शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

छंद सलिला: तीन बार हो भंग त्रिभंगी संजीव 'सलिल'

छंद सलिला:
तीन बार हो भंग त्रिभंगी 
संजीव 'सलिल'
*
त्रिभंगी 32 मात्राओं का छंद है जिसके हर पद की गति तीन बार भंग होकर चार चरणों (भागों) में विभाजित हो जाती है। प्राकृत पैन्गलम के अनुसार:
पढमं दह रहणं, अट्ठ विरहणं, पुणु वसु रहणं, रस रहणं।
अन्ते गुरु सोहइ, महिअल मोहइ, सिद्ध सराहइ, वर तरुणं।
जइ पलइ पओहर, किमइ मणोहर, हरइ कलेवर, तासु कई।
तिब्भन्गी छंदं, सुक्खाणंदं, भणइ फणिन्दो, विमल मई।   
 (संकेत: अष्ट वसु = 8, रस = 6)      
सारांश: प्रथम यति 10 मात्रा पर, दूसरी 8 मात्रा पर, तीसरी 8 मात्रा पर तथा चौथी 6 मात्रा पर हो। हर पदांत में गुरु हो तथा जगण (ISI लघु गुरु लघु ) कहीं न हो।

केशवदास की छंद माला में वर्णित लक्षण:
विरमहु दस पर, आठ पर, वसु पर, पुनि रस रेख। 
करहु त्रिभंगी छंद कहँ, जगन हीन इहि वेष।।
(संकेत: अष्ट वसु = 8, रस = 6)

भानुकवि के छंद-प्रभाकर के अनुसार:
दस बसु बसु संगी, जन रसरंगी, छंद त्रिभंगी, गंत भलो।
सब संत सुजाना, जाहि बखाना, सोइ पुराना, पन्थ चलो।
मोहन बनवारी, गिरवरधरी, कुञ्जबिहारी, पग परिये।
सब घट घट वासी मंगल रासी, रासविलासी उर धरिये।
(संकेत: बसु = 8, जन = जगण नहीं, गंत = गुरु से अंत)

सुर काज संवारन, अधम उघारन, दैत्य विदारन, टेक धरे।
प्रगटे गोकुल में, हरि छिन छिन में, नन्द हिये में, मोद भरे।

त्रिभंगी का मात्रिक सूत्र निम्नलिखित है
"बत्तिस कल संगी, बने त्रिभंगी, दश-अष्ट अष्ट षट गा-अन्ता"

लय सूत्र: धिन ताक धिना धिन, ताक धिना धिन, ताक धिना धिन, ताक धिना।

नाचत जसुदा को, लखिमनि छाको, तजत न ताको, एक छिना। 

उक्त में आभ्यंतर यतियों पर अन्त्यानुप्रास इंगित नहीं है किन्तु जैन कवि राजमल्ल ने 8 चौकल, अंत गुरु, 10-8-8-6 पर विरति, चरण में 3 यमक (तुक) तथा जगण निषेध इंगित कर पूर्ण परिभाषा दी है।

गुजराती छंद शास्त्री दलपत शास्त्री कृत दलपत पिंगल में 10-8-8-6 पर यति, अंत में गुरु, तथा यति पर तुक (जति पर अनुप्रासा, धरिए खासा) का निर्देश दिया है।

