शनिवार, 29 अप्रैल 2017

chitra kavya pataka alankar



चित्र काव्य 
पताका अलंकार  
१.
है
काष्ठ
में जान।
मत काटो
दे देगी शाप।
होगा कुल नाश।
हो या न हो विश्वास। 
जीवन हो साफ़ सुथरा 
हरी-भरो रखो वसुंधरा।
****
२.

पौधे
लगाएँ।
मरु में भी
वन उगाएँ।
अंत समय में  
पंचलकड़ियाँ दें   
सभी सगे संबंधी  
संवेदना तो जटाएँ।
***
३. 
हैं
वन
न शेष।
श्याम कैसे
बनाए बंसी ? 
रूठी हुई राधा
थकी थाम मटकी।

***
४.

बाँस
न धनु।
हैरान हैं
वन में राम।
कैसे करें युद्ध?
कैसे चलाएँ बाण ।
****
५.
है
लाठी
सहारा  
बुढ़ापे का।  
न सकें छीन
पूत, हो कपूत
मिल बाँस उगाएँ ।
***

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