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रविवार, 2 फ़रवरी 2020

सुनीता सिंह ओस की बून्द

पुरोवाक

ओस की बूँद - भावनाओं का सागर

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*

सर्वमान्य सत्य है कि सृष्टि का निर्माण दो परस्पर विपरीत आवेगों के सम्मिलन का परिणाम है। धर्म दर्शन का ब्रह्म निर्मित कण हो या विज्ञान का महाविस्फोट (बिग बैंग) से उत्पन्न आदि कण (गॉड पार्टिकल) दोनों आवेग ही हैं जिनमें दो विपरीत आवेश समाहित हैं।  इन्हें पुरुष-प्रकृति कहें या पॉजिटिव-निगेटिव इनर्जी, ये दोनों एक दूसरे से विपरीत (विरोधी नहीं) तथा एक दूसरे के पूरक (समान नहीं) हैं।  इन दोनों के मध्य राग-विराग, आकर्षण-विकर्षण ही प्रकृति की उत्पत्ति, विकास और विनाश का करक होता है। मानव तथा मानवेतर प्रकृति के मध्य राग-विराग की शाब्दिक अनुभूति ही कविता है। सृष्टि में अनुभूतियों को अभियक्त करने की सर्वाधिक क्षमता मनुष्य में है। अपने अस्तित्व की रक्षा करने के लिए मनुष्य को संघर्ष, सहयोग और सृजन तीनों चरणों से साक्षात करना होता है। इन तीनों ही क्रियाओं में अनुभूत को अभिव्यक्त करना अपरिहार्य है। अभिव्यक्ति में रस और लास्य (सौंदर्य) का समावेश कला को जन्म देता है। रस और लास्य जब शब्दाश्रित हों तो साहित्य कहलाता है। मनुष्य के मन की रमणीय, और लालित्यपूर्ण सरस अभिव्यक्ति लय (गति-यति)  के एककारित होकर काव्य कला की संज्ञा पाती हैं।  काव्य कला साहित्य (हितेन सहितं अर्थात हित के साथ) का अंग है। साहित्य के अंग बुद्धि तत्व, भाव तत्व, कल्पना तत्व, कला तत्व ही काव्य के तत्व हैं। 

काव्य प्रकाशकार मम्मट के अनुसार "तद्दौषौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृति पुन: क्वापि" अर्थात काव्य ऐसी  जिसके शब्दों और अर्थों में दोष नहीं हो किन्तु गुण अवश्य हों,  चाहे अलंकार कहीं कहीं न भी हों। जगन्नाथ के मत में "रमणीयार्थ प्रतिपादक: शब्द: काव्यम्"  रमणीय अर्थ प्रतिपादित करने वाले शब्द ही काव्य हैं। अंबिकादत्त व्यास के शब्दों में "लोकोत्तरआनंददाता प्रबंधक: काव्यानामभक्" जिस रचना का वचन कर लोकोत्तर आनंद की प्राप्ति हो, वही काव्य है। विश्वनाथ के मत में "रसात्मकं वाक्यं काव्यं" रसात्मक वाक्य ही काव्य हैं। 

हिंदी के शिखर समालोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के मतानुसार कविता से मनुष्य-भाव की रक्षा होती है। सृष्टि के पदार्थ या व्यापार-विशेष को कविता इस तरह व्यक्त करती है मानो वे पदार्थ या व्यापार-विशेष नेत्रों के सामने नाचने लगते हैं। वे मूर्तिमान दिखाई देने लगते हैं। उनकी उत्तमता या अनुत्तमता का विवेचन करने में बुद्धि से काम लेने की जरूरत नहीं पड़ती। कविता की प्रेरणा से मनोवेगों के प्रवाह जोर से बहने लगते हैं। तात्पर्य यह कि कविता मनोवेगों को उत्तेजित करने का एक उत्तम साधन है। यदि क्रोध, करूणा, दया, प्रेम आदि मनोभाव मनुष्य के अन्तःकरण से निकल जाएँ तो वह कुछ भी नहीं कर सकता। कविता हमारे मनोभावों को उच्छवासित करके हमारे जीवन में एक नया जीव डाल देती है। 

