सोमवार, 17 दिसंबर 2018

समीक्षा दोहा सलिला निर्मला

पुस्तक चर्चा: नई उम्र की नई फसल: दोहा सलिला निर्मला डॉ. अरुण मिश्र * [पुस्तक विवरण: दोहा सलिला निर्मला, आई एस बी एन ८१७७६१०००२, संपादक: आचार्य संजीव 'सलिल' - प्रो. (डॉ.) साधना वर्मा, प्रथम संस्करण २०१८,, आकार २१.५ से. x १४ से., आवरण बहुरंगी पेपरबैक,पृष्ठ १६०, मूल्य २५०/-, समन्वय प्रकाशन अभियान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, चलभाष ७९९९५५९६१८] * प्रतिभा कवित्व का बीज है जिसके बिना काव्य रचना संभव नहीं है। 'कवित्तं दुर्लभं लोके' काव्य रचना सृष्टि में सर्वाधिक दुर्लभ कार्य है। आचार्यों के अनुसार काव्य के ३ हेतु हैं। 'नैसर्गिकी च प्रतिभा, श्रुतञ्च बहु निर्मलं। अमंदश्चाभियोगश्च, कारणं काव्य संपद:।।' दंडी काव्यादर्श १ / १०३ निसर्गजात प्रतिभा, निर्भ्रांत लोक-शास्त्र ज्ञान और अमंद अभियोग यही काव्य के लक्षण हैं। काव्य की रचना शक्ति, निपुणता और अभ्यास द्वारा ही संभव है। काव्य छंद-विधान से युक्त सरस वाणी है जिसका सीधा संबंध लोक मंगल से होता है। आचार्य शुक्ल भी यही स्वीकार करते हैं कि जिस काव्य में लोक के प्रति अधिक भावना होगी, वही उत्तम है। छंद-शास्त्र का ज्ञान सभी को प्राप्त नहीं है, वाग्देवी की कृपा ही छंद-युक्त काव्य के लिए प्रेरित करती है। आचार्य श्री संजीव वर्मा 'सलिल' एवं डॉ. साधना वर्मा के संपादन में विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर द्वारा शांतिराज पुस्तक माला के अंतर्गत प्रकाशित दोहा शतक मञ्जूषा २ 'दोहा सलिला निर्मला' कृति का प्रकाशन हुआ है। आज के दौर में साहित्य-लेखन में छंदों का प्रयोग नगण्य होता जा रहा है तथापि कुछ रचनाकार ऐसे हैं जिन्होंने छंदों के प्रति असीम निष्ठा का भाव अपनाकर छंद-रचना से खुद को अलग नहीं किया है। वे छंद-विधान में निष्णात हैं। संपादक द्वय ने इनकी प्रतिभा का आकलन कर पंद्रह-पंद्रह दोहाकारों द्वारा रचित सौ-सौ दोहों को इस कृति में संग्रहित किया है। यह संग्रह उपयुक्त व सटीक है। इस संग्रह की विशेष बात यह है कि हर दोहाकार के दोहों पर पहले संपादक द्वारा समीक्षकीय टिप्पणी करने के साथ-साथ पाद टिप्पणी में दोहा में ही दोहा विषयक जानकारी दी गई है। संग्रह के पहले रचनाकार अखिलेश खरे 'अखिल' के दोहों में ग्राम्य जीवन की सुवास महकती है- खेतों से डोली चली, खलिहानों में शोर। पिता-गेह से ज्यों बिदा, पिया गेह की ओर।। निम्न दोहे में ग्राम्य व नगर जीवन की सटीक तुलना की गई है- शहर-शहर सा सुघर है, उससे सुंदर गाँव। सुदिन बाँचता भोर से, कागा कर-कर काँव।। श्रृंगार रस से भरपूर दोहे भी अखिल जी द्वारा लिखे गए हैं- नैना खुली किताब से, छुपा राज कह मौन। महक छिपे कब इत्र की, कहो लगाए कौन।। प्रेम की भाषा मौन रहती है पर प्रेम छिपाये नहीं छिपता। यह प्रेम स्वर्गीय ज्योति से प्रकाशित रहता है।