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रविवार, 25 अगस्त 2013

muktak: sanjiv

मुक्तक सलिला :
संजीव 
*
श्री प्रकाश की दीप्ति तिमिर का अंत करेगी सत्य यही
अहम् न चिर स्थाई होता, कहती धरती महामही
हो सचेत कर रही गगन भू समुद गगन को एक सतत
बहती सलिल धार रह निर्मल, कही कुसुम ने कथा यही 
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क्या होगा बदलाव, नाग जायें आयेंगे साँप
सोच-सोच कर सलिल-कलेजा बेबस जाता काँप
दल का तंत्र समाप्त बन सके राष्ट्रीय सरकार-
शायद तब ही लोकतंत्र की हो पाए जयकार 
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करे असत की नित्य वकालत झूठ घोर अन्याय
चोरी-सीनाजोरी हर दिन लिखे नया अध्याय 
पहले मारे सैनिक फिर पारित निंदा प्रस्ताव-
पाकिस्तान बना रावण-दुर्योधन का पर्याय 
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शिष्टाचार भूलकर करते अन्यों को आरोपित
संसद से सद्भाव-सत्य भी होते 'सलिल' विलोपित 
सेवा का ले नाम, पा रहे मेवा हँस अपराधी- 
अशालीन हो मूर्ख करें शालीनों को संबोधित 
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हाय सियासत! किया देश का तूने बन्टाढार 
येन-केन हर कोई चाहता बना सके सरकार 
एक अंगुली औरों पर तीन तुझी पर उठतीं, देख-
सोच न क्या तुझको सुधार की है तत्क्षण दरकार 
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अशालीन आक्रोश न घर खुद का रख सके सुरक्षित 
वही जिए जो सत-संयम पर खुद को करे परीक्षित 
'सलिल' शब्द है ब्रम्ह, पूजिए तब जब सच पहिचानें-
दम्भ विद्वता का कर दम्भी होता सदा उपेक्षित 
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ऐसी जीत न देना ईश्वर, जिसमें सच की हार 
सत्य-विजय हित, हार करे नर-नाहर हँस स्वीकार 
कथ्य भाव रस बिम्ब छंद को आत्मार्पित कर धन्य-
'सलिल' हो सके, दैव! सदय मन-मन्दिर दे उजियार 
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हे अनाम! मैं अंश तुम्हारा, जग देता है नाम 
सुख-संतोष न पाने देता, कहता है कर काम 
कोरी चादर पर डाले है पल-पल अनगिन रंग-
ज्यों की त्यों रख सका न तू ,कह यही करे बदनाम 
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