मेरे विचार से काव्य वह भावपूर्ण रसपूर्ण लयबद्ध रचना है जो मानवानुभूति को अभिव्यक्त कर पाठक-श्रोता के ह्रदय को प्रभावित क्र उसके मन में अलौकिक आनंद का संचार करती है। मानवानुभूति स्वयं की भी हो सकती है जैसे 'मैं नीर भरी दुःख की बदली, उमड़ी थी कल मिट आज चली .... ' नयनों में दीपक से जलते, पलकों में निर्झरिणी मचली - महादेवी वर्मा या किसी अन्य की भी हो सकती है यथा 'वह आता पछताता पथ पर आता, पेट-पीठ दोनों हैं मिलकर एक, चल रहा लकुटिया टेक, मुट्ठी भर दाने को, भूख मिटाने को, मुँह फ़टी पुरानी झोली का फैलाता -निराला।  कविता कवि की अनुभूति को पाठकों - श्रोताओं तक पहुँचाती है। वह मानव जीवन की सरस् एवं हृदयग्राही व्याख्या कर लोकोत्तर आनंद की सृष्टि ही नहीं वृष्टि भी करती है। इह लोक (संसार) में रहते हुए भी कवि हुए पाठक या श्रोता अपूर्व भाव लोक में विचरण करने लगता है। काव्यानंद ही न हो तो कविता बेस्वाद या स्वाधीन भोजनकी तरह निस्सार प्रतीत होगी, तब उसे न कोई पढ़ना चाहेगा, न सुनना। 

काव्यानंद क्या है? भारतीय काव्य शास्त्रियों ने काव्यानंद को परखने के लिए काव्यालोचन की ६ पद्धतियों की विवेचना की है जिन्हें १. रस पद्धति, २. अलंकार पद्धति, ३. रीति पद्धति, ४. वक्रोक्ति पद्धति, ५. ध्वनि पद्धति तथा ६. औचित्य पद्धति कहा गया है। साहित्य शास्त्र के प्रथम तत्वविद भरत तथा नंदिकेश्वर ने नाट्य शास्त्र में रूपक की विवेचना करते हुए रस को प्रधान तत्व कहा है। पश्चात्वर्ती आचार्य काव्य के बाह्य रूप या शिल्पगत तत्वों तक सीमित रह गए। दण्डी के अनुसार 'काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते' अर्थात काव्य की शोभा तथा धर्म अलंकार है। वामन रीति (विशिष्ट पद रचना, शब्द या भाव योजना) को काव्य की आत्मा कहा "रीतिरात्मा काव्यस्य"। कुंतक ने "वक्रोक्ति: काव्य जीवितं" कहकर उक्ति वैचित्र्य को प्रमुखता दी। ध्वनि अर्थात नाद सौंदर्य को आनंदवर्धन ने काव्य की आत्मा बताया "काव्यस्यात्मा ध्वनिरीति"। क्षेमेंद्र की दृष्टि में औचित्य ही काव्य रचना का प्रमुख तत्व है "औचित्यं रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितं"।  भरत के मत का अनुमोदन करते हुए विश्वनाथ ने रस को काव्य की आत्मा कहा है। अग्नि पुराणकार "वाग्वैदग्ध्यप्रधानेsपि रस एवात्र जीवितं" कहकर रस को ही प्रधानता देता है। स्पष्ट है कि शब्द और अर्थ काव्य-पुरुष के  आभूषण हैं जबकि रस उसकी आत्मा है। 

शिल्प पर कथ्य को वरीयता देने की यह सनातन परंपरा जीवित है युवा कवयित्री सुनीता सिंह के काव्य संग्रह 'ओस की बूँद' में। सुनीता परंपरा का निर्वहन मात्र नहीं करतीं, उसे जीवंतता भी प्रदान करती हैं। ईश वंदना से श्री गणेश करने की विरासत को ग्रहण करते हुए 'शिव धुन' में वे जगतपिता से सकल शूल विनाशन की प्रार्थना करती हैं - 

पाशविमोचन भव गणनाथन!  कर दो सारे शूल विनाशन॥
महाकाल सुरसूदन कवची!
पीड़ा तक परिणति जा पहुँची।
गिरिधन्वा गिरिप्रिय कृतिवासा!
दे दो हिय में आन दिलासा ॥
पशुपतिनाथ पुरंदर पावन! कर दो सारे शूल विनाशन॥
पाशविमोचन भव गणनाथन!  कर दो सारे शूल विनाशन॥

शिव राग और विराग को सम भाव से जीते हैं। कामारि होते हुए भी अर्धनारीश्वर हैं। शिवाराधिका को प्रणय का रेशमी बंधन लघुता में विराट की अनुभूति कराता है-  