सारतः: त्रिभंगी छंद के लक्षण निम्न हैं:
1. त्रिभंगी 32 मात्राओं का (मात्रिक) छंद है।
2. त्रिभंगी समपाद छंद है। 
3. त्रिभंगी के हर चरणान्त (चौथे चरण के अंत) में गुरु आवश्यक है। इसे 2 लघु से बदलना नहीं चाहिए।  
4. त्रिभंगी के प्रत्येक चरण में 10-8-8-6 पर यति (विराम) आवश्यक है। मात्रा बाँट 8 चौकल अर्थात 8 बार चार-चार मात्रा के शब्द प्रावधानित हैं जिन्हें 2+4+4,  4+4, 4+4, 4+2 के अनुसार विभाजित किया जाता है। इस तरह 2 +  7x 4 +  2 = 32 सभी पदों में होती है।
5. त्रिभंगी के चौकल 7 मानें या 8 जगण का प्रयोग सभी में वर्जित है।
6. त्रिभंगी के हर पद में पहले दो चरणों के अंत में समान तुक हो किन्तु यह बंधन विविध पदों पर नहीं है।
7. त्रिभंगी के तीसरे चरण के अंत में लघु या गुरु कोई भी मात्रा हो सकती है किन्तु कुशल कवियों ने सभी पदों के तीसरे चरण की मात्रा एक सी रखी है।
8. त्रिभंगी के किसी भी मात्रिक गण में विषमकला नहीं है। सम कला के मात्रिक गण होने से मात्रिक मैत्री का नियम पालनीय है।
9. त्रिभंगी के प्रथम दो पदों के चौथे चरणों के अंत में समान तुक हो। इसी तरह अंतिम दो पदों के चौथे चरणों के अंत में सामान तुक हो। चारों पदों के अंत में समान तुक होने या न होने का उल्लेख कहीं नहीं मिला।  

उदाहरण:
1. महाकवि तुलसीदास रचित इस उदाहरण में तीसरे चरण की 8 मात्राएँ अगले शब्द के प्रथम अक्षर पर पूर्ण होती हैं, यह आदर्श स्थिति नहीं है किन्तु मान्य है।
धीरज मन कीन्हा, प्रभु मन चीन्हा, रघुपति कृपा भगति पाई।
पदकमल परागा, रस अनुरागा, मम मन मधुप करै पाना।
सोई पद पंकज, जेहि पूजत अज, मम सिर धरेउ कृपाल हरी।
जो अति मन भावा, सो बरु पावा, गै पतिलोक अनन्द भरी। 

2. तुलसी की ही निम्न पंक्तियों में हर पद का हर चरण आपने में पूर्ण है।
परसत  पद पावन, सोक नसावन, प्रगट भई तप, पुंज सही। 
देखत रघुनायक, जन सुख दायक, सनमुख हुइ कर, जोरि रही। 
अति प्रेम अधीरा, पुलक सरीरा, मुख नहिं आवै, वचन कही। 
अतिशय बड़भागी, चरनन लागी, जुगल नयन जल, धार बही।
यहाँ पहले 2 पदों में तीसरे चरण के अंत में 'प' तथा 'र' लघु (समान) हैं किन्तु अंतिम 2 पदों में तीसरे चरण के अंत में क्रमशः गुरु तथा लघु हैं।

3.महाकवि केशवदास की राम चन्द्रिका से एक त्रिभंगी छंद का आनंद लें:
सम सब घर सोभैं, मुनिमन लोभैं, रिपुगण छोभैं, देखि सबै।
बहु दुंदुभि बाजैं, जनु घन गाजैं, दिग्गज लाजैं, सुनत जबैं। 
जहँ तहँ श्रुति पढ़हीं, बिघन न बढ़हीं, जै जस मढ़हीं, सकल दिसा।
सबही सब विधि छम, बसत यथाक्रम, देव पुरी सम, दिवस निसा।
यहाँ पहले 2 पदों में तीसरे चरण के अंत में 'भैं' तथा 'जैं' गुरु (समान) हैं किन्तु अंतिम 2 पदों में तीसरे चरण के अंत में क्रमशः गुरु तथा लघु हैं। 

4. श्री गंगाप्रसाद बरसैंया कृत छंद क्षीरधि से तुलसी रचित त्रिभंगी छंद उद्धृत है:
रसराज रसायन, तुलसी गायन, श्री रामायण, मंजु लसी।
शारद शुचि सेवक, हंस बने बक, जन कर मन हुलसी हुलसी।
रघुवर रस सागर, भर लघु गागर, पाप सनी मति, गइ धुल सी।
कुंजी रामायण, के पारायण, से गइ मुक्ति राह खुल सी।
टीप: चौथे पद में तीसरे-चौथे चरण की मात्राएँ 14 हैं किन्तु उन्हें पृथक नहीं किया जा सकता चूंकि 'राह' को 'र'+'आह' नहीं लिखा जा सकता। यह आदर्श स्थिति  नहीं है। इससे बचा जाना चाहिए। इसी तरह 'गई' को 'गइ' लिखना अवधी में सही है किन्तु हिंदी में दोष माना जाएगा।

