सोमवार, 21 जनवरी 2019

समीक्षा- हाइकु संग्रह -मंजूषा मन

कृति परिचय:
अभिनव प्रयोग: हाइकु संग्रह की हाइकु समीक्षा
''मैं सागर सी'' हाइकु-ताँका लहरों की मंजूषा
चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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[कृति विवरण: मैं सागर सी, हाइकु-ताँका संग्रह, मंजूषा मन, प्रथम संस्करण, २०१७, आकर डिमाई, आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, पृष्ठ ९५, मूल्य १४०/-, प्रकाशक पोएट्री बुक बाजार, एफ एफ १६७९ लेखराज तौर, इंदिर नगर लखनऊ २२६०१६, कृतिकार संपर्क- कार्यक्रम अधिकारी, अंबुजा सीमेंट फाउंडेशन, ग्राम खान,  बाजार छत्तीसगढ़ ४९३३३१]
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जापानी छंद / पाँच साथ औ' पाँच / वर्ण हाइकु।
"मैं सागर सी" / रुचिकर संग्रह / पठनीय भी।
प्रकृति नटी / छवियाँ अनुपम / मन मोहित।
निहित लय / संगीत की धुन सी / लगती प्रिय।
भाव-सागर / मंथन नवनीत / हाइकु - ताँका।
"करूँ वंदन" / प्रभु का सुमिरन / सह नमन।
मन की व्यथा / किए है समाहित / "पीर हमारी"।
हाइकु रचे / गागर में सागर / प्रिय मंजूषा।
जीवनानुभव / माला  के पुष्प सम / हुए शब्दित।
"शीशे का दिल / करें चकनाचूर / कड़वे बोल।" -पृष्ठ २९
"शोर मचाती / अधूरी कामनाएँ / चाहें पूर्णता।" -पृष्ठ ३१
"आँसुओं सींची / ये धरती बंजर / फूटा अंकुर।" -पृष्ठ ३४
मंजूषा मन / सम्यक शब्द-धनी / हुईं सफल।
"मन-साँकल / तुम खोलो आकर / सुख के पल।" -पृष्ठ ३५
निकलते हैं / अब नहीं गुलाब / पुस्तिकाओं से।
चलभाष का / बढ़ता प्रचलन / न भाए उन्हें।
लिखतीं तभी / हो दुखी हाइकु में / मंजूषा मन-
"किताब मेरी / लौटाई, थी उसमें / याद तेरी।" -पृष्ठ ३८
"मन न रँगा / रँग-रँग हारे तो / घरौंदा रँगा।" -पृष्ठ ४०
अनुभूतियाँ / सघन पिघलकर / बनीं हाइकु।
"साँस धौंकनी / चले अनवरत / आस झुलसे। -पृष्ठ ४५
"मन के भाव / कविता का रूप ले / बने लगाव।" -पृष्ठ ४८
गहराई है / विस्तार-ऊँचाई भी / हाइकुओं में।
जीवन दृष्टि / किए हैं समाहित / ये त्रिपदियाँ।
"फेंक आये हैं / सपनों की गठरी / बोझ बड़ा था।" -पृष्ठ ४८
"प्रकृति-रूप" / हाइकुकार को ही / बनाता भूप।
"नन्हीं गौरैया / तिनका चुनकर / संसार रचे।" -पृष्ठ ५७
"गुलमोहर / मन-बगिया फूला / जीवन झूला।'-पृष्ठ ६२
भारतीयता / भावनाओं का सिंधु / नवता घोले।
हाइकु पढ़े / उन्मन मन शांत / होकर डोले।
"अनजाने ही / जुड़ा मन का नाता / आपके संग।" -पृष्ठ ७१
हैं अनुभवी / आँखों ने पढ़ लिया / मन का दर्द।
नहीं बिसरी / स्वच्छता भारत की / हाइकुकार को।
सामाजिकता / सामयिकता भी है / नव आभा ले।
"अभियान ये / स्वच्छ भारत चला / हँसी धरती।' -पृष्ठ ८४
पढ़-गुनिए / ताँका छंद दे रहे / खूब आनंद।
"पगडंडी पे / मन झूमता जाए / खुशियाँ पाए।
और ये अचानक / दुःख कहाँ से आए?"         --पृष्ठ ८९
भाषा शैली है / यथोचित ही / हाइकुओं की।
शब्द-चयन / सम्यक-सटीक है / आनंद मिला।
आँसू-मुस्कान / छाँव-धूप सरीखी / है घुली-मिली।
 पठनीयता / सहज-सरलता / विशेषता है।
अपनापन / लुटा रहा है हर / हाइकु-ताँका।
जैसे बृज में / लीला कर रहा हो / कन्हैया बाँका।
"मैं सागर सी" / है सरस-सफल / आस जगाती।
मंजूषा मन / हिंदी काव्य भंडार / समृद्ध करें।

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समीक्षाकार संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, अनुडाक: salil.sanjiv@gmail.com, चलभाष: ७९९९५५९६१८, ९४२५१८३२४४।
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