नाजुक सी रेशम डोरी से, मन के गहरे सागर में।
बांध रहे हो प्राण हमारे, प्रियतम किरणों के घर में।।
अंतरतम में चिर - परिचित सा,
अक्स उभरता किंचित सा।
सदियों का ये बंधन लगता,
लघुता में भी विस्तृत सा।।
अब तक की सारी सुलझन भी, उलझ गई इस मंजर में।
बांध रहे हो प्राण हमारे, प्रियतम किरणों के घर में।।

तुम मुझको याद आओगे, शीर्षक गीत श्रृंगार के विविध पक्षों को शब्दायित करते हैं। 

सुनीता की नारी समाज के आहतों स्त्री-गौरव की अवहेलना देखकर आक्रोशित और दुखी होती है। "नहिं तव आदि मध्य अवसाना, अमित प्रभाव वेद नहिं जाना" कहकर नारी की वंदना करनेवाले समाज में बालिका भ्रूण हत्या का महापाप होते देख कवयित्री 'कन्या भ्रूण संवाद' में अपनी मनोवेदना को मुखर करती है - 

चलती साँस पर भी चली जब,
कैचियों की धारियां, ये तो बताओ।
एक-एक कर कट रहे सभी,
अंग की थी बारियाँ, ये तो सुनाओ।
फिर मौन चीखो से निकलता,
आह का होगा धुआं, क्या कह सकोगी?
क्या सोच कर, आयी यहाँ पर,
और क्या तुमको मिला, क्या कह सकोगी?

इस संकलन का वैशिष्ट्य उन पहलुओं को स्पर्श करना है जो प्राय: गीतकारों की दृष्टि से ओझल हो जाते हैं। काम काजी माँ के बच्चे की व्यथा कथा कहता गीत 'खड़ा गेट पर' मर्मस्पर्शी है -

खड़ा गेट पर राह तुम्हारी, देखा करता हूँ मैं माँ ।
शाम हो गई अब आओगी, ऑफिस से जानू मैं माँ ॥

रोज सवेरे मुझे छोड़ कर,
कैसे आखिर जाती हो ?
कैसे मेरे रोने पर भी,
तुम खुद को समझाती हो ?

बिना तुम्हारे दिन भर रहना, बहुत अखरता मुझको माँ ।
खड़ा गेट पर राह तुम्हारी, देखा करता हूँ मैं माँ ॥


सावन को मनभावन कहा गया है। सुनीता सावन को अपनी ही दृष्टि से देखती हैं। सावनी बौछारों से मधु वर्षण, मृदा का रससिक्त होना, कण-कण में आकर्षण, पत्तों का धुलना, अवयवों का नर्तन करना,  धरा का हरिताम्बरा होना गीत को पूर्णता प्रदान करता है।  

मृदा आसवित, वर्षा जल को,
अंतःतल ले जाती।
तृण की फैली, दरी मखमली,
भीग ओस से जाती।
बादल से घन, छनकर दशहन, निर्झर झरते जाते।
हर क्षण कण-कण, में आकर्षण, सरगम भरते जाते।

गीतिकाव्य का उद्गम दर्द या पीड़ा से मान्य है। कवयित्री अंतिम खत कोरा रखकर अर्थात कुछ न कहकर भी सब कुछ कह देने  को ही काव्य कला का चरम मानती हैं। ग़ालिब कहते हैं 'दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना'। अति क्रंदन के पार उतर कर ही दिल को हँसते पाती हैं।  

शब्दहीन था कोरा-कोरा, मौन पीर का था गठजोरा।
इतना पीड़ा ने झकझोरा, छोड़ दिया अंतिम खत कोरा।।
अंधियारे में बादल बनकर,
अखियाँ बरसीं अंतस कर तर।
राहें सूझें भी तो कैसे?
जड़ जब होती रूह सिहरकर।।
अति क्रंदन के पार उतर ही, खोल हँसा दिल पोरा- पोरा। 

'हृदय तल के गहरे समंदर में तैरें, / ये ख्वाबों की मीने मचलती बड़ी हैं' , 'मैं लिखती नहीं गीत लिख जाता है' , 'दर्द का मोती सजाए / ह्रदय की सीपी लहे', 'क्षण-प्रतिक्षण नूतन परिवर्तन / विस्मय करते नित दृग लोचन',  'प्रीत चुनरिया सिर पर ओढ़ी / बीच रंग के कोरी थोड़ी', 'झंझा की तम लपटों से, लड़कर भी जीना सीखो / तीखा मीठा जो भी है, जीवन रस पीना सीखो', 'सन सनन सन वायु लहरे, घन घनन घन मेघ बरसे / मन मयूरा पंख खोले', मौसमों को देख हरसे', 'तकते - तकते नयना थकते, मन सागर बीहड़ मथते, प्राण डगर अमृत वर्षा के, धुंध भरी पीड़ा चखते' जैसी अभिव्यक्तियाँ आश्वस्त करती हैं कि कवयित्री  सुनीता का गीतकार क्रमश: परिपक्व हो रहा है। गीत की कहन और  ग़ज़ल की तर्ज़े-बयानी के अंतर को समझकर और अलग-अलग रखकर रचे ेगयी रचनाएँ अपेक्षाकृत अधिक प्रभावमय हैं। 

