजा स्थित रामगिरि पर्वत पर की थी। इसी पर्वत पर विश्व की प्रथम नाट्यशाला होने के प्रमाण हैं। भारतीय छंदों का विधान पंडित जगन्नाथ प्रसाद भानु के ग्रंथ 'छंद प्रभाकर' में मिलता है। यह भारत में हिंदी छंद विधान का प्रामाणिक ग्रंथ मान्य है। इस प्रकार छंदों से छत्तीसगढ़ का गहरा संबंध है। विद्वानों द्वारा छत्तीसगढ़ी में काव्य सृजन का प्रारंभ लगभग एक हजार वर्ष पुराना है किंतु प्राचीन काल का लिखित साहित्य बहुत ही कम उपलब्ध है, तथापि वाचिक परंपरा से वर्तमान तक पहुँचा है । डॉ. नरेंद्र वर्मा ने छत्तीसगढ़ी साहित्य के इन एक हजार वर्षों को तीन युगों में बाँटा है- सन् १००० से सन् १५०० तक गाथा युग, सन् १५०० से सन् १९०० तक भक्ति युग और सन् १९०० से आज तक आधुनिक युग। गाथा युग से अहिमन गाथा, केवला गाथा, फूलबासन गाथा, पंडवानी आदि हैं। भक्ति युग में कबीरदास जी के शिष्य धरमदास को छत्तीसगढ़ी का आदिकवि माना गया है। पंडित जगन्नाथप्रसाद भानु, पंडित सुंदरलाल शर्मा , नरसिंह दास, शुकलाल प्रसाद पांडेय, कपिलनाथ मिश्रा, कपिलनाथ कश्यप आदि कवियों से लेकर जनकवि कोदूराम 'दलित' तक छत्तीसगढ़ी में छंद पल्लवित-पुष्पित होता रहा। छत्तीसगढ़ी में कुछ कवियों ने छंद को आधार मानकर रचनाएँ कीं तो बहुतेरे कवियों ने लय को आधार मान कर गीत लिखे जो संयोग से कुछ छंदों के विधान के अनुरूप बन गए। छत्तीसगढ़ के छंद्कारों की कुछ छंदबद्ध रचनाएँ –
कवि धरमदास
कोई लादै काँसा पीतल, कोई लौंग सुपारी॥
हम तो लाद्यो नाम धनी को, पूरन खेप हमारी॥ -सार छंद
पंडित सुंदरलाल शर्मा
खरिका में लरिका लिए, देखेंव नंदकिशोर
चरखा सरिखा तभिच ले, गिंजरत हे मन मोर।। -दोहा
सुनत बात मुसकान मोहन| हम फोकट कहवैया नोहन।।
केरा जाँघ नख्ख हे मोती| कहौ बाँचिहौं कोनो कोती।।
कँवल बरोबर हाथ देखाथै| छाती हँड़ुला सोन लजाथै।।
बोड़री समुंद हवै पँड़की गर| कुँदरु होंठ दाँत दरमी-थर।। -चौपाई
दिन रात मोला हइरान करै। दुखदाई ये दाई जवानी जरै।।
मैं गोई अब कोन उपाय करौं। के कहूँ दहरा बिच बूड़ मरौं।। -त्रोटक छन्द
जन्मांध कवि नरसिंह दास (ग्राम घिवरा बिलासपुर में १९२७ में जन्म) ने सवैया, कवित्त, दोहे, चौपाई आदि रचे।
साँप के कुंडल कंकण साँप के साँप जनेऊ रहे लपटाई
साँप के हार हे साँप लपेटे, है साँप के पाग जटा शिर छाई।।
नरसिंह दास देखो सखि रे, बर बाउर हे बेला चढ़ि आई।
कोऊ सखी कहे कइसे हे छी:, कुछ ढंग नहीं सीख हावे छी: दाई।। -सवैया
शुकलाल प्रसाद पाण्डे
मुरछा ले झट जाग के, दुनों पुरुल पोटार
कलप कलप रोये लगिस, साहुन हर बम्फार।। -दोहा
मोर कन्हैया अउ बलदाऊ मोर राम अउ लछिमन।
मोर अभागन के मुँहपोंछन, मोर परान रतन धन।। -चौबोला
जब ले मिलगै ओ लमगोड़ी। मोर मोल होगे दू कौड़ी।।
मया दया भुरिया के सरगै। सबो प्रीति आगी मा जरगै।। -चौपाई
