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बुधवार, 9 जनवरी 2013

दो कवितायेँ: पंखुरी सिन्हा

दो कवितायेँ:
पंखुरी सिन्हा
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1. सवाल का हल
जो हल कर रही हो तुम,
वो सवाल नहीं है,
सवाल ये नहीं है,
कि मेरे तुम्हारे बीच क्या है,
कितना प्यार, कितनी नफरत,
आक्रोश कितना, गणित कितना,
सवाल ये है कि वो लोग कहाँ हैं,
हमारे कितने दूर, कितने पास,
जो तय कर रहे हैं,
कि हमारे बीच क्या हो,
क्या ये सच नहीं है?
कि वो आसपास हैं,
करीब हमारे?
*
2. पश्चिम की ओर की खिड़की
प्राकृतिक विपदायों की त्रासदी थी,
कोई उनकी लगाम बनाकर,
कर रहा था शासन,
दूर और पास,
किन्ही ख़ास ज़िन्दिगों पर,
और उसे जैसे हर रात ये लगता रहा था,
कि एक खिड़की खुली छूट गयी है,
और घर लौटकर बंद करना है उसे।
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1 टिप्पणी:

PAnkhuri Sinha ने कहा…

Many thanks Salil ji. Very nice blog.