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त्रिभंगी छंद के कुछ अन्य उदाहरण निम्नलिखित हैं

री शान्ति जिनेशं, नुतशक्रेशं, वृषचक्रेशं चक्रेशं |
हनि अरिचक्रेशं, हे गुनधेशं, दयाऽमृतेशं, मक्रेशं |
मंदार सरोजं, कदली जोजं, पुंज भरोजं, मलयभरं |
भरि कंचनथारी, तुमढिग धारी, मदनविदारी, धीरधरं ||    
--रचनाकार : ज्ञात नहीं

रस-सागर पाकर, कवि ने आकर, अंजलि भर रस-पान किया.
ज्यों-ज्यों रस पाया, मन भरमाया, तन हर्षाया, मस्त हिया..
कविता सविता सी, ले नवता सी, प्रगटी जैसे जला दिया.
सारस्वत पूजा, करे न दूजा, करे 'सलिल' ज्यों अमिय पिया..
-- संजीव 'सलिल'

साजै मन सूरा, निरगुन नूरा, जोग जरूरा, भरपूरा ,
दीसे नहि दूरा, हरी हजूरा, परख्या पूरा, घट मूरा
जो मिले मजूरा, एष्ट सबूरा, दुःख हो दूरा, मोजीशा
आतम तत आशा, जोग जुलासा, श्वांस ऊसासा, सुखवासा ||
--शम्भुदान चारण

जनश्रुति / क्षेपक- रामचरितमानस में बालकाण्ड में अहल्योद्धार के प्रकरण में चार (४) त्रिभङ्गी छंद प्रयुक्त हुए हैं. कहा जाता है कि इसका कारण यह है कि अपने चरण से अहल्या माता को छूकर प्रभु श्रीराम ने अहल्या के पाप, ताप और शाप को भङ्ग (समाप्त) किया था, अतः गोस्वामी जी की वाणी से सरस्वतीजी ने त्रिभङ्गी छन्द को प्रकट किया.
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12 टिप्‍पणियां:

Mahipal Singh Tomar द्वारा yahoogroups.com ने कहा…

Mahipal Tomar द्वारा yahoogroups.com


केवल -
जय हो ,जय हो , जय, हो ।
आचार्य 'सलिल ' जी ,रत्न शिरोमणि ,
डंके की चोट पर ,कोई मुकाबिला नहीं ।
बस ,साधुवाद और आपकी शालीनता ,
गंभीरता ,विद्वता को नमन बस नमन ।
बहुत आदर के साथ -
महिपाल ,25 जनवरी 2013

sanjiv salil ने कहा…

अग्रज का aआशीष ही, रहा सलिल kaका saसाध्य।
दें वर- maमाता शारदा-hहिंदी hहो aआराध्य।।

Saurabh Pandey ने कहा…

Saurabh Pandey

सही, सटीक प्रस्तुति, आदरणीय आचार्यजी.

त्रिभंगी ही नहीं किसी छंद की आदर्श स्थिति का होना, न होना अलग, इसकी विशद स्वीकार्यता उक्त छंद को विशिष्ट और अनुकरणीय बनाता है. तभी यह उक्ति सामने आती है, कि तुलसीदास रचित इस उदाहरण में तीसरे चरण की 8 मात्राएँ अगले शब्द के प्रथम अक्षर पर पूर्ण होती हैं, यह आदर्श स्थिति नहीं है किन्तु मान्य है. तभी, आदरणीय, हमने निवेदन किया था और अबभी कायम हूँ, कि आलेख प्रस्तुतिकरण के क्रम में दायित्व-बोध अवश्य ही संयत और शोधपरक होने की अपेक्षा करता है. हम किसी पुस्तक-विशेष पर या किसी मान्यता-विशेष पर अतिनिर्भर होकर तार्किक न हों.

