मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

muktak

मुक्तक 
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जब तक चंद्र प्रकाश दे 
जब तक है आकाश। 
तब तक उद्यम कर सलिल 
किंचित हो न निराश।। 
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श्वास-श्वास जी रही है जिंदगी।
आस-हास पी रही है जिंदगी।।
खुशी बाँट पीर सहे पीर बन-
'सलिल' अधर सी रही है जिंदगी।।
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जग उठ चल बढ़ गिर मत रुक 
ठिठक-झिझिक मत, तू मत झुक।  
उठ-उठ कर बढ़, मंजिल तक-
'सलिल' सतत चल, कभी न चुक।। 
नियति का आशीष पाकर 'सलिल' बहता जा रहा है। 
धरा मैया की कृपा पा गीत कलकल गा रहा है।।
अतृप्तों को तृप्ति देकर धन्य जीवन कर रहा है-
पातकों को तारकर यह नर्मदा कहला रहा है।।
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