शनिवार, 15 दिसंबर 2018

समीक्षा दोहा-दोहा नर्मदा -डॉ. स्मृति शुक्ल

पुस्तक परिचय:
"दोहा-दोहा नर्मदा, दोहा शतक मंजूषा भाग १"
समीक्षक- प्रो. स्मृति शुक्ल
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[पुस्तक विवरण: दोहा-दोहा नर्मदा (दोहा शतक मञ्जूषा भाग १), आई एस बी एन ८१७७६१००७४, प्रथम संस्करण २०१८, आकार २१.५  से. x १४ से., आवरण बहुरंगी पेपरबैक, पृष्ठ १६०, मूल्य २५०/-, प्रकाशक समन्वय  ,४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१] 
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                              आचार्य संजीव 'सलिल' हिंदी साहित्य में अनवरत स्तरीय लेखन कर रहे हैं। वे विगत बीस वर्षों से अंतरजाल पर भी सक्रिय हैं और हिंदी की विभिन्न विधाओं में सार्थक रच रहे हैं। 'कलम के देव', 'भूकंप के साथ जीना सीखें', 'लोकतंत्र का मकबरा', 'मीत मेरे' आदि कृतियों के साथ आपके नवगीत संग्रहों 'काल है संक्रांति का' ने खासी प्रसिद्धि पाई है। ‘सड़क पर’ आपका सद्य प्रकाशित नवगीत संग्रह है। आचार्य संजीव 'सलिल' और प्रो. साधना वर्मा के संपादकत्व में प्रकाशित 'दोहा-दोहा नर्मदा' दोहा शतक मञ्जूषा  भाग एक, 'दोहा सलिला-निर्मला' दोहा शतक मञ्जूषा भाग दो एवं 'दोहा दीप्त दिनेश' दोहा शतक मञ्जूषा भाग तीन प्रकाशित हुआ है। इन तीनों संग्रहों में पंद्रह-पंद्रह दोहाकारों के सौ-सौ दोहों को संकलित किया गया है। इस प्रकार आचार्य संजीव 'सलिल' व डॉ. साधना वर्मा  ने पैंतालीस दोहाकारों के चार हजार पाँच सौ दोहों के साथ सलिल जी द्वारा रचित लगभग ५०० दोहे और अन्य १०० दोहे मिलकर लगभग ५१०० दोहों को पुस्तकाकार प्रकाशित कर हिंदी साहित्य के प्राचीन छंद दोहा को पुनः नई पीढ़ी के सामने लाने का प्रयास किया है। दोेहा पुरातन काल से आज तक प्रयुक्त हो रहा अत्यंत लोकप्रिय छंद है। सिद्धाचार्य सरोज बज्र ‘सरह’ ने विक्रम संवत् ६९० में अपभ्रंश में दोहा लिखा- 
जेहि मन पवन न सँचरई, रवि-ससि नाहिं पवेस।
तेहि बढ़ चित्त बिसाम करु, सरहे कहिय उवेस।।
                              ‘दोहा-दोहा नर्मदा’ संकलन के प्रथम पृष्ठ पर ‘दोहा-दोहा विरासत’ शीर्षक से सिद्धाचार्य सरोज बज्र ‘सरह’ के इस दोहे के साथ देवसेन जैन, हेमचंद्र, चंदरबरदाई, बाबा फरीद, सोमप्रभ सूरि, अमीर खुसरो, जैनाचार्य मेरूतंग, कबीर, तुलसी, रत्नावली, अब्दुर्ररहीम खानखाना, बिहारी, रसनिधि से लेकर किशोर चंद कपूर संवत् १९५६ तक ३४ दोहा व सर्जक कवियों का कालक्रमानुसार विवरण देना आचार्य संजीव 'सलिल' की अनुसंधानपरक दृष्टि का परिचायक है साथ ही यह बेहद मूल्यवान जानकारी है।
