गुरुवार, 6 दिसंबर 2018

हिंदी की नाट्य परंपरा

हिंदी की नाट्य परंपरा  
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                 हिंदी में नाटकों का प्रारंभ भारतेंदु हरिश्चंद्र से मान्य है। भारतेंदु तथा उनके समकालीन नाटककारों ने जन-जाग्रति हेतु  नाटकों की रचना कर तात्कालिक सामाजिक समस्याओं को नाटकों में अभिव्यक्त किया। अव्यावसायिक साहित्यिक रंगमंच निर्माण का श्रीगणेश आगा हसन ‘अमानत’ लखनवी के ‘इंदर सभा’ नामक गीति-रूपक से मान्य है। 'इंदर सभा’ वस्तुत: रंगमंचीय कृति नहीं थी। इसमें शामियाने के नीचे खुला मंच रहता था। तीन ओर दर्शक बैठते थे, चौथी ओर तख्त पर राजा इंदर का आसन तथा परियों के लिए कुर्सियाँ रखी जाती थीं। साजिंदों के पीछे एक पर्दा लटका दिया जाता था।  पर्दे के पीछे से पात्र प्रवेश करते थे। एक बार आकर मंच पर ही उपस्थित रहते थे,अपने संवाद बोलकर वापस नहीं जाते थे। यह नाट्यरंगन बहुत लोकप्रिय हुआ। अमानत की ‘इंदर सभा’ के अनुकरण पर कई सभाएँ (‘मदारीलाल की इंदर सभा’, ‘दर्याई इंदर सभा’, ‘हवाई इंदर सभा’) आदि बना ली गईं। पारसी नाटक मंडलियों ने भी इन सभाओं और मजलिसे परिस्तान को अपनाया। ये रचनाएँ नाटक नहीं थी और न ही इनसे हिंदी का रंगमंच निर्मित हुआ। भारतेंदु इनको 'नाटकाभास' कहते थे। उन्होंने इनकी पैरोडी के रूप में ‘बंदर सभा’ लिखी थी।
                    भारतेंदु से पूर्व हिंदी रंगमंच और नाट्य-रचना के व्यावसायिक तथा अव्यावसायिक साहित्यिक प्रयास तो हुए पर वास्तविक और स्थायी रंगमंच विकसित नहीं हो सका। सन् १८५० ई. से सन् १८६८ ई. तक हिंदी रंगमंच शैशवावस्था में ही था। पारसी व् अन्य व्यावसायिक नाटक मंडलियाँ मई स्थानों में बनाई गईं किंतु उनमें साहित्यिक समझ नहीं थी। फलत: हिंदी रंगमंच का कुछ प्रचार-प्रसार हुआ, कुछ अच्छे नाटककार हिंदी को मिले पर अवसर और परिस्थिति का लाभ नहीं उठाया जा सका था। 

                    भारतेंदु ने संस्कृत-प्राकृत की पूर्ववर्ती भारतीय नाट्य-परंपरा और बँगला की समसामयिक नाट्यधारा के साथ अंग्रेजी प्रभाव-धारा से प्रेरित हो बाँग्ला के विद्यासुंदर' (१८६७) नाटक का हिंदी अनुवाद कर अपनी यात्रा आरंभ की। नियमित रूप से खड़ीबोली में अनेक नाटक लिखकर भारतेंदु ने ही हिंदी नाटक की नींव को सुदृढ़ किया। भारतेंदु के पूर्ववर्ती नाटककारों में भारतेंदु के पिता गोपालचंद रचित 'नहुष' (१८४१) न रीवा नरेश विश्वनाथ सिंह (१८४६-१९११) के बृजभाषा में लिखे गए नाटक 'आनंद रघुनंदन' हिंदी के प्रथम नाटक मान्य हैं।  हिंदी में साहित्यिक रंगमंच और नाट्य-सृजन परंपरा सन् १८६८ ई. में भारतेंदु के नाटक-लेखन और मंचीकरण से आरंभ हुई।। इसके पूर्व पात्रों के प्रवेश-गमन, दृश्य-योजना आदि से युक्त कोई वास्तविक नाटक नहीं रचा गया था। ‘नहुष’ तथा ‘आनंदरघुनंदन’ भी पूर्ण नाटक नहीं थे, न पर्दों और दृश्यों आदि की योजना वाला विकसित रंगमंच ही तब तक निर्मित हुआ था। नाट्यारंगन के अधिकतर प्रयास मुंबई आदि अहिंदी भाषी क्षेत्रों में ही हुए थे, भाषा हिंदी-उर्दू का मिश्रित खिचड़ी रूप में थी। 

