सोमवार, 26 अगस्त 2013

ateet salila: sanjiv

अतीत-सलिला:
संजीव
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(श्री राजीव रंजन लिखित आलेख के सन्दर्भ में टिप्पणी)
श्री राम-श्री कृष्ण अथवा अन्य विषयों संबंधी चर्चा करते समय उस काल खंड की भौगोलिक परिस्थितियों को अवश्य ही ध्यान में रखा जाना चाहिए।
वाल्मीकि, अगस्त्य, परशुराम, अगस्त्य, शरभंग, सुतीक्ष्ण, रावण आदि राम से वरिष्ठ थे.
अगस्त्य धार्मिक संत अथवा सामाजिक सुधारक मात्र नहीं थे, वे शेष्ठ परमाणु वैज्ञानिक और दुर्घर्ष योद्धा भी थे. उत्तर-दक्षिण संपर्क में बाधक विंध्याचल की ऊँचाई कम कर उसमें से रास्ता बनाने के लिए जितनी शक्ति चाहिए थी वह उस अल्प समय में परमाणु विस्फोट के अलावा और किस माध्यम से प्राप्त हो सकती थी? परमाणु अस्त्रों को उनके प्रभाव के अनुसार ब्रम्हास्त्र, पर्जन्यास्त्र, वायवास्त्र, आग्नेयास्त्र आदि नाम दिए गए थे तथा इनका उपयोग सामान्य युद्धादि में वर्जित था, निर्माण विधि गोपनीय थी, शस्त्र संग्रह ऋषियों के आश्रम में होता था जिनसे संकट के समय नरेश प्राप्त कर युद्ध जीत कर पुनः ऋषियों को लौटाते थे. इसीलिए राक्षस आश्रमों पर आक्रमण करते थे की शस्त्र पा या नष्ट कर सकें। 
अगस्त्य के पूर्व शंकर द्वारा अमरकंटक की झील से मीठे जल की धार समुद्र तक प्रवाहित करने तथा त्रिपुर को नष्ट करने में परमाणु अस्त्रों का उपयोग किया जा चुका था. भागीरथ मानसरोवर से गंगा को प्रवाहित करने के लिए शिव से ही अस्त्र और सञ्चालन विधि सीखी।
राम के काल में टैथीज महासागर भर चुका था, जगह-जगह पर पथरीली-नमकीन पानी के पर्व युक्त जमीन थी जिस पर खेती संभव नहीं थी,  हल से जोता न जा सकने के कारण 'अहल्या' कहा गया, जबकि जिस जमीन को जोटा जा सका वह 'हल्या' कही गयी, अहल्या उद्धार बंजर अभिशप्त जमीन को कृषि योग्य बनाने का महान उपक्रम था जो राजकुमार राम के मार्ग दर्शन में राजकीय संसाधनों से पूर्ण किया गया होगा।
वर्तमान छतीसगढ़, उड़ीसा, झारखण्ड,बिहार नर्मदा घाटी आदि मिलकर कौसल राज्य था जिसके नरेश महाराजा कौसल तथा एकमात्र संतान राजकुमारी कौशल्या थीं. अयोध्या एक छोटा सा राज्य था जिसके नरेश दशरथ प्रतापी योद्धा थे. अमरकंटक तथा समूचे कौसल में वानरों, ऋक्षों, उलूकों, गृद्धों आदि जनजातियों का निवास था. दशरथ ने राज्य के लोभ में कौसल्या से विवाह तो किया किन्तु रूपसी न होने के कारण प्रेम नहीं कर सके। कश्मीर की रूपवती राजकुमारी कैकयी तथा सुमित्रा से विवाह के बाद कौसल्या उपेक्षित ही रहीं।
निर्वासन के बाद राम अपनी ननिहाल ही आये. इसके पूर्व राम-सीता-लक्षमण ने चित्रकूट में लम्बे प्रवास में ऋषियों के साथ बनी योजनानुसार जबलपुर के समीप नर्मदा के उत्तरी तट पर अगस्त्य आश्रम में अगस्त्य तथा लोपामुद्रा से परमाणु शास्त्र सञ्चालन की विधि तथा शस्त्र ग्रहण किये, अमरकंटक से महाराजा कौसल के विश्वस्त जाम्बवान, बाल मित्र हनुमान आदि के साथ उनके कबीलों का समर्थन लेकर शबरी से भेंट की. चन्द्रणखा (शूर्पणखा), खर-दूषण आदि रक्ष नायकों का वध कर राम दक्षिण की ओर बढ़े.
दिल्ले में वातानुकूलित कक्षों में विराजे अधिकारियों, नेताओं और उनके अनुगामी विद्वानों नव कांग्रेस और भा.ज़.पा. की अनुकूलता के अनुसार रान की वन यात्रा के दो पथों की घोषणा की जिन पर बड़ी धन राशि भी खर्च की गयी. ये दोनों पथ चित्रकूट से मालवा ओंकारेश्वर होकर हैं.
बुंदेलखंड-छतीसगढ़ जहाँ राम का वास्तविक यात्रा पथ है, वह नकारा जा रहा है. वाणासुर जिसने रावण को युद्ध में पराजित किया था को स्थान मंडला (जबलपुर के निकट गोंड राजधानी) को ओंकारेश्वर में बताया जा रहा है.
नर्मदा घाटी का उत्तर तट आर्यों तथा दक्षिण तट अनार्यों की साधना स्थली रहा है. जबकि यह समूची घाटी त्रिपुर के काल से कृष्ण के काल तक नागों, वानरों, ऋक्षों, उलूकों, गृद्धों आदो का मूल स्थान तथा उनकी अपनी सभ्यता का केंद्र रही. विविध संस्कृतियों के संघर्ष का केंद्र होकर परमाणु शस्त्रों के प्रयोगों से यह घटी भीषण वनों और पर्वतों से सम्पन्न तो हुई किन्तु नागरी जीवन शिली से वंचित भी रही.
कालांतर में सत्ता केंद्र गंगा तट पर जाने के बाद रचे गये पुराणों में अमरकंटक-नर्मदा और शिव को लेकर प्रचलित सभी कथाएँ, माहात्म्य आदि कैलाश मानसरोवर गंगा और शिव से जोड़ दी गयीं।
शिव को लेकर रचे गए तीन उपन्यासों मेहुला के मृत्युंजय आदि में मनीष त्रिपाठी ने शिव को कैलाश पर मन है किन्तु शिव के पूर्व रूप महादेव रूद्र का उल्लेख मात्र किया है. ये रूद्र ही अमरकंटक पर थे.
आपको इस कार्य हेतु पुनः बधाई।

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