गुरुवार, 20 दिसंबर 2018

व्यंग्य विधा

लेख: 
विधा में व्यंग्य या व्यंग में विधा 
संजीव 
व्यंग्य का जन्म समकालिक विद्रूपताओं से जन्मे असंतोष से होता है। व्यंग्य एक अलग विधा है या वह किसी भी विधा के भीतर सार या प्रवृत्ति (स्पिरिट) के रूप में उपस्थित रहता है, या विमर्श का विषय है। व्यंग्य के माध्यम से व्यंग्यकार जीवन की विसंगतियों, खोखलेपन और पाखंड को उद्घाटित कर उन पर प्रहार करता है। जान सामान्य उन विसंगतियों से परिचित होते हुए भी उन्हें मिटाने की कोशिश न कर, विद्रूपताओं-विसंगतियों से समझौता कर जीते जाते हैं। व्यंग्य रचनाओं के पात्र और स्थितियाँ इन अवांछित स्थितियों के प्रति पाठकों को सचेत करती हैं। ‘व्यंग्य’ में सामाजिक विसंगतियों का चित्रण सीधे-सीधे (अभिधा में) न होकर परोक्ष रूप से (व्यंजना या कटूक्ति) से होता है। इसीलिए व्यंग्य में मारक क्षमता अधिक होती है। 

व्यंग्य का हास्य से क्या संबंध है? वह एक स्वतंत्र विधा है या सकल विधाओं में व्याप्त रहने वाली भावना या रस? वह मूलतः गद्यात्मक है या पद्यात्मक? वह समय बिताऊ लेखन है या गंभीर वैचारिक कर्म? क्या व्यंग्यकार के लिए प्रतिबद्धता अनिवार्य है? प्रतिबद्धता क्या है? इन प्रश्नों के उत्तर पाठकों और समीक्षकों को ही नहीं, व्यंग्यकारों को भी स्पष्ट नहीं हैं।  हरिशंकर परसाई व्यंग्य को विधा नहीं मानते थे। रवींद्रनाथ त्यागी पहले व्यंग्य को विधा मानते थे, बाद में मुकर गए। शरद जोशी व्यंग्य को विधा मानते हुए भी कहने में हिचकते थे। नरेंद्र कोहली व्यंग्य को विधा मानते हैं और कहते भी हैं। कुछ व्यंग्यकार हास्य को व्यंग्य के लिए आवश्यक नहीं मानते, कुछ हास्य के बिना व्यंग्य का अस्तित्व नहीं मानते। 

हिंदी में कबीर व्यंग्य के आदि प्रणेता मान्य हैं। उन्होंने मध्यकाल की सामाजिक विसंगतियों (जाति-भेद, धर्माडंबर, गरीबी-अमीरी, रूढ़िवादिता आदि) पर व्यंग्यपूर्ण शैली में मारक प्रहार किए। 'मूँद मुड़ाए हरी मिले, सब कोउ ले मुड़ाय / बार-बार के मूड़ते, भेद न बैकुंठ जाय, कांकर पाथर जोरि कै, मस्जिद लई चुनाय / ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, बहरा हुआ खुदाय, पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूज पहार / ताते या चाकी भली, पीस खाए संसार'आदि अनेक उद्धरण कबीर की बेधक व्यंग्य-क्षमता के प्रमाण हैं। उत्तर-मध्यकालीन सामंती समाज ने निहित स्वार्थों के कारण कबीर जैसे संतों के समाज-बोध को नकार दिया। फलत:, रीतिकाल में व्यंग्य रचनाओं की उपस्थिति नगण्य रही। 