                    ३ अप्रैल सन् १८६८ को शीतलाप्रसाद त्रिपाठी रचित 'जानकी मंगल' नाटक का अभिनय ‘बनारस थियेटर’ में आयोजित था। जिस लड़के को लक्ष्मण का अभिनय करना था वह बीमार पड़ गया।नाट्यायोजन स्थगित किया जाने लगा तो युवा भारतेंदु ने अभिजात्यता की चिंता न कर, एक-डेढ़ घंटे में ही न केवल लक्ष्मण के संवाद अपितु पूरा ‘जानकी मंगल’ नाटक ही याद कर लिया। तब उच्च कुल के लोग अभिनय करना अपनी प्रतिष्ठा के प्रतिकूल समझते थे। इसके बाद भारतेंदु ने अभिनय के साथ-साथ नाट्य-सृजन भी आरंभ किया। १८८५ ई. तक अपने स्वल्प और अति व्यस्त जीवन के शेष १७ वर्षों में भारतेंदु ने अनेक नाटकों का सृजन किया, अनेक नाटकों में अभिनय किया, अनेक रंगशालाएँ निर्मित कराईं और रंगमंच को स्थपित कराया। भारतेन्दु ने अनेक लेखकों और रंगकर्मियों को नाट्य-सृजन और अभिनय की प्रेरणा दी। फलत: काशी, प्रयाग, कानपुर आदि में निम्न अव्यावसायिक हिंदी साहित्यिक रंगमंच स्थापित हुए

                    भारतेंदु के ही जीवन काल में स्थापित मुख्य रंग-संस्थाएँ: १. नेशनल थियेटर काशी- ‘अंधेर नगरी’ प्रहसन इस थियेटर के लिए एक ही रात में लिखा गया था।  २. ‘आर्य नाट्यसभा’ प्रयाग- लाला श्रीनिवासदास रचित ‘रंगधीर प्रेममोहिनी’ प्रथम बार अभिनीत हुआ, ३. कानपुर में भारतेन्दु के मित्र प्रतापनारायण मिश्र ने भारतेंदु के ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’, ‘सत्य हरिश्चंद्र’, ‘भारत-दुर्दशा’, ‘अंधेर नगरी’ आदि नाटकों का अभिनय कराया। इनके अतिरिक्त बलिया, डुमराँव, लखनऊ आदि उत्तर प्रदेश के कई स्थानों और बिहार प्रदेश में भी हिन्दी रंगमंच और नाट्य-सृजन की दृढ़ परंपरा का निर्माण हुआ।   
                
