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शनिवार, 15 जुलाई 2017

geet

एक रचना 
अरुण शर्मा
*
रहा नहीं वह अमलतास अब
जिस पर गर्वित था घर सारा।
*
ठूँठ हो गये तरुवर सारे
कितने सावन साथ गुजारे।
झुकी हुई है कमर, बुढ़ापा
कल तक थे जो सबसे प्यारे।
प्यार परोसा जिस थाली ने
लुटी गयी वह रखवाली में-
नव पीढ़ी नव ख्वाब समेटे
विगत अकेला रहा बेचारा।
रहा नहीं वह अमलतास अब
जिस पर गर्वित था घर सारा।।
*
नन्हें पौधे पेड़ हो गये
पीपल-वट अब रेंड़ हो गये।
कल तक थाम चले ऊँगली जो
पंथ प्रदर्शक भेड़ हो गये।
माना टहनी सूख गयी है
पर आँखों में भूख वहीं है
जीवन के अंतिम पल में क्यों
नव पीढ़ी ने किया किनारा।
रहा नहीं वह अमलतास अब
जिस पर गर्वित था
 घर सारा।।
***
१५-७-२०१७ 
#divyanarmada.blogspot.com

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