शनिवार, 17 अगस्त 2013

doha salila: bhavan mahatmya 2 -sanjiv

दोहा सलिला :
भवन माहात्म्य : 2
संजीव
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[इंस्टिट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स, लोकल सेंटर जबलपुर द्वारा गगनचुम्बी भवन (हाई राइज बिल्डिंग) पर १०-११ अगस्त २०१३ को आयोजित अखिल भारतीय संगोष्ठी  की स्मारिका में प्रकाशित कुछ दोहे।]
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आते खाली हाथ सब, जाते खाली हाथ।
बना छोड़ते जो भवन, दें यश-अपयश नाथ।२६।
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भवन हेतु धरती चुनें, जन-जीवन उपयुक्त।
सब प्रसन्न हो रह सकें, हिल-मिल हो उन्मुक्त।२७।
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भवनों में दृश्यांकन, करें मनोरम आप।
निरखें- मन में शांति हो, पड़े ह्रदय पर छाप।२८।
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सुन्दर-उपयोगी भवन, बना कमायें पुण्य।
रहवासी आशीष दें, तब जीवन हो धन्य।२९।
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करतीं 'सलिल' इमारतें, जन-जीवन संपन्न।
अगर न हों तो हो मनुज, बेबस-दीन-विपन्न।३०।
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नींव सदा मजबूत हो, सीधी हो दीवाल।
वायु-प्रकाश मिले प्रचुर, जीवन हो खुशहाल।३१।
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भवन बनाने से बढ़े, वंश कीर्ति सुख नाम।
पंछी पाये नीड़ निज, शांति-सौख्य-विश्राम।३२।
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भवन अगर कमजोर हो, कर सकते कुल-नाश।
मिट जाती मनु-सभ्यता, पल में जैसे ताश।३३।
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भवन यांत्रिकी-दूत हैं, मानव को वरदान।
आपद-विपदा से बचा, तन में फूकें जान।३४।
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पौधारोपण कीजिए, भवनों के चहुँ ओर।
उज्जवल उषा निहारिए, सुन्दर सांझ अंजोर।३५।
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उपयोगी सुदृढ़ भवन, आते सबके काम।
हैं सचमुच बेदाम ये, सेवा दें अविराम।३६।
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बिल्डिंग नहीं इमारतें, हैं जीवित इतिहास।
मानवता की धड़कनें, राष्ट्र-देव की श्वास।३७।
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भवन बना रहते रहे, सुर-नर हो सम्पन्न।
भवन-हीन दानव रहे वन में घोर-विपन्न।३८।
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भवन-सडक से सुख मिले, मणि-कांचन संयोग।
जीते जी ही स्वर्ग सा, सुख सकते सब भोग।३९।
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भवनों का निर्माण कर, रक्षें भली प्रकार।
यातायात सुगम बने, 'सलिल' बढ़े व्यापार।४०।
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गत से आगत तक बनें, भवन सभ्यता-सेतु।
शिल्प और तकनीक का, संगम सबके हेतु।४१।
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ताप-शीत-बरखा सहें, भवन खड़े रह मौन।
रक्षा करने भवन की, आगे आये कौन?४२।
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इमारतें कहतीं कथा, युग की- सुनिए चेत।
जो न सत्य पहचानता, वह रहता है खेत।४३।
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भवन भेद करते नहीं, सबके शरणागार।
सबके प्रति हों समर्पित, क्षमता के अनुसार।४४।
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भवनों का आकार हो, सम्यक भव्य सुरूप।
हर रहवासी सुखी हो, खुद को समझे भूप।४५।
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भवन-सुरक्षा कीजिए, मान सुखद कर्त्तव्य।
भवन सुरक्षित तो मिलें, शीघ्र सभी गंतव्य।४६।
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भवन-इमारत चाहते, संरक्षण दें मीत।
संरक्षित रहिए विहँस, गढ़ नव जीवन-रीत।४७।
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साथ मनुज का दे रहे, भवन आदि से अंत।
करते पर उपकार ज्यों, ऋषि-मुनि तारक संत।४८।
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भवन क्रोध करते नहीं' रहें हमेशा शांत।
सहनशक्ति खो हो रहा, मानव क्यों उद्भ्रांत।४९।
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भवन-सुरक्षा कीजिए, मानक के अनुरूप।
अवहेला कर दीन हों, पालन कर हों भूप।५०।
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1 टिप्पणी:

Anoop Bhargava ने कहा…


सलिल जी,
अछूते विषय पर लिखे मनमोहक दोहे ।

सादर
अनूप

Anoop Bhargava
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I feel like I'm diagonally parked in a parallel universe.

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