इन गीतों में भक्ति काल और रीतिकाल को गलबहियां डाले देखना सुखद है।  सरस्वती, शिव, राम, कृष्ण आदि पर केंद्रित रचनाओं के साथ 'प्रीत तेरी मान मेरा, रूह का परिधान है / हाथ तेरा हाथ में जब, हर सफर आसान है', 'देख छटा मौसम की मन का, मयूर - नर्तन करता है' जैसी अंतर्मुखी अभिव्यक्तियों के साथ बहिर्मुखता का गंगो-जमुनी सम्मिश्रण इन गीतों को पठनीय और श्रणीय बनाता है। 
कर में लेकर, गीली माटी,
अगर कहो तो।
नव प्रयोग भी, करने होंगे
माटी की संरचनाओं में।
सांचे लेकर, कुम्हारों के
रंग भरेंगे घटनाओं में।
किरण-किरण को, भर कण-कण में,
रौशन भी कर, दूं रज खाटी,
अगर कहो तो।

यह देखना रुचिकर होगा कि सुनीता की यह सृजन यात्रा  भविष्य में किस दिशा में बढ़ती है? वे पारम्परिक गीत ही रचती हैं या नवगीत की और मुड़ती हैं। उनमें संवेदना, शब्द भंडार तथा अभिव्यक्ति सामर्थ्य की त्रिवेणी प्रवाहित हो रही है। इन रचनाओं में व्यंग्योक्ति और वक्रोक्ति की अनुपस्थिति है जो नवगीत हेतु आवश्यक है। सुनीता की भाषा प्रकृति से ही आलंकारिक  है। उन्हें अलंकार ठूँसना नहीं पड़ते, स्वाभाविक रूप से अनुप्रास, रूपक, उपमा, उत्प्रेक्षा अपनी छटा बखेरते हैं। प्रसाद गुण सम्पन्न भाषा गीतों को माधुर्य देती है। युवा होते हुए भी अतिरेकी 'स्त्री विमर्श', राजनैतिक परिदृश्य और अनावश्यक विद्रोह से बच पाना उनके धीर-गंभीर व्यक्तित्व के अनुकूल होने के साथ उनकी गीति रचनाओं को संतुलित और सारगर्भित बनाता है। मुझे विश्वास है यह संकलन पाठकों और समलीचकों दोनों के द्वारा सराहा जायेगा। 
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संपर्क - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल, विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर  ४८२००१, चलभाष - ९४२५१८३२४४, ७१११५५९६१८ , ईमेल - salil.sanjiv@gmail.com    

 पुनर्विचार :

१. बंधन, पंछी आदि में 'न्' की, आडंबर में 'म्'  की जो ध्वनि है क्या वह आँधी, बाँध आदि में है? जहाँ वह ध्वनि हो वहां बिंदी, जहाँ न हो वहाँ चंद्रबिंदी।  
२. माँ शारदे से संग्रह आरंभ करिये। 
३. 'इक' का प्रयोग दोषपूर्ण है। इसके स्थान पर 'यह' या 'हर' का प्रयोग किया जा सकता है। 
४.  ३१ और ४० पर एक ही गीत है।


सुनीता सिंह ओस की बून्द

1--शिव-धुन
पाशविमोचन भव गणनाथन!  कर दो सारे शूल विनाशन॥
महाकाल सुरसूदन कवची!
पीड़ा तक परिणति जा पहुँची।
गिरिधन्वा गिरिप्रिय कृतिवासा!
दे दो हिय में आन दिलासा ॥
पशुपतिनाथ पुरंदर पावन! कर दो सारे शूल विनाशन॥
पाशविमोचन भव गणनाथन!  कर दो सारे शूल विनाशन॥