आपकी विशद प्रस्तुति से बहुत कुछ स्पष्ट हुआ है. इस सफल प्रयास से नव-हस्ताक्षरों और गंभीर रचनाकर्मियों के लिए बेहतर वातावरण उपलब्ध हुआ है, सुलभ मार्ग प्रशस्त हुआ है. आपकी सोदाहरण प्रस्तुति सूत्रात्मकता पर समृद्ध कारिका तरह समक्ष है.

सादर

Pranava Bharti ने कहा…

Pranava Bharti द्वारा yahoogroups.com

आचार्य जी,
आपके ज्ञान के सम्मुख नतमस्तक!
सादर
प्रणव

Er. Ambarish Srivastava ने कहा…

Er. Ambarish Srivastava

आदरणीय गुरुदेव को सादर प्रणाम,

उपरोक्त आलेख हम सभी के लिए दिशा निर्देशक व अत्यंत उपयोगी है ! इसे विस्तार से साझा करने के लिए हार्दिक आभार आदरणीय | साद्र्र |

Mukesh Srivastava ने कहा…

Mukesh Srivastava, kavyadhara

आदरणीय संजीव जी,

कमाल!

सादर,
मुकेश

s n sharma 'kamal' ने कहा…

sn Sharma द्वारा yahoogroups.com

आ0 आचार्य जी,
त्रिभंगी छंद पर सोदाहरण सार्थक व्याख्या हेतु
आपका शत शत आभार ।
सादर
कमल

Indira Pratap ने कहा…

Indira Pratap द्वारा yahoogroups.com


संजीव भाई ,
जानकारी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया, मुझे तो इस छंद के बारे में कुछ पता ही नहीं था| सिर्फ केशव दास की रामचंद्रिका पढ़ी थी जो अब कुछ भी याद नहीं है बस इतना याद है कि प्रश्नपत्र में एक प्रश्न अक्सर पूछा जाता था कि केशव दस को कठिन काव्य के प्रेत क्यों कहा जाता है ? और भाई हम तो इस प्रश्न से ही डर जाते थे | आपका गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में लिखा गीत पढ़ कर बहुत अच्छा लगा | दिद्दा

Santosh Bhauwala ने कहा…

Santosh Bhauwala yahoogroups.com


आदरणीय सलिल जी ,

आपका छंद ज्ञान देख कर निः शब्द हूँ ,हम सब से बांटने के लिए शत शत आभार !


सादर संतोष भाऊवाला

Dr.Prachi Singh ने कहा…

Dr.Prachi Singh

आदरणीय सजीव जी,

सादर प्रणाम!

मेरे संशय को धैर्यपूर्वक, इतनी गहनता से समझा कर निराकरण करने के लिए, और स्वयं सूर्य की तरह अपने ज्ञान के आलोक से मेरे मन में उपजे संशय रूपी अज्ञान के अंधकार को हर, सर्वथा उचित मार्गदर्शन देने के लिए मैं आपकी शत शत आभारी हूँ.

आपका आशीर्वाद यूं ही हमारा मार्ग प्रशस्त करता रहे, ऐसी ही कामना है. सादर.

Om Prakash Tiwari ने कहा…

Om Prakash Tiwari yahoogroups.com

आदरणीय आचार्य जी,
इस छंद के बारे में दिया गया उदाहरण सहित ज्ञान बहुत संग्रहणीय एवं महत्त्वपूर्ण है। यह ज्ञान देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद ।
सादर
ओमप्रकाश तिवारी

Pranava Bharti ने कहा…

Pranava Bharti द्वारा yahoogroups.com

आ सलिल जी ,
इतने सारे ज्ञान को बांटने के लिएमेरे पास तो आपके आभार हेतु भी शब्द नहीं हैं।
इस ज्ञान को समझने के लिए भी गंभीर समय की आवश्यकता है।
अभी तो इसे 'फाइल' करके समय निकालकर मस्तिष्क में उतारना होगा।
आपके बहुत 2 आभारी हैं।
सादर
प्रणव