                              आचार्य संजीव 'सलिल' ने पिंगल शास्त्र का गहन अध्ययन किया है । आपने परंपरागत छंदों के साथ ३५० से अधिक नवीन छंदों की भी रचना की है। वे नये रचनाकारों को सदैव छंद रचना का प्रशिक्षण देते रहे हैं और उनके लिखे हुए का परिष्कार करते रहे हैं । समन्वय प्रकाशन से प्रकाशित 'दोहा-दोहा नर्मदा' में पंद्रह वरिष्ठ-कनिष्ठ दोहाकारों के सौ-सौ दोहे संकलित हैं । संपादक ने इस संग्रह की भूमिका ‘दोहा गाथा सनातन’ शीर्षक से लिखी है। यह भूमिका भी एक ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह संग्रहणीय है । इस भूमिका में आचार्य संजीव सलिल लिखते हैं कि- ‘‘दोहा विश्व की सभी भाषाओं के इतिहास में सबसे प्राचीन छंद होने के साथ बहुत प्रभावी और तीव्र गति से संप्रेषित होने वाला छंद है। इतिहास गवाह है कि दोहा ही वह छंद है जिससे पृथ्वीराज चौहान और रायप्रवीण के सम्मान की रक्षा हो सकी और महाराजा जयसिंह की मोहनिद्रा भंग हुई।’’  दोहा रचना के प्रमुख तत्वों का भी गहन और वैज्ञानिक दृष्टि से विवेचन संपादकीय में किया गया है।पंद्रह दोहाकारों के परिचय के साथ ही उनके दोहो पर समीक्षात्मक टीप देने का कार्य संपादकद्वय ने किया है जो सराहनीय है।
                              ‘दोहा-दोहा नर्मदा’ में प्रथम क्रम पर आभा सक्सेना ‘दूनवी’ के दोहे संकलित हैं । आभाजी ने प्रथम दोहे में ईश्वर आराधना करते हुए विनय की है उनके भाव सदैव उदात्त हों, सत्य,शिव और सुंदर का समवेत स्वर उनके दोहों में अनुगुंजित होता रहे । अपने गुरू का स्मरण और उनके प्रति कृतज्ञता का भाव भी व्यक्त किया है। आभा सक्सेना के दोहों का प्रारंभ हिंदुओं के सबसे बड़े पाँच दिवसीय त्यौहार दीपावली से हुआ है। धनतेरस दीपावली, करवाचौथ के बाद उन्होंने अपने बचपन को स्मृत किया है । यह बहुत स्वाभाविक भी है कि त्यौहार अक्सर अतीत के गलियारों में ले जाते हैं ।
यादों के उजले दिये, मन-रस्सी पर डार।
बचपन आया झूलने, माँ-आँगन कर पार।।
पुरवाई का मेघ को चिट्ठी देना और सावन में खूब बरसकर नदियाँ ताल भरने का संदेशा देना इस दोहे को बहुत भावपरक बनाता है, साथ ही प्रकृति में मानवीय कार्य व्यापारों का समावेश करता है ।
पुरवाई ने मेघ को, दी है चिठिया लाल ।
अब की सावन में बरस, भर दे नदियाँ ताल ।।
                              ग्रीष्म में सूरज के बढ़ते ताप को एक दोहे में आभा जी ने बहुत सुंदर अभिव्यक्ति दी है । उनके इस दोहे ने पद्माकर के ऋतु वर्णन को स्मृत करा दिया । आभा जी के दोहे में जीवन के अनेक प्रसंग है राजनीति, धर्म, अध्यात्मक, प्रेम, परिवार, जीवन-जगत दर्शन, ऋतुएँ और प्रकृति अर्थात जीवन का कोई पक्ष अछूता नहीं है । दोहों में मात्राओं का निर्वाह पूरी सतर्कता से किया गया है ।
चुन काफिया-रदीफ लो, मनमाफिक सरकार ।
गज़ल बने चुटकी बजा, हो सुनकर अश'आर ।।
                              आभा सक्सेना ने इस दोहे में चुटकी बजाकर गजल बनाने की बात कही है जो मेरे गले इसलिये नहीं उतरी कि गज़ल महज मनमाफिक काफिया या रदीफ के चुनने से ही नहीं बन जाती। बहर और शब्दों के वजन, मक्ता-मतला के साथ काफिया-रदीफ का ध्यान रखा जाए तभी मुअद्दस ग़ज़ल बन पाती है ।
