गुरुवार, 3 जनवरी 2019

व्यंग्य लेख: वाह रे मातृभक्त!

एकदा भारतवर्षे सुरपुर सूचना मंत्री नारद महोदय अवतरित हुए। उन्होंने गौआधारित अर्थ व्यवस्था से संचालित देश में विदेशियों ताकतों द्वारा भैंसों के माध्यम से अर्थनीति और प्रकारान्तर से देशनीति को प्रभावित कर सरकार को कठपुतली की तरह नचाने की कोशिशों से जूझती लोकशक्ति की विजय का समाचार देवेंद्र को दिया। अपनी कुर्सी पर खतरे की आशंका का पूर्वानुमान कर देवेंद्र ने पुरोहित वर्ग का सहयोग लेकर महिष (भैंस) का बहिष्कार करनेवाली लोकशक्ति को महिषासुरमर्दिनी का उपासक बना दिया। देश के दुजितानेवाली लोकशक्ति दुर्गा शक्ति-साधकों की आराध्य हो गई। जननी जन्म भूमि को स्वर्ग से बेहतर बताकर सत्ता ने खुद को सुरक्षित मान लिया। 

समय बदला, आक्रांताओं ने गौपूजनजनित एकता से सशक्त हुए देश के गुलाम बनाने के लिए चंद गौओं को आगे रखकर हमला बोला। अंधभक्ति ने देशभक्तों की आँखों पर पट्टी का काम किया। हम घर में हार गए, हमलावर जीते ही नहीं सत्ता पर काबिज भी हो गए। कालांतर में शक्ति को एकत्रकर लोक-स्वातंत्र्य के लिए जूझनेवाली दुर्गावती, चेन्नम्मा व लक्ष्मीबाई भी माता ही कही गईं। अंग्रेजों के चंगुल से आजादी पाने के लिए लोकशक्ति को भारत माता कहकर 'वंदेमातरम' के जयघोष के साथ आत्माहुति देते साधुओं और शहीदों से वंदे मातरम् की विरासत सत्याग्रहियों ने ग्रहण कर ली।

सत्ता से टकराने-बदलने के स्थान पर सत्ता को साधकर काम कराने की कला को व्यावहारिक मानते हुए 'वंदे मातरम्' पर 'जनगण' के मन को प्राथमिकता मिल गई। लोक पर प्रशासन हावी होता गया। आत्मोत्सर्ग का सूत्र सत्ता प्राप्ति का उपकरण मात्र रह गया। भारत माता का भगवा वसन और कर का कमल सत्ता पाकर लोक विरोध की अनसुनी कर खेती का ख़ात्मा कर कारखानों की फसल उगाने की राह पर चल पड़ा। महामार्गों की आड़ में कृषि-भूमि हड़पने वाली नीति भूल गई कि सरकारी डंडा चलाकर कार्यालयों में गाने से राष्ट्रीयता नहीं पनपती। वंदे मातरम् गाकर काम कराने आई माता से रिश्वत लेने,  अकेले पाते ही माँ पर टूट पड़ने,  बूढ़ी होते ही माँ को घर से बाहर कर देने में छिपा अंतर्विरोध सत्ता की चकाचौंध में नहीं दिखता। 

कमलियों के पाखंड से ऊबी जनता ने सत्ता-सूत्र कमलनाथियों के हाथ पकड़ाया, इन पर भी पाखंड का भूत सवार होने लगा। विधायक बने चार दिन हुए नहीं कि जनप्रतिनिधि समय न होने का राग अलापकर लोकशक्ति को प्रतीक्षा कराने लगे, अपने और अपने चमचों के पैसे से स्वागत रैलियाँ कराने लगे, खुद अपना जयघोष करने लगे। जनप्रतिनिधि भूल गए कि इन्हें अपना गुणगान नहीं माँ की सेवा करनी है। वे वंदे मातरम् जरूरी कर मुँह की खा बैठे, ये वंदे मातरम् रोकने के व्याल-जाल में अपनी ढपली अपना राग अलाप कर अगली बार मुँह की खाने की जुगत कर रहे हैं। विनय भूल रहे विधायक लोक माता के कष्ट न हरकर चौबीस घंटे वंदे मातरम् जपें तो भी माँ प्रसन्न न होगी। माँ की वंदना का पथ लोकमाता की सुविधा जुटाना है,  सत्ता को प्रदर्शनप्रिय बनाना नहीं। 

राजनीति के गलियारों को समझना होगा कि वंदे मातरम् की माँ एक प्रतिमा मात्र नहीं,  देश की आम जनता है जिसे जग-हितकारी नीतियाँ चाहिए, जन जीवन में न्यूनतम हस्तक्षेप करनेवाली सरकार चाहिए, कमजोर का पक्ष लेनेवाला कानून, पुलिस और न्याय व्यवस्था चाहिए। अंतर्जाल पर अश्लील सामग्री रोकना मातृवंदना है या एक गीत गाना? यह सोचने का अवकाश किसी पास नहीं है।

हर दल और हर नेता की दृष्टि अगले चुनाव पर है। चुनाव में जिताने-हरानेवाली लोकमाता की अनदेखी कर माता की जयकारा लगाना सुविधाजनक भले ही हो पर उससे लक्ष्य नहीं मिल सकता। दोनों राष्ट्रीय दलों का यह मानना कि केवल वंदे मातरम् की दम पर सत्ता उनकी झोली में आ गिरेगी, सही नहीं है । लोकमाता के बड़े पूत नहीं सम्हले तो छोटे पूत अवसर चूकनेवाले नहीं हैं। लोकमाता भी 'तू नहीं और सही,  और नहीं और सही' की नीति अपना कर 'नोटा' का दाँव मारकर बिसात पर बाजी पलटना जान चुकी है। कमलियों के तमाम दाँव-पेंच 'नोटा' के आगे भोथरे सिद्ध हुए और मामा को भांजों ने जमीन सूँघा दी।

'हम नहीं सुधरेंगे' की जिद कर रहे बड़के बच्चे याद रखें कि इतिहास खुद को दोहराता है और यह भी कि इस देश में ऐसे भी प्रधानमंत्री हो गए हैं जिनके पास पाँच सांसद भी नहीं थे। तीन चौथाई बहुमत पाने की शाही गर्जनाओं का हश्र सामने है। अगली बार की लड़ाई वंदे मातरम' के नाम से नहीं काम से ही जीती जा सकती है । नारद जी सारे परिदृश्य को देखकर नारायण नारायण भूलकर वंदे मातरम् गुनगुनाते हुए चल पड़े हैं, सुरेंद्र को सूचित करने।                                                  *****


 

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