सोमवार, 7 जनवरी 2019

geet

 एक रचना
*
भवन कविता का
मरम्मत चाहता है।
*
हाथ पर धर हाथ
बैठा सोचता कवि,
कथ्य की ईंटें
कहाँ सस्ती मिलेंगी?
भाव की सीमेंट के
हैं भाव ऊँचे,
रेत मँहगी स्वर्ण सी
कैसे जुटेगी?
शब्द की मिट्टी
जुटाए किस तरह कवि?
सूझता कवि को
न कोई रास्ता है।
भवन कविता का
मरम्मत चाहता है।
*
अब न कुंडी क्रियाओं की
लग रही है।
इमलिया कारक की
कहती है सुधारो।
अलंकारों सा हुआ
डिस्टेंपर भी,
चाहता है और थोड़ा
कवि निखारो।
नींव छंदों की
धसकने लग गई है।
रसों की छत से
न कोई वास्ता है।
भवन कविता का
मरम्मत चाहता है।
*
मिथक होता फर्श
'दो कुछ ध्यान' कहता।
द्वार टूटा बिंब सा
हर दर्द सहता। 
बटन बिजली के कहें
'कुछ शिल्प बदलो।'
मेज कमसिन
पड़ोसन को देख दहता।
श्वान भौंके
एक रोटी माँगता है।
भवन कविता का
मरम्मत चाहता है।
*
घड़ी ठिठकी
धुकधुकी इसकी चलाओ।
कहे जूता
बिन कहे पोलिश कराओ।
बिना पल्ले
सर उघाड़े ढीठ खिड़की-
तंज करती- 'जेब खाली
सर झुकाओ।'
उठा कागज-कलम
जग से मुँह छिपाओ।'
सुने या अनसुना ही
करदे जमाना।
कवि न हारे
एक श्रोता माँगता है।
भवन कविता का
मरम्मत चाहता है।
*
जब हटाया एक
दूजा मिला रोड़ा।
भानुमति ने हाय!
कुनबा व्यर्थ जोड़ा।
थमाई अँगुली जिसे
पहुँचा पकड़ता-
स्वार्थ सधता प्रिय,
न सधता तुरत छोड़ा। 
जिसे देते जन्म
वह ही दाहता है। 
भवन कविता का
मरम्मत चाहता है।
*

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