                            दोहाकार आभा सक्सेना के दोहों की समीक्षा में आचार्य संजीव सलिल ने ‘यमकीयता’ शब्द का नवीन प्रयोग किया है । हिन्दी साहित्य में अभी तक इस शब्द का प्रयोग नहीं किया गया । यमक शब्द में ‘इयता’ प्रत्यय लगाकर यह शब्द निर्मित किया गया है, पर यह शब्द प्रयोग की दृष्टि से उचित नहीं है । कबीरदास ने- ‘सद्गुरू की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार। लोचन अनंत उघाड़िया, अनंत दिखावन हार।।' इस दोहे में अनंत शब्द का चार बार प्रयोग करके यमक अलंकार का अत्यंत सुंदर प्रयोग किया है लेकिन उनके लिये भी किसी आलोचक ने यमकीयता घोलना शब्द का प्रयोग नहीं किया है। काव्य-रचना के अनुकूल शब्द तथा अर्थ को प्रस्तुत करने की प्रतिभा आभा जी के पास है । धूप का कुलाँचे मारना, मूँड़ उघार कर सोना, आस के पखेरु का उड़ना, जीवन का पापड़ होना, चपल हठीली रश्मियाँ आदि प्रयोग नवीन होने के साथ दोहों में भाव प्रवणता भरते हैं।
                              कालीपद प्रसाद के दोहों में उनके गहन और सुदीर्घ जीवनानुभवों का ताप पूरी प्रखरता से मौजूद है। उनके दोहों में मनुष्य को सिखावन है और नीतिगत बातें है। भारतीय धर्मशास्त्र सदैव हमें आत्मालोचन की सीख देता है। कालीपद जी एक दोहा में लिखते हैं-
अपनी ही आलोचना, मुक्ति प्राप्ति की राह।
गलती देखे और की, जो न गहे वह थाह।।
ईर्ष्या-तृष्णा वृत्ति जो, उन सबका हो नाश।
नष्ट न होती साधुता, रहता सत्य अनाश।।
                                  जीवन सत्य का दिग्दर्शन वाले ये दोहे कहीं-कहीं मध्यकालीन संतों का स्मरण कराते हैं-
सिंधु सदृष संसार है, गहरा पारावार।
यह जीवन है नाव सम, जाना सागर पार।।
                              कालीपद ‘प्रसाद’ जी के दोहे हमें जीवन का मर्म सिखाते हैं, विपरीत परिस्थितियों में हौसला रखने तथा कर्मशील बनने की प्रेरणा देते हैं।
                              डाॅ. गोपालकृष्ण भट्ट ‘आकुल’ के दोहों में विनष्ट होते पर्यावरण के प्रति चिंता और जल संरक्षण की बात कही गई है। राजभाषा हिंदी की वैज्ञानिकता और उसके महत्व तथा वर्तमान स्थिति पर भी ‘आकुल’ जी ने दोहे रचे हैं। छंद्धबद्ध साहित्य और छंदों के निष्णात कवियों के अभाव पर लिखा दोहा साहित्य के प्रति चिंता से जन्मा है-
छंदबद्ध साहित्य का, हुआ पराक्रम क्षीण।
वैसे ही कुछ रह गये, कविवर छंद प्रवीण।।
                              चंद्रकांता अग्निहोत्री एक समर्थ दोहाकार हैं । उनके दोहों में बहुत उदात्त भाव शब्दबद्ध हुए हैं। परनिंदा का त्याग, तृष्णा, लोभ, मोह माया और अहंकार से ऊपर उठने का भाव उनके दोहों में अनुगूँजित है।
अहंकार की नींव पर कैसा नव निर्माण।
साँसों में अटके रहे, दीवारों के प्राण।।
                              छगनलाल गर्ग ‘विज्ञ’ दोहा रचने में माहिर हैं। गर्ग जी के दोहों का मूल कथ्य प्रेम है। लौकिक प्रेम से अलौकिक प्रेम तक की यात्रा इन दोहों में हैं। दोहों में अनुप्रास अलंकार की सुंदर छटा बिखरी है। गर्ग जी के श्रृंगारिक दोहों में बिहारी के दोहों की भाँति भावों, अनुभावों और आंगिक भंगिमाओं का चित्रण हुआ है-