त्रिपुरान्तक अव्यय मृगपाणी!
कर दो सत् शिव सुंदर वाणी।
परमेश्वर अज  शंभू-शंकर!
जीवन हो जाये अभयंकर॥
नीलकंठ नटराज निरंजन! कर दो सारे शूल विनाशन॥
पाशविमोचन भव गणनाथन!  कर दो सारे शूल विनाशन॥
वृषभारुढ़ परमेश दिगंबर!
बिंदु सरीखे धरती अंबर।
त्रिलोकेश सर्वज्ञ कृपानिधि!
ओम धुन हो सानिध्य साविधि॥
अरिष्टनेमि अरिंदम अभदन! कर दो सारे शूल विनाशन॥
पाशविमोचन भव गणनाथन!  कर दो सारे शूल विनाशन॥

विष्णुबल्लभ नाथ अंबिका!
द्वार दिखा दो हमें मुक्ति का।
भुजंगभूषण हरि सर्वेश्वर!
सोम सुदर्शन सिद्ध महेश्वर!
अजातारि अर्हत मनभावन! कर दो सारे शूल विनाशन॥
पाशविमोचन भव गणनाथन!  कर दो सारे शूल विनाशन॥

दक्षाध्वरहर देव दिगंबर!
परशुहस्त प्रथमाधिप शिवहर!
महादेव मृत्युंजय तारक!
शाश्वत सात्विक गंगा धारक!
अंगिरा गुरु अनेक लोचन!  कर दो सारे शूल विनाशन॥
पाशविमोचन भव गणनाथन!  कर दो सारे शूल विनाशन॥

भालचंद्र भुवनेश भगाली!
विषपायी वृषकेतु कपाली!
अक्षमाली अमोघ त्रिपुरारि!
त्रियंबक हुत कामरिपु दक्षारि!
अर्पण अंतस तन-मन जीवन! कर दो सारे शूल विनाशन॥
पाशविमोचन भव गणनाथन!  कर दो सारे शूल विनाशन॥

ज्योतिर्मय जमदग्नि जटाधर!
शितिकंठ शर्व भव शशि शेखर!
पुराराति श्रीकंठ पिनाकी!
छवि पालक सी परमपिता की।
भालचंद्र भुवनेश सुदर्शन! कर दो सारे शूल विनाशन॥
पाशविमोचन भव गणनाथन!  कर दो सारे शूल विनाशन॥

कालकंठ कामारि कलंदर!
प्रथम प्रभाकर प्रभु प्रलयंकर!
गिरिजापति गोनर्द गरलधर!
वामदेव खटवांगी हरिशर!

पूषदन्तभित् प्रलय प्रभंजन!  कर दो सारे शूल विनाशन॥
पाशविमोचन भव गणनाथन!  कर दो सारे शूल विनाशन॥

काशीनाथ कलाधर शेखर!
भैरव भोले प्रभु गंगाधर!
महादेव महत योगेश्वर!
भूतनाथ पशुपति प्रथमेश्वर!
अनघ अपानिधि काशीनाथन! कर दो सारे शूल विनाशन॥
पाशविमोचन भव गणनाथन!  कर दो सारे शूल विनाशन॥

2-- रेशम डोरी

नाजुक सी रेशम डोरी से, मन के गहरे सागर में।
बांध रहे हो प्राण हमारे, प्रियतम किरणों के घर में।।
अंतरतम में चिर - परिचित सा,
अक्स उभरता किंचित सा।
सदियों का ये बंधन लगता,
लघुता में भी विस्तृत सा।।
अब तक की सारी सुलझन भी, उलझ गई इस मंजर में।
बांध रहे हो प्राण हमारे, प्रियतम किरणों के घर में।।
निष्ठुर होती धारा जग की,
कूक मिटा देती खग की।
मन कोरा ही रह जाने दो,
कर्कश आंधी इस मग की।।
कोंपल किसलय धरती पर घन, बादल छाए अम्बर में।
बांध रहे हो प्राण हमारे, प्रियतम किरणों के घर में।।
नयनों को जुगनू बनने दो,
दीपक जैसे जलने दो।
मन के अँधियारे कानन में,
कुछ किरणें भी पलने दो।।

बनो खरा कंचन सा प्रियवर, इस जग के आडंबर में।
बांध रहे हो प्राण हमारे, प्रियतम किरणों के घर में।।

3 --तुम मुझको याद आओगे

कुदरत के हर एक सफर में, तुम मुझको याद आओगे।

जब सुबह सुहानी निकलेगी, जब पंछी झूम के गायेंगे।
जब उजली किरणों में मंजर, स्याह रात के गुम जायेंगे।।
जब कोमल घासों की मखमल, शबनम को अंक लगाएगी।
जब रक्त घुली नीली स्याही, विष का तर्पण कर जाएगी।।