दोहाकार अरुण शर्मा की चिंता गंगा-शुद्धि को लेकर है। निर्मल पतित पावनी, राम की गंगा को मैली होते देख कवि ने अनायास यह दोहा कहा होगा- गंगा नद सा नद नहीं, ना गंगे सा नीर। दर्जा पाया मातु का, फिर भी गंदे तीर।। करते गंगा आरती, लेकर मन-संताप। मन-मैला धोया नहीं, कहाँ मिटेंगे पाप।। बरही कटनी निवासी श्री उदयभानु तिवारी के दोहों में भक्ति और प्रेम की रसधारा प्रवाहित है।'महारास लीला' शीर्षक उनके दोहों में मधुरा भक्ति का प्राकट्य हुआ है। मन को आल्हादित करने वाले एक-एक दोहे में पाठक का मन रमता जाता है और वह ब्रम्हानंद सहोदर का आनंद उठाता है- गोपी जीवन प्रेम है, कान्हा परमानंद मोहे खग नर नाग सब, फैला सर्वानंद।। श्री कृष्ण योगिराज हैं। 'वासुदेव पुरोज्ञानं वासुदेव पराङ्गति।' इन दोहों को हृदयंगम कर बरबस ही स्मरण हो आते हैं ये दोहे- कित मुरली कित चंद्रिका, कित गोपियन के साथ। अपने जन के कारने, कृष्ण भये यदुनाथ।। महारास में 'मैं-'तुम' का विभेद नहीं रहता, सब प्रेम-पयोधि में डूब जाते हैं। बिहारी कहते हैं- गिरि वे ऊँचै रसिक मन, बूड़ै जहाँ हजार। वहै सदा पशु नरन को, प्रेम पयोधि पगार।। बरौंसा, सुल्तानपुर के ओमप्रकाश शुक्ल गाँधीवादी विचारधारा के पोषक हैं। समसामयिक परिवेश में जो घटित है, उसके प्रति उनकी चिंता स्वाभाविक है- भरे खज़ाना देश का, पर अद्भुत दुर्योग। निर्धन हित त्यागें; करें, चोर-लुटेरे भोग।। समानता, न्याय का सभी को अधिकार प्राप्त हो कवि की यही कामना है- सबको सबका हक मिले, बिंदु-बिंदु हो न्याय। ऐसा हो कानून जो, रहे धर्म-पर्याय।। जीवन में सहजता और सारल्य ही शक्ति देता है, इसलिए दोहाकार ने संतोष व्यक्त किया है। उसकी इच्छा है कि सब प्रेम से रहें, सन्मार्ग पर चलें- सत का पथ मत छोड़ना, हे भारत के लाल। राजभोग क्यों लालसा, जब है रोटी दाल।। नरसिंहपुर निवासी जयप्रकाश श्रीवास्तव गीत-नवगीत के रचनाकार हैं। वे निसर्ग से संवाद करते नज़र आते हैं- यूँ तो सूरज नापता, धरती का भूगोल। पर कोई सुनता नहीं गौरैया के बोल।। पेड़ हुए फिर से नए, पहन धुले परिधान। फूलों ने हँसकर किया, मौसम का सम्मान।। हिंदी में प्रारंभ से ही नीतिपरक दोहों का चलन रहा है। इसी परंपरा में नीता सैनी के दोहों का सृजन हुआ है- नैतिकता कायम रहे, करिए चरित-विकास। कोरे भाषण नीति के, तनिक न आते रास।। उनके इस दोहे में गंगा के प्रति असीम निष्ठा का भाव अभिव्यक्त हुआ है- युगों-युगों से धो रहीं, गंगा मैया पाप। निर्मल मन करतीं सदा, हरतीं पीड़ा-पाप।। सोहागपुर, शहडोल निवासी डॉ. नीलमणि दुबे का व्यक्तित्व ही काव्यमय है। छंदविधान उनकी बाल्य जीवन की कविताओं में दृष्टव्य है। वे हिंदी प्राध्यापक होने के पहले काव्य-रचयिता हैं। कविता उनके आस-पास विचरती है। संस्कृतनिष्ठ पदावली में उनकी गीत-रचना पाठकों को सहज ही लुभाती है। वर्तमान समय में बेमानी होते संबंधों को वे दोहे के माध्यम से उजागर करती हैं- आग-आग सब शहर हैं, जहर हुए संबंध। फूल-फूल