नशा नजर रस नयन में, लाज-लाल मुख रेख।
झुक सजनी भयभीत मन, झिझक विहग सी लेख।।
                              छाया सक्सेना ‘प्रभु’ के दोहे उनकी हृदयगत उदारता और सरलता के परिचायक हैं। उन्होंने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से कुछ न कुछ अपने दोहों में लिया है। सहज-सरल भाषा में अपने हृदयगत उद्गारों को दोहों में पिरो दिया है। दोहों में प्रचलित मुहावरों का प्रयोग भी वे बहुत खूबसूरती से करती हैं-
दीवारों के कान हैं, सोच-समझकर बोल।
वाणी के वरदान को, ले पहले तू तोल।।
                                 पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता और प्रकृति के प्रति असीम अनुराग भी उनके दोहों में परिलक्षित होता है।
                              त्रिभवन कौल की जन्मस्थली जम्मू-कश्मीर ने उन्हें प्राकृतिक सौंदर्य के प्रति तीव्र लगाव से अनुरंजित किया तो भारतीय वायुसेना की कर्मस्थली ने उन्हें अगाध राष्ट्र-प्रेम से आपूरित किया। अनुशासन बद्ध जीवन ने उनके सृजन को छंदों के अनुशासन में बँधना सिखाया।‘षठं शाठ्यं समाचरेत’ इस सूक्ति को उन्होंने अपना सिद्धांत मानते हुए यह माना है कि जो देश के साथ विश्वासघात करे वह क्षमा के योग्य नहीं और आतंकी को केवल कब्र में ही ठौर मिलना चाहिये। वन, पर्वत, नदियों के संरक्षण की चिंता के साथ ही आज की राजनीति पर भी अनेक अर्थपूर्ण दोहे त्रिभुवन कौल जी ने लिखे हैं। वर्तमान समय में लेखन को भी व्यवसाय समझ लिया गया है। बहुत कुछ निरर्थक भी लिखा जा रहा है इस सत्य का उद्घाटन करते हुए त्रिभुवन कौल लिखते हैं -
हीरों सा व्यापार है, लेखन नहीं दुकान।
जब से  रज-कण आ गये, गुमी कहीं पहचान।।
                              प्रेम बिहारी मिश्र ने अपने दोहों में बड़ी सहजता से हृदय के उद्गारों को अभिव्यक्त किया गया है। भूमंडलीकरण के दौर में परिवर्तित सामाजिक परिवेश को अपने दोहों में चित्रित करने वाले प्रेमबिहारी मिश्र लिखते हैं-
चना चबैना बाजरा, मक्का रोटी साग ।
सब गरीब से छिन गया, हुआ अमीरी राग ।।
दीन-धर्म पैसा यहाँ, पैसा ही है प्यार ।
अमराई छूटी यहाँ, नकली बहे बयार ।।
                              मिथलेश  राज बड़गैया के नारी मन की कोमल संवेदनाएँ उनके दोहों में भावपूर्ण सलिला बनकर प्रवाहित है। प्रेम, श्रृंगार, संयोग, वियोग आदि भावों को उन्होंने अपने दोहों में सँजोया है-
मैं मीरा सी बावली, घट-घट ढूँढूँ श्याम। 
मन वृंदावन हो गया, नैन हुए घनश्याम।।
                              रामेश्वर प्रसाद सारस्वत जी के दोहे सार्थक शब्द चयन और निश्छल अभिव्यक्ति के कारण सम्प्रेषणीय बन गए हैं। सारस्वत जी ने अनेक दोहों में ‘आँखों में पानी नहीं’, ‘आँख में आँख डालना’, ‘हाथ को हाथ न सूझना’, ‘मन के घोड़े दौड़ाना’, ‘आँख मिचौली खेलना’, ‘ताल ठोंकना’, ‘सूखकर काँटा होना’ आदि मुहावरों का सार्थक प्रयोग करके दोहों की अभिव्यंजना शक्ति में वृद्धि की है। बीते समय की जीवन शैली और आज की जीवन शैली का अंतर अनेक दोहों में स्पष्ट है। विकास की अंधी दौड़ के दुष्परिणामों को भी सारस्वत जी अभिव्यक्त करते हैं-
