बुधवार, 16 जनवरी 2019

कृति चर्चा: चिप्पू -गीता गीत

कृति चर्चा:
'चिप्पू' क़िस्सागोई को ज़िंदा करती कहानियाँ
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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(कृति विवरण: चिप्पू, कहानी संग्रह, गीता गीत, प्रथम संस्करण २०१२, आवरण पेपरबैक बहुरंगी, पृष्ठ ९६, मूल्य १२० रु., कहानीकार  संपर्क- १०५० सरस्वती निवास, शक्ति नगर,  गुप्तेश्वर, जबलपुर।)
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वाक् शक्ति के विकास के साथ कहने-सुनने का क्रम मानव सभ्यता को भाषा की भेंट से समृद्ध कर अन्य प्रभारियों से बेहतर बना सका। 'अनुभूत' की 'अनुभूति' को 'अभिव्यक्त' करने की कला साहित्य रचना है। 'साहित्य' वह जिसमें सबका हित समाहित हो। 'कहानी' तभी जन्म लेती है जब कहानीकार के पास कुछ कहने के लिए हो। 'किस्सा गोई' किस सा बनना चाहिए को वर्ण्य बनाती है। 'गप्प' मारने की कला की 'गल्प' है जो कल्पना को विश्वसनीय बनाकर प्रस्तुत करती है। कथनीय को सामने लाकर उसके प्रति आदर और अनुकरण वृत्ति के विकास हेतु 'कथा' कही जाती है। कथ्य को बातचीत की तरह प्रश्नोत्तर शैली में प्रस्तुत किया जाए तो 'वार्ता' जन्म लेती है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली ने 'टीच' करने को लक्ष्य बनाकर 'ग्रास्प' करने पर ध्यान नहीं दिया। शिक्षक वही है जो शिक्षार्थी को शिक्षा दे सके। शिक्षा देनेवाला निरक्षर और शिक्षा पानेवाला ग्यानी भी हो सकता है। ऐसा न होता तो 'साखी' न होती। साखी कहनेवाले प्राय: निरक्षर रहे हैं जबकि साखी से सीख लेने वाले विद्वान।

शिक्षका गीता गीत के कहानी संग्रह चिप्पू' पर चर्चा के पूर्व यह पृष्ठ भूमि इसलिए कि गीता पेशेवर या आदतन कलमघिस्सू नहीं हैं। वे सिर्फ लिखने के लिए नहीं लिखतीं। समाजशास्त्र तथा हिंदी साहित्य से स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त गीता रे सृजन पर विधिस्नातक होने की छाप न होने से रचनाएँ आम आदमी की दृष्टि से सहज ग्राह्य बन सकी हैं। गीता को 'बंगाली हिंदी कथाकार' कहना गलत है। वास्तव में वह 'हिंदीभाषी बंगाली सृजनशिल्पी' हैं। 'कर्म' का महत्व 'जन्म' से अधिक होता है। जब समाज में 'जन्म' को अधिक और 'कर्म' को कम महत्व दिया जाता है  तो चिप्पू' का जन्म ही नहीं, असामयिक मृत्यु भी होती है। गीता की संवेदनशील कलम 'चिप्पू' को न केवल पहचानती है अपितु उसे कथानायक बनाकर उसकी व्यथा-कथा सबके सामने भी लाती है।

गीता का जीवन संघर्ष उन्हें समाज के हाशिए पर रह रहे लोगों से जोड़ता है। उनकी कहानियाँ न तो साम्यवादी चिंतनधारा प्रणीत दिशा-हीन सर्वहारा की व्यथा-कथाएँ हैं, न ही अंध स्त्री-विमर्श की एकांगी अतिरेकी कहानियाँ। तथापि ये कहानियाँ विसंगतियों को इंगित, समाहित और उपचारित करने की कोशिश करने में कसर नहीं छोड़तीं। अनु,  शुभा,  उपमा,  प्रीता, नीरू,  शर्मा जी आदि गढ़े गए पात्र गढ़ा हुए न लगना गीता के कहानीकार की सफलता है। पाठक इन कहानियों को अपने निकट घटता हुआ अनुभव करता है।
शिल्प की दृष्टि से चिप्पू की कहानियाँ 'गत' को 'आगत' तक पहुँचाती हैं। इनमें कहीं संस्मरण की झलक है, कहीं आत्मकथा की। प्रायः गीता की शिक्षिका कहानी में अपनी झलक दिखा देती है। पर्यायवाची शब्दों का प्रयोग, घटनाक्रम का परिवेश और पर्यावरण, प्रकृति चित्रण, शालेय छात्रों को अनुकूल सहज-सरल भाषा आदि इन कहानियों का वैशिष्ट्य है। गीता की कवयित्री भी यत्र-तत्र उपस्थित होकर 'कथा' को 'गीत' से संयुक्त करती है।

अंतर्दृष्टि कहानी में आँखों का वर्णन सरस निबंध की तरह है। यहाँ आँख के पर्यायवाची, आँख की उपयोगिता, दृष्टि के प्रकार आदि की विस्तृत चर्चा भी कहानी के विकास या रोचकता में बाधक नहीं होती। ग्यारह कहानियों साहस, प्रीता,  रुचिका, तलाश एक दिल की, चिप्पू, अंतर्दृष्टि, दर्द,  खुशियों के दीप, टुकू, उपमा तथा आत्मा में से टुकू पूरी तरह संस्मरण है।

कृति की साहित्यिकता को वैयक्तिक संबंधपरक अनुभूतियों से क्षति पहुँचती है। बेहतर हो कि शुभेच्छु जन श्रेय लेने या आशीष देने के स्थान पर रचना कर्म की समीक्षा करें, कहानियों पर बात करें । पाठ्य अशुद्धियाँ, बिंदी-चंद्रबिंदी के गलत प्रयोग खटकते हैं। चिप्पू गीता गीत का पहला कहानी संग्रह है, संभावना की दृष्टि से आश्वस्त हुआ जा सकता है कि आगामी कहानी संकलन में परिपक्व कहानियाँ मिलेंगी। अभिव्यक्ति सामर्थ्य, शब्द भंडार तथा घटित होते में कहानी खोजकर कहने की कला गीता में है। गीता के आगामी कहानी संकलन में कहानी कला का उत्कर्ष देखने की पूरी-पूरी संभावना है।
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समीक्षक संपर्क: आचार्य संजीव वर्मा सलिल, विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष: ७९९९५५९६१८।
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