पर लग गए, मौसम के अनुबंध।। प्रकृति के प्रति असीम लगाव है उन्हें। खेतों की हरियाली, वासंतिक प्रभा उन्हें विमोहित करती है। प्रकृति के पल-पल बदलते परिवेश का वे स्वागत करती हैं- आम्र-मंजरी मिस मधुर, देते अमृत घोल। हिय में गहरे उतरते, पिक के मीठे बोल।। सरसों सँकुचाई खड़ी, खिला-खिला कचनार। कर सिंगार सँकुचा गई, हरसिंगार की डार।। धौलपुर, राजस्थान में जन्मे कवि बसंत कुमार शर्मा राजस्थान की वीरभूमि व् त्याग-बलिदान की माटी की सुवास लेकर दोहे रचते हैं। उन्हें छंदों के प्रति विशेष लगाव है। शोषित वर्ग के प्रति उनके मन में विशेष करुणा है। हमारे कृषि प्रधान देश में किसान प्रकृति के रूठ जाने से लाचार हो जाता है- रामू हरिया खेत में, बैठा मौन उदास। सूखा गया असाढ़ तो, अब सावन से आस।। सिवनी मध्य प्रदेश के रहनेवाले डॉ. रामकुमार चतुर्वेदी वर्तमान व्यवस्था से आक्रोशित हैं। वे अपने परिवेश को व्यंग्य-धार से समझाते हैं- पाँव पकड़ विनती करैं, सिद्ध करो सब काम। अपना हिस्सा तुम रखो, कुछ अपने भी नाम।। विषय चयन के क्षेत्र में, गाए अपना राग। कौआ छीने कान को, कहते भागमभाग।। सिवान, बिहार की रीता सिवानी युवा कवयित्री हैं। वे समतामूलक समाज में पूर्ण आस्था रखती हैं- धरा जगत के एक है, अंबर सबका एक। मनुज एक मिट्टी बने, रंगत रूप अनेक।। रिश्ते में जब प्रीत हो, तभी बने वह खास। प्रीत बिना रिश्ते लगें, बोझिल मूक उदास।। प्रेम जहाँ है, वहाँ तर्क नहीं है क्योंकि तर्क से विद्वेष बढ़ता है। जहाँ प्रेम हो, निष्ठा हो, वहाँ कुतर्कों का स्थान नहीं है, प्रेम के बिना जीवन सूना है। अहंकार को त्यागना ही सच्चा प्रेम है। कबीर की वाणी में- 'जब मैं था तब हरि नहिं, अब हरि है मैं नाहिँ'। ईश्वर को पाना है, अच्छा इंसान बनना है तो अहंकार का त्याग आवश्यक है- गर्व नहीं करना कभी, धन पर ऐ इंसान! कर जाता पल में प्रलय, छोटा सा तूफ़ान।। शुचि भवि भिलाई (छत्तीसगढ़)निवासी हैं। विरोधाभास की जिंदगी उन्होंने देखी है। परिवार-समाज से वे कुछ चाहती हैं। समाज में विश्वास नहीं रहा है। सहज-सरल लोगों का आज जीना दुश्वार हो गया है। भवि को समाज से सिर्फ निराशा ही नहीं है अपितु कहीं न कहीं वह आशान्वित भी हैं। भवि जीवन में सरलता के साथ ही विनम्रता को प्रश्रय देते हुए कहती हैं- कटु वचनों से क्या कहीं, बनती है कुछ बात? बोलो मीठे वचन तो, सुधरेंगे हालात।। तुलसीदास जी भी यही कहते हैं- तुलसी मीठे वचन ते, सुख उपजत चहुँ ओर। बसीकरन इक मंत्र है, परिहरु बचन कठोर।। 