जीवन देते हर मधु स्वर में, तुम मुझको याद आओगे।।
कुदरत के हर एक सफर में, तुम मुझको याद आओगे।

जब सूरज धीरे-धीरे चढ़, सिर के ऊपर आ जाएगा।
जब नीम दुपहरी तप्त धरा, पर और आग बरसाएगा।।
जब लू की गर्म हवाओं के, पर और क्रूर हो जायेंगे।
जब साँसे लेना दूभर होगा, मरने के क्षण आयेंगे।।

निष्ठुरता के दंश कहर में, तुम मुझको याद आओगे।।
कुदरत के हर एक सफर में, तुम मुझको याद आओगे।

जब ढलता सूरज दूर कहीं, धीरे-धीरे ढल जाएगा।
जब अपनी किरणों के आने, को वो गलती कह जाएगा।।
जब लावा दर्द का चीर के, सीना आहों का निकलेगा।
सब देह रूह दह जायेंगे, जब रूप राख का बदलेगा ।।

मिटने के हर एक भँवर में, तुम मुझको याद आओगे।।
कुदरत के हर एक सफर में, तुम मुझको याद आओगे।

5--- कन्या भ्रूण संवाद

क्या सोच कर, आयी यहाँ पर,
और क्या तुमको मिला, क्या कह सकोगी?
चुन लिया माँ - बाप तुमने इस,
धरा पर आगमन को, ये तो बताओ।
काया देकर आत्मा को कर,
लिया अपना चमन को, ये तो सुनाओ।।
थे ख्वाब जीने के सुनहरे,
पर मिला तुमको सिला, क्या कह सकोगी?
क्या सोच कर, आयी यहाँ पर,
और क्या तुमको मिला, क्या कह सकोगी?
जब चला था ये पता, आई
कोख में चाँदनी है, ये तो बताओ।
वो हलचल तब समां की साँस,
किस तरह घोंटनी है, ये तो सुनाओ।।

निज मान जिन निर्मोहियों को,
आ गयी उनसे गिला, क्या कर सकोगी?
क्या सोच कर, आयी यहाँ पर,
और क्या तुमको मिला, क्या कह सकोगी?
चलती साँस पर भी चली जब,
कैचियों की धारियां, ये तो बताओ।
एक-एक कर कट रहे सभी,
अंग की थी बारियाँ, ये तो सुनाओ।
फिर मौन चीखो से निकलता,
आह का होगा धुआं, क्या कह सकोगी?
क्या सोच कर, आयी यहाँ पर,
और क्या तुमको मिला, क्या कह सकोगी?

5-- बुझ गए दिए सभी

बादलों ने राह दी, आसमां ने चाह दी।
उड़ रहे जो संग में, पंछियों में थाह दी।
आँख मूंद चांदनी ने, आस ले लिये सभी,
जुगनुओं का वास्ता दे, बुझ गए दिए सभी ॥

धूप जोड़ती रही थी, छाँव तोड़ती रही,
पेड़ की मरीचिका भी, राह मोड़ती रही।
ये थक गए कदम जहाँ, थम गया गगन वहाँ,
साथ अपने हम थे बस, रुक सका न कारवाँ।
धूल पर बसर हुई, रेत पर सहर हुई,
सर्दियों सी रातों में, जम गए धुयें सभी।
जुगनुओं का .........

फिर नींद से उठा नगर, फूल फिर खिले डगर,
फिर शबनमी लिबास में. भोर भी हुई मगर,
जो वक़्त खो गया कहीं, फिर कभी मिला नहीं,
जो तोड़ते हृदय रहे, सुन सके गिला नहीं।
शाखें गिरके वक़्त की, चन्द लम्हें ढूंढती।
तिश्नगी थी ज़ीने की, गुम गये कुएं सभी।
आँख मूंद..............

पहाड़ सी थी मुश्किलें, शोर में कमी नहीं,
राह रोकती हवा थी, पर लहर थमी नहीं।
थामना था कश्तियाँ, तट बसी थीं बस्तियाँ,
साहिलों पर सामने, दलदली थी धरतियाँ,
कैसे हार मानती, रुख हवा का जानती,
जिंदगी बढ़े लहर सी, विष चले पिये सभी।
जुगनुओं का .........

6-- खड़ा गेट पर
खड़ा गेट पर राह तुम्हारी, देखा करता हूँ मैं माँ ।
शाम हो गई अब आओगी, ऑफिस से जानू मैं माँ ॥

रोज सवेरे मुझे छोड़ कर,
कैसे आखिर जाती हो ?
कैसे मेरे रोने पर भी,
तुम खुद को समझाती हो ?