कबीर के बाद भारतेंदु ने सामाजिक विषमताओं के संकेतन हेतु व्यंग्य को हथियार बनाया। 'हाय! मनुष्य क्यों भये, हम गुलाम वे भूप।' में औपनिवेशिक भारत की मूल समस्या गुलामी पर प्रहार है। ‘अंधेर नगरी’ और ‘मुकरियों’ में गुलाम भारत की विडंबनापूर्ण परिस्थितियों, अंग्रेजी साम्राज्यवादजनित शोषण के प्रति आक्रोश केंद्र में है। भारतेंदु के समकालिक व्यंग्यकार प्रेमघन की कृति ‘हास्यबिंदु’ और प्रतापनारायण मिश्र के निबंधों में व्यंग्य सहायक प्रवृत्ति के रूप में है। व्यंग्य का पूर्ण उन्मेष पश्चातवर्ती व्यंग्य रचनाकार बालमुकुंद गुप्त की रचनाओं 'शिवशंभू का चिट्ठा' आदि में है। राजनीति और तत्कालीन शासन-व्यवस्था से टकराव इन व्यंग्य रचनाओं के मूल में हैं। यूरोप में दांते की लैटिन में लिखी किताब डिवाइन कॉमेडी मध्यकालीन व्यंग्य का उदाहरण है, जिसमें तत्कालीन व्यवस्था का मज़ाक उड़ाया गया था। व्यंग को मुहावरे मे व्यंग्यबाण कहा गया है।
आज व्यंग्य-लेखन आवश्यक माध्यम के रूप में उभरा है, रचनात्मक-संवेदनात्मक स्तर पर व्यंग्य की लोकप्रियता और माँग चरम पर है, किंतु अधिक मात्रा और अल्पसूचना (शॉर्ट नोटिस) पर लिखे जाने के कारण उसकी गुणवत्ता प्रभावित होने का भारी खतरा है। व्यंग्य का विवेकसंगत प्रयोग आवश्यक है। हर जगह इसका उपयोग नहीं किया जा सकता। व्यंग्य किसी के पक्ष में होता है तो किसी के विरुद्ध। व्यंग्य विचार से पैदा होता है और विचार को पैदा भी करता है। इस वैचारिकता से दिशा ग्रहणकर मानवता के हित में व्यंग्य का उत्तरोत्तर उत्कर्ष सुनिश्चित करना आज व्यंग्यकार का सबसे बड़ा कर्तव्य और उसके समक्ष उपस्थित गंभीर चुनौती भी है। युगीन समस्याओं पर व्यंग्य करने की प्रवृत्ति प्रेमचंद की कहानियों व उपन्यासों में आम आदमी और कृषक वर्ग की दैनंदिन कठिनाइयों पर करारे व्यंग्य के रूप में है। निराला की ‘कुकुरमुत्ता’ आदि रचनाओं में व्यंग्य की अभिव्यक्ति विद्रूपता फैलानेवाले समाज के खिलाफ चुनौती के रूप में है। स्वतंत्रता-पूर्व के रचनाकारों में पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ और रांगेय राघव के व्यंग्य में धार नहीं है। 
स्वतंत्र होकर सामान्य जन खुशहाली के सपने देखने लगा किंतु विपरीत परिस्थितियों और राजनीतिक अदूरदर्शिता के कारण भारत में समाज, राजनीति, धर्म, शिक्षा, आदि सभी क्षेत्रों में असंगतियाँ बढ़ी हैं। सामाजिक-नैतिक मूल्यों का पतन हुआ है। आम आदमी के लिए शांतिपूर्वक जीवन जीने के अवसर कम हुए हैं। सत्य, सदाचरण, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा आदि शाश्वत मूल्य समाप्त प्राय हैं। आजादी पूर्व के स्वप्न बीसवीं शताब्दी के छठे दशक तक खण्डित हो गए। शोषण व अत्याचार आजादी के बाद घटने के बजाय बढ़ गया। वैयक्तिक और सामाजिक अंतर्विरोध बढ़े, व्यक्ति निजी स्वार्थ तक सीमित रह गया। ये विसंगतियाँ और जटिलताएँ व्यंग्य की आधार-भूमि बनीं, करुणापूर्ण व्यंग्य लेखन की परंपरा बनीं। इस परंपरा के प्रतिनिधि रचनाकार हरिशंकर परसाई की स्वतंत्र भारत में पनपी विसंगतियों के प्रामाणिक शब्द-चित्र हैं। इनका आकलन समकालिक भारत की यथार्थ स्थितियों के संदर्भ में ही संभव है। परसाई ने सामाजिक स्थितियों को  वैचारिक चिंतन से पुष्ट कर प्रस्तुत किया। स्वतंत्र