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सोमवार, 21 जनवरी 2013

गजल: मनोहर चौबे 'आकाश'

गजल:
मनोहर चौबे 'आकाश'
*
कैसे उनको  अपना मानें, हैं जिनके विश्वास अलग।
आँखें आँसू अलग-अलग हैं, पीडायें संत्रास अलग।।

उनके आँगन बारिश लेकिन, हैं अपने आँगन सूखे।
अलग-अलग हैं सावन-बादल, हैं उनके मधुमास अलग।।

भोगी है हमने भी मुश्किल, भूख गरीबी बरबादी ।
लेकिन किये जा रहे हमसे, उनके प्रगति विकास अलग।।

हो चाहे अपराध एक ही, अलग सजा हमको उनको
हैं क्या थाना पुलिस अदालत, होते कारावास अलग।।

हम बलिपशु का भाग्य लिए हैं, वे खांडा जल्लादों का।
होते उनके त्योहारों के, सारे ही अंदाज़ अलग।।  

है हमको चुल्लू भर पानी, पर उनका पूरा सागर।
आखिर कौन बता सकता है, क्यों है उनकी प्यास अलग?

हमको रोते उनको भोजन, हम जीते हैं वे रहते।
उन्हें मिले वरदान समय के, हमें मिले अभिशाप अलग।।

कैसे बतलाएं हम कितना, है पीड़ादायक अनुभव।
होते उन जैसे लोगों के, क्यों धरती ''आकाश'' अलग।।

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