बिना तुम्हारे दिन भर रहना, बहुत अखरता मुझको माँ ।
खड़ा गेट पर राह तुम्हारी, देखा करता हूँ मैं माँ ॥

देख सड़क पर तुम्हें दूर से,
पहुंच दौड़ कर जाता हूँ ।
गोद में तेरी मचल - मचल कर,
पूरा प्यार लुटाता हूँ ॥

कहाँ बड़ी इससे दौलत है, झोली भरता हूँ मैं माँ
खड़ा गेट पर राह तुम्हारी देखा करता हूँ मैं माँ ॥

नहीं रूलाना चाहो मुझको,
इसीलिए छुप कर निकली ।
ढूंढ - ढूंढ कर पथराता हूँ,
आँसू में आशा फिसली ॥

कमी तुम्हारी हर पल खलती तुम बिन डरता हूँ मैं माँ ।
खड़ा गेट पर राह तुम्हारी देखा करता हूँ मैं माँ ॥

रोती तो होगी तुम भी पर,
मजबूरी है जाने की ।
कहीं कसक रह जाती होगी,
साथ नहीं रह पाने की ॥
धीरे-धीरे साथ समय के, अब जा समझा हूँ मैं माँ ॥
खड़ा गेट पर राह तुम्हारी, देखा करता हूँ मैं माँ ॥

7-- ख्वाहिशें

ख्वाहिशें गुबारों सी, उड़ी चली बयार में।
तीखी धार वार की, मिली हमें मयार में।।

गल गई हैं वो जहाँ, अमृतों की धार थी।
जोड़ देंगी ताकतें, आस संग गुहार थी।
आसमां भी फट पड़ा, काल आगे था खड़ा,
सिहरीं देख ख्वाहिशें, पल वो क्रूर था बड़ा।

करतीं रहीं वापसी, बारिशें जो तामसी,

कोपलें उगी ही थीं, कि मर चलीं दयार में।।
ख्वाहिशें गुबारों सी, उड़ी चली बयार में।

बिखरे शूल हर कदम, पाँव पथ में थे छिले।
तपती धूप जेठ की, अँधेर नूर में मिले ।
बरगदों सी हसरतें, मन के आसमान में,
खुद खुदा ही बन गईं, पीड़ा के जहान में।

शूल का तो धर्म था, चुभा किया बिना दया,
फूल भी ना सुन सके, कराह को पुकार में।
ख्वाहिशें गुबारों सी, उड़ी चली बयार में।

पूरी कुछ हुईं मगर, उनकी क्या अदा रही?
कायनात जान पर, न जाने क्यों फिदा रही?
बस रही मरीचिका, हो अस्थि ज्यौं दधीचि का,
दान मांगती रही, वो दर्द की विभीषिका।

घुल गया वजूद में, जो दर्द रक्त बन गया,
चाहतें चलीं जली, दिये सी अंधकार में।
ख्वाहिशें गुबारों सी, उड़ी चली बयार में।

(3-9-2018)

8--

9---- सावन
रिमझिम सावन, की बौछारों, से मधु झरते जाते।
हर क्षण कण-कण, में आकर्षण,सरगम भरते जाते।।
सुरभित सावन, के मनभावन,
हरित छटा के गायन।
धुलकर तन-मन, अंचल आंगन,
कर जाते सब पावन।
शोख शबनमी, उजली बूंदों, को तर करते जाते।
हर क्षण कण-कण, में आकर्षण, सरगम भरते जाते।
मृदा आसवित, वर्षा जल को,
अंतःतल ले जाती।
तृण की फैली, दरी मखमली,
भीग ओस से जाती।
बादल से घन, छनकर दशहन, निर्झर झरते जाते।
हर क्षण कण-कण, में आकर्षण, सरगम भरते जाते।
धूल गर्द से, ढके वृक्ष को,
जल वर्षा का धुलता।
डाली टहनी, बेल कतरनी,
में कल-कल घुलता।
सारे अवयय, झूम-झूम कर, नर्तन करते जाते।
हर क्षण कण-कण, में आकर्षण, सरगम भरते जाते।
पत्थर भूतल,पर रिस पल-पल,
नमी सनसनी धरती।
रेत भिगोती, नदी पिरोती,
क्या ऊसर क्या परती।
जल अभाव की, भेदभाव की, पीड़ा हरते जाते।
हर क्षण कण-कण, में आकर्षण, सरगम भरते जाते।

