मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

kahani kahani ki 1

कहानी कहानी की १ 
संजीव 
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मनुष्य ने बोलना सीखने के साथ अपने जीवनानुभवों को एक-दूसरे से कहना आरंभ किया तो कहानी विधा का जन्म हुआ। सामान्यत: किसी घटना, अनुभव या प्रतिक्रिया को आपस में कहा-सुना गया। इसीलिये पुरातन साहित्य में कहानी को वार्ता कहा गया, जैसे 'चौरासी वैष्णवन की वार्ता'। कहानी कही जाए तो किससे कही जाए? उपयुक्त पात्र आवश्यक है, 'किससे' की तलाश ने 'कहानी' को 'किस्सा' बन दिया और तमाम किस्से कहे गए। कहानी में केवल सच कहना न तो रोचक होता है, न  हमेशा उपयुक्त, इसलिए उसमें बात घुमा-फिराकर कल्पना का पुट देते हुए कही गई। कल्पना के आधिक्य ने 'गप्प' का रूप धारण किया तो कहानी को एक और नाम मिला 'गल्प'। कहानी रचना किसी नायक की महानता, किसी जीवन मूल्य स्थापना को 'कथ्य' बनाकर कहा गया तो वह 'कथा' हो गई जैसे 'सत्य नारायण की कथा'। कहानी के नामकरण का आधार उसकी अंतर्वस्तु बना। 

सामाजिक उपचार: 
कहानी को कहने की क्रिया निरुद्देश्य नहीं है। कहानी समय बिताने का माध्यम मात्र कभी नहीं रही। कहानी रचने-कहने के उद्देश्य के आधार पर कहानी को अनेक नाम मिले। लोक कथा वह जो लोक मूल्यों, लोक की जीवन शैली, लोक के संघर्षों, लोक की आकांक्षाओं कहे। लोक को पेट भरने से ही अवकाश न मिले तो कहानी क्या खाक कहे? कहानी न कही जाए तो सुख-दुःख कैसे व्यक्त हो? सामाजिक असंतोष का प्रेशर कुकर फट न जाए इसलिए कहानियों के माध्यम से असंतोष की वाष्प बाहर की जाती रही। मनोरंजन के आधुनिक साधन विकसित न होने तक चौपालें, पनघट, नुक्कड़ और चबूतरे कहानी के केंद्र होते थे। हर गाँव या मोहल्ले में कोई न कोई किस्सेबाज अपनी वाक्पटुता से जन-मन का रंजन करता रहता और दर्द-पीड़ा या भावों का शमन होता रहता। इसलिए भारत में क्रांति की भ्रांति नहीं हुई। कहानीकार या श्रोताओं को सामाजिक कथा-वार्ता ने एकसूत्र में बाँधा।  प्रशासनिक अत्याचार, विदेशी आक्रमण, मौसम की मार, साधनाभाव आदि सभी को एक साथ, एक समान झेलनी होती थी।  इसलिए वर्ण, जाति और आर्थिक विभाजन के बाद भी भारतीय समाज एक सूत्र में बँधा रहा। इस सामाजिक संगठन का श्रेय 'कहानी को है।  

धार्मिक नैतिकता 
लोक ने तमाम व्यस्तता और उत्पीड़न के बाद भी अपनी जिजीविषा को धर्म के साथ मिश्रित कर जीवन शक्ति पाने के साथ विविध पीढ़ियों को जोड़कर परिवार संस्था को मजबूत किया। ऐसी लोककथाएँ विविध पर्वों पर माँ-बेटी, सास-बहू, ननद-भौजाई, भाई-बहिन के संबंधों को आधार बनाकर सदियों तक कही-सुनी जाती रहीं। ऐसी अनेक कथाएँ आज भी कही-सुनी या पढ़ी जाती हैं। इन्हें 'धार्मिक कथा कहा जाता है। इनके बिना कोई पर्व संपन्न नहीं होता। करवाचौथ, छठ, अन्नकूट, पूर्णिमा आदि की कहानियाँ तो अधिकाँश जनों को स्मरण हैं। इन कहानियों में अधिकतर किसी देवी-देवता का विधिवत पूजन न होने पर उसके रुष्ट होने के कारन स्वजनों को कष्ट, धन-संपत्ति का नाश, कारावास, लापता होने और संयोग जुटने पर उस दैवीय शक्ति की उपासना करने पर प्रसन्न होकर उपाय बताने या वर देने के वर्णन हैं जिससे कष्ट होकर सब प्रसन्न हो सकें।

शंका नाशक कहानी 
आदिमानव वनवासी था। उसने प्रकृति के विविध उपादानों को जिनसे उसे जीवन यापन के साधन मिलते थे को दैवीय शक्ति का आगार मानकर देवता कहा, पूजा और उसकी महिमा की कथाएँ कहीं। सूर्या, चंद्र, धरती, पवन, अग्नि, आकाश, वृक्ष, नदियाँ, पशु-पक्षी आदि संबंधी कहानियाँ निंजा देव, बड़ा देव, महादेव तक आ गईं। इस कहानियों में जीवन-सत्य ही मूल था। आदिवासियों के कुलों, कबीलों के उद्भव और प्रलय तथा सृष्टि के पुनरारंभ की कहानियाँ तात्कालिक सत्य ही कह रही थीं, जिसे कालांतर में विज्ञान ने भी सत्य प्रमाणित किया। विस्मय यह कि दुनिया के हर क्षेत्र में एक सी अनुभूतियाँ और अभिव्यक्तियाँ हैं। इन कहानियों में शंकाएं भी हैं और उनके समाधान भी। इसलिये लोक देवता को शंकर (शंकारि = शंका का शत्रु) कहकर उसके कंकर में वास करने की बात  कही गई। 'कंकर-कंकर में शंकर' जीवन सूत्र बन गया। ये शंकर सामान्य जन की तरह वन और पर्वतवासी थे, अपनी पत्नी के साथ लोक का सुख-दुःख जानने-समझने के लिए वेश बदलकर घूमते थे। उनकी कथाएँ 'हारे को हरिनाम' की तरह टूटे मन को जोड़ने की सामर्थ्य रखती थीं, हैं और रहेंगी। जन-गण के साथ कदम से कदम, कंधे से कन्धा मिलाकर चलनेवाला, उलझनों के सर्प, बाधाओं के विष और उपलब्धियों के चन्द्रमा को सम भाव से धारणकर सर्व सुलभ वृषभ पर न केवल घूमने वाला अपितु जान-भय कारक सिंह की स्वामिनी को जीवन संगिनी बनाकर जन सामान्य को भीत करने वाले दैत्यों का संहार करने-करनेवाला लोक देव न हो तो कौन हो? कहने उसका यह न कहे तो किसका कहे? शंका का अंत होने पर जन्म होता है विश्वास का। विश्वास एक पल में नहीं होता। जीवन मूल्यों की वाहक प्रथाओं को लोभ का गज और अविश्वास का मूषक कुतरने लगे तो श्रद्धा और शक्ति मिलकर जिस संतान को सामने लाती हैं उसके अंधविश्वासी शीश का कर्तन कर सत्यासत्य को जानने-माननेवाली मति युक्त मस्तिष्क से जोड़कर कहानी 'गणपति' को प्रतिष्ठित करती है। ये गणपति 'स्व' को 'सर्व' माननेवाले कार्तिकेय को 'श्रद्धा-विश्वास' की परिक्रमा कर पराजित करते हैं।शंका का अंत सत्य से ही होता है।
                                                                                                                                                        क्रमश: 

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