शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

geet: sampat devi muraraka


गीत
जो जितना देता है जग में, उतना ही वह पाता है
सम्पत देवी मुरारका
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जो जितना देता है जग में, उतना ही वह पाता है |
यह संसार बहुत सुंदर है, यह अपना सपनों का घर है ||

यहाँ कन्हैया रास रचाता, यहाँ गूंजता वंशी-स्वर है |
सत्यम्,  शिवम्,  सुंदरम वाली, यह धरती सबकी माता है ||

गंगा-यमुना के प्रवाह में, पाप सभी के धुल जाते है |
यहाँ धर्म-मजहब के नाते, हँसी खुशी से निभ जाते है ||

अनुपम यहाँ प्रकृति की शोभा, सबके ह्रदय विरम जाते है |
ढाई आखर प्रेम की भाषा, बन जाती अपनी परिभाषा ||

यहाँ निराशा नहीं फटकती, यहाँ रंगोली रचती आशा |
सुन्दर उपवन जैसा भारत, सबके मन को हर्षाता है ||

सावन में हैं झूले पड़ते, होली में मृदंग हैं बजाते |
तुलसी यहाँ राम गुण गाते, और कबीरा निर्गुण कहते ||

इस माटी का तिलक लगाओ, माटी से सबका नाता है |
जो जितना देता है जग में, उतना ही वह पाता है ||
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sampat devi <murarkasampatdevi@gmail.com>
Smt. Sampat Devi Murarka
Writer, Poetess, Journalist
Srikrishan Murarka Palace,
# 4-2-107/110, 1st floor, Badi Chowdi, nr P. S. Sultan Bazaar,
HYDERABAD; 500095, A. P. (INDIA)
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