गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

bundeli kahani

बुंदेली कहानी 
छिमा बड़न खों चाहिए
*
जा कहानी भौत समै पैले की बात आय 
एक राज को राजा भौतै नोनों हतो, दयावान गुनी न्यायप्रिय। 
रैयत सोई ऊखों खूब चाहतती काये कें ऊ सबको भलो करत हतो। 
सारे राज में सब तरफ अमन-चैन हतो। 
लोग-लुगाइयां, लड़के-बारे सबई राजी-खुसी हते
एक बात तनक गड़्बड़ हती के ऊ राजा के कान भौत बड़े बड़े हते। 
राजा जब दरपन में झाँकत हतो तो लम्बे-लम्बे कान देख कें भौतई झेंपत तो.
राजा कौनऊ खें जा बात बताबें सें बचत तो। 
कौनौ खें पता नें चल जाए जा काजे बो अपने कान बड़ी भारी पगड़ी में लुकायें रेत तो। 
जा राज की बात रानी तक ने जान पाईं हतीं
हाँ, राजा को जोन नाऊ हतो ऊ भर जानत तो 
नाऊ तो राजा के बार बनाउत तो, सो ऊसें जा बात राजा छिपा सोई ने सकत तो। 
पे भईया राजा ने ऊखों शुद्ध बुंदेली में समझा दओ के जा बात कोऊखों पता ने लगे 
और कौनौ खें पाता लगी तो तुमें तुरतई फाँसी पे लटका दओ जैहे। 
कच्छू हो जाए नाऊ कायेखों कोऊ से कतो? 
नाऊ खें फाँसी पी थोड़ी चड़ने हती। 
हर मईना पंदरा दिन मा ऊ बखरी में आउत तो 
नाऊ आत तो और चुप्पै चाप रजा खें बार बनाके चलो जात तो। 
ऐंसई धीरे-धीरे समय बीतत जात तो
कोऊ खों पता ने हती के ऊ राजा के कान खूब बड़े हैं। 
सब कछू मजा में चलत जा रओ तो। 
कहत हैं सब दिन जात नें एक समान
भैया! होनी खों को कौन टार सकत?
सयाने जहाँ कैत हैं होनी तो होकर रए, अनहोई नैं होय 
समय का फेर एक बेर नाऊ बीमार हो गओ
और ऐसो बीमार भओ के दो मईना बिस्तरई सें ने ऊठो।
कछू दिना तेन कछू फरक नें पड़ो
मनो धीर-धीरे राजा भौतई परेसान भओ 
भई जा के बाके बार भौतई बड़े- बड़े हो गए
बार इत्ते बड़े हो गये के ऊखों अकबकाई लगन लगी
राजा कछुक दिना तो काम चलात रओ  
मनो धीरे-धीरे मूड़ बसान लगो।
बॉस के मारे रानी सोई पास आबे से बचन लगी
राज कए तो का कए, और कैसें कए?
एक दिन रानी नें बा सें कई 'राजा जू! बाल काए बढ़ा रए हो?'
राजा नें हंसी-मजाक में बात उड़ा दई।
कछू दिना बाद रानी नें फिर कई " का हमाई जमात में मिलबे की तैयारी है?"
राजा नें सुन कें अनसुनी कर दई।
अब तो रानी सोई परेसान के का भओ जो राजा बात पे कान नई दे रए?
एक दिना रानी नें धमकी दे दई के बाल नें कटहें तो संगे नई अइयो।
अब तो भरी मुस्किल भई, मरता क्या न करता?
आखिरकार राजा नें दूसरे नाई खों खबर भिजा दई।
राज महल के चौकीदार ने जाखें बताओ कि राजनाऊ बीमार है।
एई सें सकारे-सकारे राजमहल में आकें राजा कें बारा बना जाओ।
ई नये नाऊ को नाम गोपाल हतो।
मनो बचपन से सब गुपाला, गुपाला कहत ते।
बा गौओं के पीछे-पीछे उपला बटोरत हतो।
'गुपला आओ, उपला लाओ' कई-कई खें सब ऑखों चिढ़ात हते।
जिन्दगी में पैली बार कौनऊ से 'गोपाल' सुनखें बा मनई मन में मुस्काओ।
चौकीदार नें राजा साब का संदेस बता दओ।
गुपला ने राजा को बुलौआ सुनो सो खूब खुस हो गओ।
अपनी पेटी उस्तरा लेकें, राज महल में पोंच गओ।
राजा नें गुपला खें अपने गुसलखाने में बुला लओ।
उतै राज और अकेले हते।
राजा नें गुपला से वचन ले लओ के महल की बात कौनऊ सें नई कइयो।
गुपला नें तुरतई हामी भर दई।
अब राजा नें बार बनवाबे के लाने अपनी पगड़ी उतारी।
राजा कें कान देखकें गुपले डरा गओ।
"हे भगवान! इत्ते बड़े कान? हाथी के कानों घाईं।"
राजा नें गुपला खें घूर खें देखा।