१७१७ ई. में जन्मे गिरिधर कविराय के बाद कुण्डलिया छंद लुप्त सा हो गया था। हिंदी में कुण्डलिया लिखनेवालों का अकाल सा हो गया था। १९वीं सदी के आसपास पठान सुल्तान, जुल्फिकार खाँ, पंडित अम्बिकादत्त व्यास, बाबा सुमेर सिंह, भारतेंदु हरिश्चन्द्र आदि कवियों ने सुप्रसिद्ध कवियों के दोहा के भाव को विस्तार देते हुए रोला छंद जोड़कर कुण्डलिया लिखीं किंतु उनका अपना योगदान रोला के रूप में ही रहा। तत्पश्चात हास्य कवि काका हाथरसी ने छः पदों की कविताएँ की और बहुत मशहूर हुए किन्तु वे कुण्डलिया नहीं बल्कि काका की फुलझड़ियाँ के नाम से प्रसिद्ध हुईं। उनकी छ: पदीय फुलझड़ियाँ देखने-सुनने में कुण्डलिया की तरह थीं किन्तु कुण्डलिया का विधान उनमें नहीं था। मई सन् १९६७ में छत्तीसगढ़ के जनकवि कोदूराम 'दलित' का कुण्डलिया छन्दों का संग्रह ,सियानी गोठ, छत्तीसगढ़ी भाषा में प्रकाशित हुआ। लोकोपयोगी विषय वस्तु के कारण यह कुण्डलिया संग्रह छत्तीसगढ़ी साहित्य में मील का पत्थर साबित हुआ और दलित जी को छत्तीसगढ़ का गिरिधर कविराय माना गया। गिरधर कविराय अपनी नीतिपरक कुण्डलिया के लिए प्रसिद्ध हैं तो कोदूराम दलित जी के कुण्डलिया छन्दों में नीति के अलावा भारत के नव निर्माण, सरकारी योजना, विज्ञान, हास्य-व्यंग्य, देश-प्रेम, छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति जैसे अनेक रंगों के दर्शन होते हैं। दलित जी के नीतिपरक कुण्डलिया -
कतरनी अउ सूजी
काटय - छाँटय कतरनी, सूजी सीयत जाय
सहय अनादर कतरनी , सूजी आदर पाय
सूजी आदर पाय , रखय दरजी पगड़ी मां
अउर कतरनी ला चपकय वो गोड़ तरी-मां
फल पाथयँ उन वइसन, जइसन करथयँ करनी
सूजी सीयय, काटत - छाँटत जाय कतरनी।
दलित जी ने सामाजिक बुराई, छत्तीसगढ़ की गरिमा और आहार की महिमा औद्योगिक तीर्थ भिलाई को कुण्डलिया की विषय वस्तु बनाया। साठ के दशक में हमारा देश निर्माण की प्रक्रिया से गुजर रहा था। उस अवधि में सरकारी योजनाओं को सफल करने हेतु परिवार नियोजन पँचसाला योजना पर कुण्डलिया लिखीं। लोकतंत्र में वोट की महत्ता और चुनाव के प्रक्रिया बताते दलित जी ने कुण्डलिया 'वोट और राजा' शीर्षक से लिखीं। लोकतंत्र में प्रिंट मीडिया का भारी महत्व है। अखबार की भूमिका के लिए उनके विचार 'पेपर' नामक कुण्डलिया में देखे जा सकते हैं। मार्च १९१० को दुर्ग जिले के ग्राम टिकरी में जन्मे कवि कोदूराम 'दलित' जी प्रगतिशील विचारधारा के थे और हर किसम के परिवर्तन को स्वीकार करते थे। विज्ञान के समर्थन में विज्ञान, अणु, बिजली को विषय वस्तु बनाकर कुण्डलिया लिखीं | दलित जी कवि सम्मेलन के मंच में हास्य व्यंग्य के कवि के रूप में विख्यात थे । उनके कुण्डलिया छंदों में शिष्ट हास्य भी देखने को मिलता है -
खटारा साइकिल -
अरे खटारा साइकिल, निच्चट गए बुढ़ाय
बेचे बर ले जाव तो, कोन्हों नहीं बिसाय
कोन्हों नहीं बिसाय, खियागें सब पुरजा मन
सुधरइया मन घलो हार खागें सब्बो झन
लगिस जंग अउ उड़िस रंग, सिकुड़िस तन सारा
पुरगे मूँड़ा तोर, साइकिल अरे खटारा।।
जनकवि कोदूराम 'दलित' जी के काव्य में कुण्डलिया के अलावा दोहा, रोला, सोरठा, उल्लाला, सार, सरसी, चौपई, चौपाई, ताटंक, कुकुभ, लावणी, श्रृंगार, पद्धरि, पद पादाकुलक, घनाक्षरी आदि छंद होते थे। उनके समकालीन कवियों में इतने छंदों में छत्तीसगढ़ी रचनाएँ देखने में नहीं आईं। दलित जी के बाद सत्तर के दशक में गायक-गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया के गीतों में भी दोहा, घनाक्षरी, आल्हा, सवैया आदि छंद देखने में आए। उनके लय आधारित गीत छंदों के विधान के