अंधी दौड़ विकास की, छोड़े नहीं वजूद।
इत टिहरी जलमग्न है, उत डूबा हरसूद।।
                              विजय बागरी एक संवेदनशील दोहाकार हैं। आचार्य संजीव 'सलिल' ने लिखा है कि- ‘‘युगीन विसंगतियों और त्रासदियों को संकेतों से मूर्त करने में वे व्यंजनात्मकता और लाक्षणिकता का सहारा लेते हैं।’’ विजय जी के दोहों में वर्तमान समय की विसंगतियाँ पूरी सच्चाई के साथ मूर्त हुई हैं। आज साहित्य जगत में छद्म बुद्धिवाद फैला हुआ है। अपने पैसों से ही सम्मान समारोह आयोजित कराके अखबारों में खबरें प्रकाशित की जाती हैं। इस सच्चाई को विजय जी ने इस दोहे में व्यक्त किया है-
छलनाओं का हो रहा, मंचों से सत्कार।  
सम्मानों की सुर्खियाँ, छाप रहे अखबार।।
                              हम संसार में आकर भूल जाते हैं कि यहाँ हमारा डेरा स्थायी नहीं है, जीवन क्षणिक है। विजय जी संत कवियों की भाँति इस आर्ष सत्य का उद्घाटन करते हैं-

है उधार की जिंदगी, साँसें साहूकार।
रिश्ते-नाते दरअसल, मायावी बाजार।।
                              विनोद जैन ‘वाग्वर’ ने अपने दोहों में आज के मनुष्य की स्वार्थपरता, राजनीति के छल-छद्म, मूल्यों का अवमूल्यन, भ्रष्टाचार और तमाम तरह विभेदों को उजागर किया है । आजादी के इतने वर्षों के पश्चात् भी आम आदमी कितना लाचार और बेबस है-
हम कितने स्वाधीन हैं, कितने बेबस आज।
आजादी के नाम पर गुंडे करते राज।।
                              श्रीधर प्रसाद द्विवेदी के दोहों का कथ्य विविधता पूर्ण और शिल्प समृद्ध है । वर्तमान समय में मनुष्य तकनीक के जाल में उलझ रहा है। उपभोक्तावादी समय में मनुश्य की संवेदनाओं की तरलता शुष्क हो गई है। द्विवेदी जी ने लिखा है -
विकट समय संवेदना, गई मनुज से दूर।
अपनों से संबंध अब, होते चकनाचूर।।
                              श्यामल सिन्हा के दोहों में भाव प्रवणता है। सुख-दुख,हास-रुदन, विरह-मिलन, आशा-निराशा आदि भावों का चित्रण करने में सिन्हा जी सिद्धहस्त है। प्रेम में नेत्रों की भूमिका महत्वपूर्ण हैं। रीतिकाल में बिहारी ने अपने दोहों में नायक और नायिका को नेत्रों से प्रेमपूर्ण संवाद करते दिखाया है । श्यामल सिन्हा भी लिखते हैं-
आँखें जब करने लगी, आँखों से संवाद।
आँखों में आँखे रखें, प्रेम भवन बुनियाद।।
                              श्यामल जी के कुछ दोहे सार्थक शब्द चयन के अभाव में अर्थपूर्ण नहीं बन पाये तथा पाठक के हृदय को छूने में असमर्थ हैं। जैसे-
अहंकार मन में भरा, तन-मन बहुत उदास।
भटक रहा मन अकारण, मोती मिला न घास।।
                              इस दोहे में असंगति दोष भी है। मोती के साथ घास शब्द केवल तुकबंदी के लिए रखा गया है। इस कारण काव्य में औचित्य का निर्वाह नहीं हो पाया है।