डर के मारे गुपला की घिघ्घी बंध गई।
राजा ने ऊसें कई "देखो गुपला! हमाये कान भोतई बड़े हैं।
मनो जा बात आज लौं कोऊखों नईं पता।
तुम सोई जा बात कोऊसें ने कईओ।
तुमने कोऊ सें कई तो हमें कैसऊँ न कैसऊँ पता लग जैहे।
और फिर हम तुमें चोरी के इल्जाम में फाँसी पे टाँग देहें।"
गुपला नें कई के बाने कहूँ चोरी नई करी।
राजा बोलो राज खोलबे के काजे झूठो इल्जाम बना दओ जैहे।
गुपला खें डर कें मारे पसीनो निकरन लगो।  
राज ने ढाढस बँधाओ खें कहो नें डरो।
मनो महल की कौनऊ बात कहूँ नें कहियो।
गुपला हाथ जोड़ खें बोलो "हुज़ूर हम कौनऊं से नें केहें?
महल की बात कै के हमें मरने है का?"
गुपला ने डरात-डरात जैसें-तैसें राजा खें बार बनाये।
कौनउ बख्शीश दै पातो बाके पैलेई गुपला पेटी लेकें भगो।
गुपाला नें पिछारूं मुरक कें लो नईं देखो।
गुपाला खें भगत देख कौनऊ नें पूछो 'काये पीछे भूत लगे हैं का?
ऐंसे भग रओ है मनो जान हथेली में धरि आय।"
घरे पोंच कें गुपला की साँस में साँस आई।  
अब रात-दिन गुपला खों एकई चिंता हती।
का करे जासे कौनौ खें ई बात को पता नें चले के राजा के कान बड़े-बड़े हैं।
कहूँ कौनऊ खें पता चलो तो राजा तो जोई समझहे के गुपला नेई बताओ हुईए।
गुपला को चित्त कौनऊ काम में ना लगत तो।
घरबारी समझ गई की इनै कोऊ बात खाए जा रई है।
बाने पूछो भी, मनो पूछन पर गुपला मुकर गओ।
बाने कै दई कौनऊ बात नईयाँ।
घरबारी खों बेफिकर करबे खों गुपला ने मन मार खें ब्यारी खा लई।
रोटी खा पीकें गुपला आराम करन लगो।
पे परें परें ऊको एकदम सें पेट पिरान लगो।
गुपाला सोचन लगो 'जो का भओ...? पेट काय पिरा रओ?'
ऊखों तबई खबर आई के ऊखों जा बड़ी खराब बीमारी है।
बीमारी जे के कौनौउं गुप्त बात ऊके पेट पचत नईंयां।
ए दैया अब का करे?, राजा के कानों बारी बात कोऊ सें के भी नईं सकत।
केत हैं तो राजा फाँसी पे टंगवा देहे और ने केहें तो पेट में दर्द सें ऊंसई मर जेहें।
का करे? सोच-सोच खें ऊ तो पगला गओ।
जैसें-तैसें रात भई, ऊने सोबे की कोसिस करी।
पे नींद तो ऐंसी गायब भई जैसें गधा खें मूँद सें सींग।
पेट इत्ती जोर सें पिरानो, के लगो के अब प्रान निकरतई हैं।
सोचते-सोचते ऊखों एक उपाय सूझो।
ऊ दौड़ लगा खें घर के बायरे लगे एक पेड़ की लिंगां पोंचो।
ऊनें झाड़ के तना सें मूं लगा खें ऊ के कान में धीरे सें के दई राजा के कान बड़े-बड़े हैं।
चुगली कर दई, सो पेट में बात न पचने के दर्द सें छुटकारा मिल गओ।
गुपला को पेट पिराबो मिट गओ।
ऊने सोची के पेड़ कौन बोलत आहे सो कौन से केहे?
सांप भी मर गओ और लाठी सोई नईं टूटी।
सो गुपाला घरे जाकें मजे सें सो गओ।
पे भगवान की मर्जी कछु और हती।
निज सोची कब्ब्हू नईं, प्रभु सोची तत्काल।
कछू दिना बाद ऊ पेड़ काट डारो गओ।
ऊ पेड़ की लकड़ियन सें तबला और सारंगी बना दए गए।
बा समय नियम हतो के कौनऊ नओ साज बनाओ जाए तो पैली मरतबा राज-दरबार में बजाओ।
जैसो नियम हतो दोई बाजे पैली बेर राजा के दरबार मॆं बजबे गये।
दरबार खचाखच भरो हतो काये सें के नये बाजन खों सबई जने मजा लिओ चाहत ते।
जैसेईं तबलची ने तबला पे हाथ ठोको सो आवाज आई "राजा के बड़े बड़े कान, राजा के बड़े बड़े कान।"
सारंगीबाज नें सारंगी के तार छेड़े तो आवाज आई "तोसें किन्ने कई? तोसें किन्ने कई?" अब तबला बोला "गुपले नाई ने कई, गुपले नाई ने कई"।
सारे दरबार में एकदम से सन्नाटा छा गया।
