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सोमवार, 3 जुलाई 2017

kavita

एक रचना
*
प्रयासों की अस्थियों पर
सुसाधन के मांस बिन.
सफलता चमड़ी
शिथिल हो झूलती.
*
साँस का व्यापार अब
थम सा रहा है.
आस को मँहगाई विषधर
डँस रहा है.
अंकुरों को पतझड़ों का
पान-गुटखा सुहाया पर-
कालिया बन कैंसर
निज पाश में
नित कस रहा है.
तरलता संकल्प की
पथ भूलती.
*
ब्रांडेड मँहगी दवाई
लिख रही सरकार निर्दय.
नाम जी.एस.टी. रहे या
अन्य कोई.
चिढ़ाती मुख
आम जन को
शान-शौकत
ख़ास जन की.
आस्था जो न्याय पर थी
जा कचहरी कोटे काले
देख फंदा झूलती.
*



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