                              'दोहा-दोहा नर्मदा' में संकलित अंतिम दोहाकार सुरेश  कुशवाहा ‘तन्मय’ के दोहों में समसामयिक परिवेश की समस्त गतिविधियाँ, परिवर्तनों की एक-एक आहट मौजूद है। मानव मन की अभिलाषाएँ, लिप्साएँ, और भावनाएँ अपने वास्तविक रूप में उभरी हैं । किसी प्रकार मुलम्मा चढ़ाकर उन्हें प्रस्तुत नहीं किया गया है । अभिव्यक्ति की सादगी ही उनके दोहों को विशिष्ट बनाती है-
बूढ़ा बरगद ले रहा, है अब अंतिम श्वास। 
फिर होगा नव अंकुरण, पाले मन में आस।।
                              नव अंकुरण की इसी आशा की डोर थामे हम चलते रहते हैं। आशा ही विपरीत परिस्थिति में हमें टूटने नहीं देती। निष्कर्षतः 'दोहा-दोहा नर्मदा' संपादक द्वय आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ और प्रो. साधना वर्मा के संपादकत्व में विश्व वाणी हिंदी संस्थान, जबलपुर से प्रकाशित एक महत्वपूर्ण कृति है। आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ने 'दोहा शतक मंजूषा १' में पंद्रह दोहाकार रूपी अनमोल मोतियों को एक साथ पिरोया है। उन्होंने अत्यंत कुशलतापूर्वक अपने आचार्यत्व का निर्वाह किया है। अनेक दोहों को परिष्कृत कर उनका संस्कार किया है। सभी पंद्रह दोहाकारों के परिचय के साथ उनके दोहों पर बहुत ही विवेकपूर्ण ढंग से सम्यक समीक्षा भी लिखी है। 'दोहा-दोहा नर्मदा की भूमिका' आपके काव्य काव्य-शास्त्रीय ज्ञान का मुकुर है। पाठक को दोहा का इतिहास और स्वरूप समझने में यह भूमिका बहुत उपयोगी है।
                              इस संकलन के प्रत्येक पृष्ठ पर पाद टिप्पणी के रूप में तथा भूमिका में आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ द्वारा रचित एक सौ बहत्तर दोहे निस्संदेह इस संग्रह की उपलब्धि हैं। इन दोहों में दोहा छंद का स्वरूप, इतिहास, प्रकार दोहा रचने के लिए आवश्यक तत्वों जैसे शब्दों का चारुत्व, मौलिक प्रयोग, रस, अलंकार, भावों की अभिव्यक्ति में समर्थ शब्दों का चयन, अर्थ-गांभीर्य, कम शब्दों में अर्थों की अमितता, लालित्य, सरलता, काव्य दोष, काव्य गुणों आदि की चर्चा करके नये दोहाकारों को दोहा रचना की सिखावन दी है। निश्चय ही 'दोहा शतक मंजूषा भाग-एक' छंदबद्ध कविता को स्थापित करने वाली महत्वपूर्ण कृति है। जनमानस के हृदय में स्पंदित होने वाले लोकप्रिय छंद दोहा की अभ्यर्थना में माँ सरस्वती के चरणों में अर्पित एक अति सुंदर सुमन है।  
दोहा- 'दोहा दोहा नर्मदा'  दोहा शतक मञ्जूषा भाग १ 
संपादक- आचार्य संजीव वर्मा‘सलिल’ एवं प्रो. (डॉ.) साधना वर्मा
समीक्षक- प्रो. (डॉ.) स्मृति शुक्ल
प्रकाशन-ंसमन्वय प्रकाशन अभियान, जबलपुर, रायपुर, बैंगलुरू
पृष्ठ १६०, प्रथम संस्करण- २०१८, आई एस बी एन ८१-७७६१-००७-४, मूल्य- २५०/-
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संपर्क समीक्षक: प्रो. स्मृति शुक्ल, ए१६, पंचशील नगर, नर्मदा मार्ग, जबलपुर ४८२००१,  चलभाष: ९९९३४१९३७४ 

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