गुरुवार, 31 जनवरी 2019

व्यंग्य लेख: काम तमाम

व्यंग्य लेख:
काम तमाम
संजीव
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'मुझे राम से काम' जपकर कथनी-करनी एक रखनेवाले कबीर और तुलसी आज होते तो वर्तमान रामभक्तों की करतूतें देखकर क्या करते यह शोध का विषय है लेकिन इस पर शोध की नहीं जा सकती।
क्यों?
सब जानते हैं कि आजकल शोध की नहीं कराई जाती हैं और कराने के लिए पहले हो चुके शोधकार्यों से सामग्री निकालकर पुनर्व्यवस्थित कर ली जाती है। कुछ अति प्रतिभाशाली विभूतियाँ तकनीकी क्रांति का लाभ उठाने के कला जानती हैं। वे 'अंतर्जाल करे कमाल' का जयघोष किए बिना देशी-विदेशी जालस्थलों से संबंधित सामग्री जुटाने में जिस कौशल का परिचय देतीे हैं, उसे देख पाए तो ठग शिरोमणि नटवरलाल भी उन का शागिर्द हो जाए।

'काम से काम रखने' की सीख देनेवाले पुरखे नहीं रहे तो उनकी सीख ही क्यों रहे? अब तो बिना किसी काम हर किसी के फटे में टाँग अड़ाने का जमाना है। 'टाँग अड़ाने' भर से तो काम चलता नहीं, 'टाँग मारने' और कभी-कभी तो 'टाँग तोड़ने' की कला भी प्रदर्शित करनी पड़ती है, भले ही 'टाँग तुड़ाकर' वैसे ही लौटना पड़े जैसे बांग्लादेश और कारगिल से पाकिस्तान लौटा था।

हम हिंदुस्तानी वसुधैव कुटुंबकम्, विश्वैक नीड़म् आदि कहते ही नहीं, तहे-दिल से मानते भी हैं। तभी तो मेरा-तेरा का भेदभाव न कर जब जहाँ जो सामग्री मिले, उसे उपयोग कर अपना बना लेते हैं। किसी दूसरे की शोध सामग्री को हाथ न लगाकर हम उसे अछूत कैसे बना सकते हैं? हमारा संविधान छुआछूत को अपराध मानता है। हम इतने अधिक संविधान-परस्त हैं कि 'गरीब की लुगाई को गाँव की भौजाई' बनाने में पल भर की भी देर नहीं करते।

'राम से काम' हो तो उन्हें भगवान, मर्यादा पुरुषोत्तम और न जाने क्या-क्या कह देते हैं। काम न हो तो राम को भूलने में ही भलाई है। पिता के वचन का पूर्ति के लिए राज्य छोड़ने की जगह पिता को ही छोड़ देते हैं हम। हमें मालूम है ये सब रिश्ते-नाते छलना हैं,  हम रोज आरती में गाते हैं 'तुम बिन और न दूजा' फिर पिता के वचन से हमारा कोई नाता कैसे हो सकता है? राम जी यह सनातन सच भूल गए इसी लिए उन्हें 'न माया मिली न राम।'

हमने राम से सीख लेकर काम से काम रखने का जीवन-मंत्र अपना लिया है। अब 'सलिल तभी है राम का, रहे राम जब काम का' हमारा ध्येय-वाक्य है। इसलिए हम हर आम चुनाव के पहले राम का जीना हराम कर अलादीन के जिन्न की तरह, बावरी मस्जिद की बोतल से उसे बाहर निकाल लेते हैं और चुनाव जीतते ही निष्काम भाव से भुला देते हैं।

काम साधने की कला में श्याम राम से अधिक सफल हैं। इनके भक्तों को 'माया मिले न राम' उनके भक्तों के बनें हमेशा काम। ये अपने भक्त के जूठे बेर भी नहीं छोड़ते, वे अपने निर्धन भक्त को शाह (अमित न समझें) बना देते हैं।

काम साधने की कलाकारी करनेवाले कलाधर को सोलह हजार आठ सौ मिल गईं जबकि मर्यादा के लिए मरनेवाले की इकलौती भी नहीं  जी सकी। इसलिए 'खाने के दाँत और,  दिखाने के और' की बहुमूल्य विरासत को सहेजते-सम्हालते हमने राम को प्रचार में, श्याम को आचार में अपनाकर काम निकालने और काम बनाने का मौका भुनाने का मौका न चूककर काम साध लिया है

हमें भली-भाँति विदित है कि भारतीय जनता भोले शंकर की तरह मन ही मन काम को अपनाते हुए भी सार्वजनिक जीवन में काम के प्रकट होते ही उसे क्षार करने से नहीं चूकती। इससे दो काम बन जाते हैं। एक तो खुद निष्काम घोषित हो जाते हैं, दूसरे काम के अकाम होते ही रति तक पहुँचने की राह खुल जाती है।

'सबै भूमि गोपाल की यामें अटक कहाँ' इसलिए तमाम काम का काम तमाम करना ही जीवन का उद्देश्य बना लेने में ही समझदारी है। इतनी समझदारी हममें तो है,  आपमें न हो इसी में हमारी भलाई है। आप कोई गैर तो हैं नहीं। हमारी भलाई में ही आपकी भी भलाई है। हमें काम निकालने के काम आने में ही आपकी सार्थकता है। आप तमाम काम सधने की आस में दीजिए मत, और हमें करने दीजिए अगले पाँच साल तक अपना काम तमाम।
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३१-१-२०१९

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