                    पूर्व में भास, कालीदास, भवभूति, शूद्रक आदि संस्कृत नाटककारों की समृद्ध नाट्य-परम्परा विद्यमान होने पर भी ९ वीं - १० वीं सदी में प्राकृत और अपभ्रंश में भी नाट्य-सृजन वैसा उत्कृष्ट नहीं हुआ। ईसा की 9वीं-10 वीं शताब्दी के बाद संस्कृत नाटक ह्रासोन्मुख हो गया था।  जैसा पूर्ववर्ती संस्कृत-नाट्य-साहित्य था। अत: भारतेन्दु के सामने संस्कृत-प्राकृत की यह पूर्ववर्ती ह्रासगामी परम्परा रही। संस्कृत के मुरारि, राजशेखर, जयदेव आदि की क्रमश: ‘अनर्घराघव’, ‘बालरामायण’, ‘प्रसन्नराघव’ आदि रचनाएँ ही भारतेन्दु तथा उनके सहयोगी लेखकों का आदर्श बनीं। इनमें न कथ्य- या विषय-वस्तु का वह गाम्भीर्य था, जो कालिदास आदि की अमर कृतियों में था, न उन जैसी शैली-शिल्प की श्रेष्ठता थी। यही कारण है कि भारतेंदु-पूर्व हिंदी नाटक निष्प्राण रहा और भारतेंदु ने उसमें सामयिक सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन की झलक पैदा कर नवोन्मेष का प्रयास किया, पर उनके प्रयत्नों के बावजूद भारतेंदु कालीन हिंदी नाटक कथ्य और शिल्प की दृष्टि से शैशव काल में ही रहा। सन् १८८५  ई. में भारतेंदु के निधन के पश्चात् वह उत्साह भी मंद पड़ गया। १९ वीं शती के अंतिम दशक में कुछ छुटपुट प्रयास हुए। कई नाटक मंडलियों जैसे ‘श्रीरामलीला नाटक मंडली प्रयाग’, ‘हिंदी नाट्य समिति प्रयाग’, भारतेंदु जी के भतीजों- श्रीकृष्णचंद्र और श्री ब्रजचंद्र -द्वारा काशी में स्थापित ‘श्री भारतेंदु नाटक मंडली’ तथा ‘काशी नागरी नाटक मंडली' आदि में ‘महाराणा प्रताप’, ‘सत्य हरिश्चंद्र’, ‘महाभारत’, ‘सुभद्राहरण’, ‘भीष्मपितामह’, ‘बिल्व मंगल’, ‘संसार स्वप्न’, ‘कलियुग’ आदि अनेक नाटकों का अभिनय हुआ।
                    धन तथा सरकारी-गैरसरकारी प्रोत्साहन के अभाव में कुछ अच्छे रंगमंचानुकूल साहित्यिक नाटकों की रचना हुई। पारसी नाटक कंपनियों के दुष्प्रभाव के सामने यह स्वल्प सत्प्रयास हिंदी-रंगमंच का विशेष विकास न कर सका। तब हिंदी रंगमंच पारसी रंगमंच से विशेष भिन्न और विकसित नहीं था, पर्दों की योजना, दृश्य-विधान और संगी सामान ही होते थे। ध्वनि-यंत्र आदि भी हिंदी रंगमंच के विकास की दिशा में विशेष योग नहीं दे पाए तथापि पारसी नाटक कंपनियों के भ्रष्ट प्रचार को कुछ धक्का लगा तथा कुछ रंगमंचीय हिंदी नाटक प्रकाश में आए। वैज्ञानिक साधन संपन्न घूमनेवाले रंगमंच का विकास १९ वीं शती में नहीं हो सका था।२० वीं शताब्दी के तीसरे दशक में सिनेमा के आगमन ने पारसी रंगमंच को समाप्त कर दिया। अव्यावसायिक रंगमंच इधर-उधर नए रूपों में जीवित रहा। अब हिंदी रंगमंच शिक्षा संस्थाओं तक सीमित होकर बड़े नाटकों की अपेक्षा एकांकियों को अधिक अपनाकर चला। डॉ॰ राम कुमार वर्मा, उपेंद्रनाथ अश्क, सेठ गोविंददास, जगदीशचंद्र माथुर, कमलेश्वर, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, मोहन राकेश, स्वदेश दीपक, नाग बोडस, हरिकृष्ण प्रेमी आदि ने उपयोगी एकांकी नाटकों/दीर्घ नाटकों की रचना की है। 
                    प्रसाद जी ने उच्चकोटि के साहित्यिक नाटक रचकर हिंदी नाटक साहित्य को समृद्ध किया। कुछ काट-छाँट के साथ प्रसाद जी के प्राय: सभी नाटकों का अभिनय हिन्दी के अव्यावसायिक रंगमंच पर हुआ। जार्ज बर्नार्ड शॉ, इब्सन आदि पाश्चात्य नाटककारों के प्रभाव से उपर्युक्त प्रसादोत्तर आधुनिक नाटककारों ने कुछ बहुत अच्छे रंगमंचीय नाटकों की सृष्टि की। इन नाटककारों के अनेक पूरे नाटक भी रंगमंचों से प्रदर्शित हुए। स्वतंत्रता के पाश्चात् हिंदी रंगमंच के स्थायी निर्माण की दिशा में अनेक सरकारी-गैर-सरकारी प्रयत्न हुए। कई गैर-सरकारी संस्थाओं को रंगमंच की स्थापना के लिए शासन से आर्थिक सहायता मिली है। पुरुषों के साथ स्त्रियाँ भी अभिनय में भाग लेने लगी हैं। स्कूलों-कॉलेजों में कुछ अच्छे नाटकों का अब अच्छा प्रदर्शन होने लगा है। अनेक सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं से संबद्ध कुछ अच्छे स्थायी रंगमंच बने हैं। थिएटर सेंटर के तत्त्वावधान में दिल्ली, बंबई, कलकत्ता, इलाहाबाद, हैदराबाद, बंगलौर, शांतिनिकेतन आदि स्थानों पर स्थायी रंगमंच स्थापित हैं। इन सर्वभाषायी रंगमंचों पर हिंदी भिखारिणी-सी ही प्रतीत होती है। केंद्र सरकार ने संगीत नाटक अकादमी की स्थापना की है, जिसमें अच्छे नाटककारों और कलाकारों को प्रोत्साहन दिया जाता है।व्यावसायिक रंगमंच के निर्माण के भी पिछले दिनों कुछ प्रयत्न हुए हैं। प्रसिद्ध कलाकार स्वर्गीय पृथ्वीराज कपूर ने कुछ वर्ष हुए पृथ्वी थियेटर की स्थापना की थी। उन्होंने कई नाटक प्रस्तुत किए हैं, जैसे ‘दीवार’, ‘गद्दार’, ‘पठान’, ‘कलाकार’, ‘आहूति’ आदि। धन की हानि उठाकर भी कुछ वर्ष इस कंपनी ने उत्साहपूर्वक अच्छा कार्य किया। इतने प्रयास पर भी बंबई, दिल्ली या किसी जगह हिंदी का स्थायी व्यावसायिक रंगमंच नहीं बन सका है। इस मार्ग में कठिनाइयाँ हैं।
साभार: विकिपीडिया 
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