दरबारियों खें काटो तो खून नई।
भई गति सांप-छछूंदर केरी, उगारत-निगारत पीर घनेरी।
दरबारन सें नें तो बैठत बन रओ हती, नें बागत बन रओ हतो।
'जे का हो रओ है?' दरबारी कानाफूसी करन लगे।
तबला - सारंगी बेर-बेर एकई बात कहत ते।
कौनऊ काछो नें बोलो पे सबई समझ गए के बात का है।
राजा की बड़ी पगड़ी को राज खुल गओ हतो।
अपनी पोल खुलबे सें राजा गुस्से से पागल हो गओ।
बा ने हुकुम करो "पकड़ खें लाओ गुपले नाई को।"
बात फैलन में देर नांय लगती।
गुपला नें सुनीं सो समझ गइ अब खैर नई आ।
बाने घर छोड़ खें भगबे की तैयारी कर लई।
गुपाला की घरवारी चुप्पैचाप सब देख रई।
बाखों भी समझ पर गई कि कछू गडबड हुई है।
गुपला तो कछू खत नै हतो।
नाउन नें इतै-उतै से सब बात जान लई।
बा रोज महल में रानी साहिबा खों तेल मलत हती।
एक कहाउत है 'मरता का न करता?'
सो नाउन डरते-डरते महल खों भागी के रानी साहिबा से बिनती कर खें गुपला की जान बचाए।
गुपला खों भगबे के पैलेई सिपाहियन नें पकड़ लओ।
गुपला डरात-डरात आओ और राजा के पैरों पे गिर परो"
राजा के पैर पकर लए और बिनती करन लगो "हुज़ूर! गलती माफ हो।
अन्नदाता! मैंने ऐसो जानबूझ कें नईं करो!
मोखों जा बीमारी है के कौनउं बात पचत नई याँ।
ए के बाद भी मैंने कौनऊ मनई सें नई कई।
आपकी सौं घरवारी पूछत-पूछत हैरान हती मनें मैंने काछो नई कई।
हुज़ूर तो मोरो पेट पिरात रओ सो मैंने एक पेड़ के कान में जा बात कै दई ती के जा तो बोल नई सकत है।
माई-बाप हमें का पता ती के पेड़ की लकडिया सें तबला-सारंगी बनहै और बेई बोल दैहें।"
राजा साब पैले तो खूब लाल-पीले भए।
दरबारन ने बिनय करी 'महाराज! आप तो सबई के माई-बाप हो।
औलाद गलती करें तो कौनऊ माँ-बाप प्रान थोरेई ले लेत हैं।
महाराज नें सोच-बिचार में परे हते।
उतै नाउन नें महारानी के चरन पाकर लै।
सारी बात सांच-सांच कै दई।
काह न अबला कर सके?
दोऊ नें एक-दूसरी की बात 'कम कए सें ज्यादा समझियो' की  बिना पे समझ लई।
महारानी ने तुरत फैसला लओ और खास दासी को चिठिया पे कुछ लिख खें महाराज कें ढींगे भेज दओ।
दासी नें तुरतई महल से दौर लगाई और दरबार में पोंच खें बा चिठिया महाराज खों दई।
बा चिठिया में महारानी नें लिखो हतो 'अब तो सबखों सच पता हो गओ है।
अब लौ छिपाओ सो छिपाओ, अब छिपाबै खों कछू नईया।
गुपला खो मार खें अपजस नें लें महाराज।
बाकी जान बखस दैहें तो सगरी प्रजा जै-जै कार करहे।
हम सोई हमसें बात छिपाबै के लाने हुजूर से नाराज हैं।
मनो गुपला को माफी मिलबे की खुसी में सब भूल जैहें।"
राजा सोई सारे मामले को लै कें भारी परेसान हते।
रानी के संदेसे सें उनें एक रास्ता मिल गओ।
बिन नें गुपले खों माफ करबे की मुनादी करा दई।
गुपला नें महाराज के पैस पकड़ लए।
सारे दरबारी जै-जै कार करन लगे।
उतै महल में महारानी के चरण चापती नाउन नें अपनो सुहाग बचाबे खातिर आंसुआ भरी आँखों सें महारानी के प्रति आभार जता दओ।

कथा सें सार जो निकारो के
१. सच खों कितनऊ छिपाओ जाए बा कौनऊ नें कौनऊ तरीके सें सामने आ जात है।
२. सच सें दरबे की जगह सच का सामना करो चाही।
३. अपनों राज दूसरे कें कान में पदों तो राज नई रह जात।
४. छिमा बड़न खों चाहिए, छोटन खों अपराध।
***
१७१ वाक्य

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राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

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