भारत के सकारात्मक-नकारात्मक सभी पहलुओं की बखूबी पड़ताल करती परसाई की रचनाओं में शोषकों के तिलिस्म में कैद-पीड़ित भारत की छटपटाहट अनुभव की जा सकती है। अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता और सतर्क वैज्ञानिक दृष्टि के कारण परसाई छद्म के उन रूपों को आसानी से पहचानते हैं जिन तक सामान्यतः रूढ़िवादी दृष्टि नहीं पहुँच पाती। निजी अनुभूतियों की निर्वैयक्तिक अभिव्यक्ति उनके व्यंग्य लेखन की विशेषता है। वे निम्नवर्गीय सामान्य आदमी से बहुराष्ट्रीय समस्याओं तक को अपने भीतर समेटकर व्यंग्य के माध्यम से सृजन व संहार एक साथ करते हैं। परसाई का व्यंग्य जब शोषक वर्ग के प्रति घृणा और आक्रोश तथा व्यंग्य अभावग्रस्त व्यक्ति के प्रति करुणा पैदा करता है। परसाई के व्यंग्य की भाषा सप्रयास नहीं है। उनके अनुसार समाज में रहने के कारण वह हमें अनुभव देता है और विषयानुरूप नई भाषा सिखाता है। परसाई की भाषा उनके कथ्य का अनुसरण करती हैं।
शरद जोशी एक अलग भाषाई तेवर के साथ, शिल्प के प्रति सजग रहकर, भाषिक-वक्रता व शब्दों-विशेषणों के विशिष्ट संयोजन से समृद्ध व्यंग्य लिखते हैं। श्रीलाल शुक्ल के व्यंग उपन्यास ‘रागदरबारी’ में मोहभंग की स्थितियोन का सच सजीव हुआ है। रवींद्रनाथ त्यागी का हास्य-व्यंग्य मिश्रित आत्मपरक लेखनन सिर्फ पाठक को प्रफुल्लित करता है बल्कि उसे सोचने के लिए बाध्य भी करता है लतीफ घोंघी के व्यंग्य में राजनीतिक व सामाजिक यथार्थ, उर्दू मिश्रित भाषा, कथ्य की व्यापकता  व मारकता की कमी है। वे नारी-शोषण, कालाबाज़ारी, भुखमरी, शैक्षिक-साहित्यिक गड़बड़ियों तथा आमजन की दैनिक परेशानियों पर लिखते हैं।  
सामाजिक मूल्यों के विघटन को केंद्र में रखकर समकालीन साहित्यिक परिदृष्य में व्यंग्य का लगातार सृजन हो रहा है। भाषा के विकास के साथ ही व्यंग्य का जन्म हुआ। रोजमर्रा के जीवन में बात करते समय व्यंग्य ‘किया’ जाता है, ‘कसा’ जाता है, ‘मारा’ जाता है, व्यंग्य-बाण चलाया’जाता है। व्यंग्य बोलचाल की भाषा में होते हुए भी साहित्य से बहुत बाद में जुड़ा। सबका हित समाहित करते साहित्य और विरोधाभासों का उपहास कर, पाखण्ड पर चोट करते व्यंग्य की प्रवृत्तियाँ परस्पर विरोधी हैं। साहित्यकार समाज में व्याप्त विसंगतियों, विद्रूपों, पाखंड का सामाजिक दवाबों या राजनैतिक कारणों से विरोध न कर सके तो उन्हें व्यंग्य के माध्यम से साहित्य में व्यक्त करता है। व्यंग्य में व्यंजना आवश्यक है। व्यंग्य कहकर भी नहीं कहता तथा बिना कहे ही कह देता है। व्यंग्य की इसी शक्ति का फ़ायदा उठाकर श्रीलाल शुक्ल, सरकारी सेवा में रहते हुए भी “राग-दरबारी” लिख सके। व्यंग्य वैचारिक स्वतंत्रता का पर्याय है। वैचारिक स्वतंत्रता न हो तो साहित्यिकता की रक्षा करते हुए साहित्यकार व्यंग्य परोसता है किंतु वैचारिक स्वतंत्रता सुलभ होने पर साहित्यकार सेअच्छन्द हो, व्यंग्य का दुरुपयोग कर गाली-गलौज पर उतर आता है। वह भूल जाता है कि समाज के विद्रूप की आलोचना के लिए व्यंग किया जाता है, न कि प्रश्रय देने के लिए। व्यंग्य के साथ 'हास्य' और 'विनोद' मिलकर 'व्यंग्य-विनोद' और 'हास्य-व्यंग्य' के रूप में  कटुता को दूर भी करता है। 
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