'भवानी शंकरौ वजनदे, श्रद्धा विश्वास रूपिणौ' की अनुगूँज भवि के इस दोहे में व्यंजित है- बूँद-बूँद विश्वास से, बनती है पहचान। पल भर में कोई कभी, होता नहीं महान।। दिल्ली में जन्मे शोभित वर्मा में एक अभियांत्रिकी महाविद्यालय में विभागाध्यक्ष होने के बाद भी पारिवारिक संस्कार के कारण हिंदी के प्रति रूचि है। सलिल जी से जुड़ाव ने उनमें और छंद के प्रति लगाव उत्पन्न कर दिया। उनका कवि पर्यावरण के प्रति जागरूक है- काट रहे नित पेड़ हम, करते नहीं विचार। आपने पाँव कुल्हाड़ पर, आप रहे हैं मार।। अभियंता होने के नाते वे जानते हैं कि किसी निर्णय का समय पर होना कितना आवश्यक है- यदि न समय पर लिया तो निर्णय हो बेअर्थ। समय बीतने पर लिया निर्णय करे अनर्थ।। सुदूर ईटानगर अरुणांचल में पेशे से शिक्षिका सरस्वती कुमारी ने अपने दोहों में सामाजिक विसंगतियों को उद्घाटित किया है। वे नारी शक्ति की समर्थक और राधा-कृष्ण के प्रेम की उपासिका हैं- रंग-रँगीली राधिका, छैल छबीला श्याम। रास रचाते जमुन-तट, दोनों आठों याम।। गीता का कर्म योग भी उनके दोहों में व्याप्त है- ढूँढ जरा ऐ ज़िंदगी!, तू अपनी पहचान। भाग्य बदल दे कर्म कर, लिख अपना उन्वान।। हिंदी प्राध्यापक फैज़ाबाद निवासी हरि फ़ैज़ाबादी अवधी के कवि हैं। वे कविता की पारम्परिकता को बरकरार रखे हुआ माँ को श्रेष्ठ मानते हैं- कर देती नौ रात में, जीवन का उद्धार। माँ की महिमा यूँ नहीं, गाता है संसार।। स्वच्छता अभियान के लिए वे जागरूक हैं। उनकी पीड़ा यह कि स्वच्छ रहने के लिए भी अभियान चलना पड़ रहा है- आखिर चमके किस तरह मेरा हिंदुस्तान। यहाँ सफाई भी नहीं, होती बिन अभियान।। सारण बिहार में जन्मे, राँची में कार्यरत हिमकर श्याम इस दोहा संग्रह के अंतिम रचनाकार हैं। पत्रकारिता में स्नातक होने के साथ ही वे दोहा, ग़ज़ल, रिपोर्ताज लिखने में सिद्धहस्त हैं। सहज व्यक्तित्व होने के कारण ही वे पर्यावरणीय विक्षोभ से चिंतित हैं। प्रकृति के प्रति असीम अनुराग उनके लेखन में व्याप्त है- झूमे सरसों खेत में, बौराए हैं आम। दहके फूल पलाश के, है सिंदूरी शाम।। वृक्षों की अंधाधुंध कटाई उन्हें चिंतित करती है। आँगन में लगे तुलसी के पौधे के नीचे रखे दीपक अब ध्यान में नहीं है- आँगन की तुलसी कहाँ, दिखे नहीं अब नीम। जामुन-पीपल कट गए, ढूँढे कहाँ हकीम।। आचार्य संजीव सलिल तथा प्रो. साधना वर्मा द्वारा 'शान्तिराज पुस्तक मालांतर्गत संपादित 'दोहा शतक मञ्जूषा २ "दोहा सलिला निर्मला" छंद विधान की परंपरा को सुदृढ़ बना सकी है। स्वतंत्रता के बाद विशेषकर नवें-दसवें दशक से छंद यत्र-तत्र ही दिखते हैं। छंद लेखन कठिन कार्य है। आचार्य संजीव सलिल जी ने अथक श्रम कर दोहाकारों को तैयार कर उनके प्रतिनिधि दोहों का चयन कर यह दोहा शतक मंजूषा श्रृंखला बनाई है जो वर्तमान परिवेश और सामयिक समस्याओं के अनुकूल है। ये रचनाकार अपने परिवेश से सुपरिचित हैं। अत; उसे अभिव्यक्त करने में वे संकोच नहीं करते हैं। कुल मिलाकर सभी दृष्टियों से संग्रहीत कवियों के दोहे छंद-विधान के उपयुक्त व् सटीक हैं। संपादक द्वय को ढेर सी बधाई और शुभकानाएँ। विश्वास है कि भविष्य में ये दोहे पाठकों को दिशा-सोची बना सकेंगे। *** संपर्क: विभागाध्यक्ष हिंदी, शासकीय मानकुँवर बाई स्नातकोत्तर स्वशासी महिला महाविद्यालय, जबलपुर ४८२००१

कोई टिप्पणी नहीं: