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सोमवार, 26 अगस्त 2013

muktak salilaa: sanjiv

मुक्तक सलिला :
संजीव
*
मन रोता है सचमुच लेकिन, फिर भी हँसना पड़ता है
रो न सके जो ऐसे मन में, सत्य कहें तो जड़ता है
सुमन सुरभि सौगात लुटाता, 'सलिल' बुझाता प्यास सदा -
फर्क न पड़ता खुश हो कोई, या बेबात बिगड़ता है 
*
अपनी राह चला चल साथी, अनदेखी कर बाधा की  
श्याम काम निष्काम करें, सुधि कब बिसराएँ राधा की 
बृज वृन्दावन इन्द्रप्रस्थ द्वारका सभी हैं एक समान-
मिले प्रशंसा या हो निंदा, अनदेखी हर व्याधा की 
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सारमेय मिल शोर करें तो, गज ने कब निज पग रोके 
मंजिल मिले उन्हें जो चलते, चाहे जग कितना टोके 
अपनी-अपनी समझ, न करना फ़िक्र चला चल सतत 'सलिल' 
 वर्षा, धूप, अँधेरा, तूफां रोके, मत रुक बढ़ हारें झोंके

मर्यादा का हनन करें जो, उन्हें न अब नेतृत्व मिले 
ठुकरा दें अपराधी नेता, अब सच्चा नेतृत्व मिले 
दल मिल संगामित्ती खेलें, ठेंगा इनको दिखला दो-
जन प्रतिनिधि हो जनगण जैसा, कोई न सुविधा अन्य मिले 
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नूरा कुश्ती से ठगते हैं,नेता सच को पहचानो 
सगा नहीं जनता का, कोई  दल इस सच को जानो 
अफसरशाही स्वार्थ साधती, धनपति देता है रिश्वत- 
रहबर जिनको समझा हमने, रहजन हैं यह सच मानो
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