करीब हैं। मस्तुरिया जी के खंड काव्य 'सोनाखान के आगी' के बहुत से पद आल्हा छंद के समान हैं। सन् १९६७ में दलित जी के निधन के पश्चात छत्तीसगढ़ी में छंदबद्ध रचनाएँ लगभग शून्य सी हो गईं। सन् २०१५ में दलित जी के सुपुत्र अरुण कुमार निगम ने छत्तीसगढ़ी में 'छंद के छ' किताब में लगभग पचास छंदों का विधान छत्तीसगढ़ी भाषा में सोदाहरण समझाया। सन् २०१६ से वाट्सएप पर 'छंद के छ' नाम से ही ऑनलाइन कक्षाओं द्वारा अरुण कुमार निगम तथा नवागढ़ (बेमेतरा) के कवि रमेश कुमार सिंह चौहान छत्तीसगढ़ में छंद लेखन के गुर सिखा रहे हैं। सन् २०१५ में अरुण कुमार निगम की पुस्तक 'छन्द के छ' तथा रमेश कुमार सिंह चौहान के तीन छंद संग्रह आए। आँखी रहिके अंधरा(कुण्डलिया), दोहा के रंग जी में दोहा के अतिरिक्त सिंहावलोकनी दोहा, दोहा गीत, दोहा ददरिया, दोहा मुक्तक आदि तथा सन् २०१७ में 'छंद चालीसा' में चालीस छंद विधान सहित संग्रहित हैं | सन् २०१६ में बिलासपुर के कवि बुधराम यादव की दोहा सतसई ';चकमक चिनगारी भरे'; प्रकाशित हुई जिसमें ७०७ छत्तीसगढ़ी दोहे संग्रहित हैं। वर्ष २०१८में ग्राम हथबंद के कवि चोवाराम वर्मा “बादल” के छंद संग्रह “छंद बिरवा” में विभिन्न छंद विधान सहित दिए गए हैं | छंद के छ की ऑनलाइन कक्षाओं में साधनारत कविगण दोहा, सोरठा, रोला, कुण्डलिया, छप्पय, अमृत ध्वनि, सार, सरसी, आल्हा, ताटंक, कुकुभ, लावणी, रूपमाला, विष्णुपद, शंकर, शोभन, उल्लाला, उल्लाल, गीतिका, हरिगीतिका, महाभुजंग प्रयात, शक्ति, विधाता, बरवै, कज्जल, घनाक्षरी, चौपाई, चौपई, त्रिभंगी, सवैया छंद में भुजंगप्रयात, बागीश्वरी, मंदारमाला, सर्वगामी, आभार, गंगोदक, सुमुखी, मुक्ताहरा, वाम, लवंगलता, मदिरा, मत्तगयन्द, चकोर, किरीट, अरसात, मोद, दुर्मिल, सुंदरी, अरविन्द, सुखी सवैया आदि छंद सीख और लिख रहे हैं | इन सभी छंदों का संग्रह “छंद खजाना” नामक ब्लॉग में है, जिसे गूगल पर पढ़ा जा सकता है |
वर्तमान दौर के कविगण शकुन्तला शर्मा, सूर्यकांत गुप्ता, हेमलाल साहू, चोवाराम वर्मा ';बादल', श्रीमती आशा देशमुख, श्रीमती वसंती वर्मा, कन्हैया लाल साहू “अमित” , गजानंद गजानंद पात्रे, अतनु जोगी, सुखन जोगी, जीतेंद्र वर्मा खैरझिटिया, अजय अमृतांशु, मोहन लाल वर्मा, सुखदेव सिंह अहिलेश्वर 'अँजोर', ज्ञानुदास मानिकपुरी, रश्मि रामेश्वर गुप्ता, दुर्गाशंकर इजारदार,बलराम चंद्राकर, मोहान कुमार निषाद, राजेश निषाद, ललित साहू “जखमी”, संतोष फरिकार,जगदीश साहू, कौशल कुमार साहू, पोखन जायसवाल, आशा आजाद , श्रीमती ज्योति गभेल, श्रीमती नीलम जायसवाल, मथुरा प्रसाद वर्मा, बोधन राम निषादराज, पुरुषोत्तम ठेठवार, ईश्वरलाल साहू, कुलदीप सिन्हा. गुमान प्रसाद साहू, दीनदयाल टंडन, बालक दास, महेंद्र देवांगन माटी, राजकिशोर धीरही, राम कुमार साहू, राम कुमार चंद्रवंशी, सुरेश पैगवार, हेमंत कुमार मानिकपुरी \ स्थानाभाव के कारन इन सबकी प्रतिनिधि छंदबद्ध कविताएँ यहाँ दे पाना संभव नहीं है |
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2 टिप्‍पणियां:

Hemlal Sahu ने कहा…

बहुत अच्छी जानकारी गुरुदेव सादर नमन

मोहन कुमार निषाद ने कहा…

बहुत सूंदर जानकारी गुरुदेव प्रणाम