नवल-धवल सा, हरित वसन का,
वस्त्र धरा का होता।
ऊपर अम्बर, सकल दिगंबर,
खुला नेह का सोता।
प्रकृति सुहावन, खिलता जीवन, चमन सॅवरते जाते।
हर क्षण कण-कण, में आकर्षण, सरगम भरते जाते।

10-- जरा मुड़ के देखो

जरा मुड़ के देखो न वापस वहाँ पर।
ना गए हो जहाँ पर तुम बरसों बरस।
सारे दर और दीवार वीरान हैं।
नहीं आता तुम्हें क्यों है उन पर तरस?
ईटें दीवारों की दिखने लगी हैं।
मीनारें चौखट की हिलने लगी है॥
कभी शान से खिलखिलाता था दर वो।
दुआ के असर सा रहा लगता घर वो।
खुली बाँह किलकारिंयों को थी थामे।
सुबह आरती कहकहों की थी शामें।
न लौटा कभी दर से फरियादी खाली।
रही बातें बचपन के घर की निराली।।
बंद पल्ले किवाड़ों के जड़ हो गये।
ताली भी जंग से जकड़ने लगी है॥
ईटें दीवारों की दिखने लगी हैं।
मीनारें चौखट की हिलने लगी है॥

चलो माना कि जाना जरूरी था पर,
नहीं भूलना था कि वो भी तो था घर,
बरसों से ताखों मे पसरे अंधेरे,

अब शामें गुजरतीं न होते सवेरे।
हुआ बूढ़ा जर्जर मकां वो पुराना,
उखड़ती हुई श्वास सा ताना-बाना।
तकते हैं दर अब भी रस्ता तुम्हारा,
आहट भी ढलने की मिलने लगी हैं॥
ईटें दीवारों की दिखने लगी हैं।
मीनारें चौखट की हिलने लगी है॥

वो आंगन की तुलसी पर जलता दिया।
वो रिश्तों की उरमी में खिलता हिया।
वो पाकड़, वो पीपल, वो बरगद घने।
नीम पर द्वार के थे जो झूले तने।
जीने व देहरी में छुपना-छुपाना।
वो कितने सबक खेल में सीख जाना।
वो यादें भुलाए भी भूलेंगी क्या?
जिंदगी लम्हे लम्हे फिसलने लगी है।
ईटें दीवारों की दिखने लगी हैं।
मीनारें चौखट की हिलने लगी है॥

11---- वृत्त का चित्र

वृत्त का है चित्र ज्यौं, विचित्र हो चला यहाँ।
रिद्धि सिद्धि चाहों का, चरित्र हो चला यहाँ।।

दाह धूप में बढ़ी, छाँव छाँह ढूंढती।
अश्क रश्क कर रहे, पीर पाँव पूजती।।

तेज था बड़ा तमस, तार दीप आरजू।
तूलिका बिखर गयी, भूल रंग गुफ्तगू।।

मलय संग दंश स्मरण, कि इत्र हो चला यहाँ।
साथ था विषाद ही, कि मित्र हो यहाँ॥
वृत्त का है चित्र ज्यौं, विचित्र हो चला यहाँ।

दुर्ग दर्द का बना, दीद दाग दे गया।
दांस्ता बनी नहीं कि, दौर दाँव दे गया।।
पात गिरा पुष्प का, पुंज ले पवन उड़ा।
राज हुआ शूल का, दंश भी तुड़ा - मुड़ा।

अधर्म भी यदा-कदा, पवित्र हो चला यहाँ।
कि रूह का पुकारना, अमित्र हो चला यहाँ॥
वृत्त का है चित्र ज्यौं, विचित्र हो चला यहाँ।

बागबां बिखर गया, बीत गई आंधियाँ।
तृणों से था बना हुआ, बिखर गया आशियाँ।।
थे बंधे बंधे लगे, हाथ जो खुले हुए।
सर्द स्याह धुंध थे, शाम में घुले हुए। ।

दौर छद्म भोर का, एकत्र हो चला यहाँ।

जुगनुओं का राब्ता, नक्षत्र हो चला यहाँ।।
वृत्त का है चित्र ज्यौं, विचित्र हो चला यहाँ।

12 -छोड़ दिया अंतिम खत कोरा
शब्दहीन था कोरा-कोरा, मौन पीर का था गठजोरा।
इतना पीड़ा ने झकझोरा, छोड़ दिया अंतिम खत कोरा।।
अंधियारे में बादल बनकर,
अखियाँ बरसीं अंतस कर तर।
राहें सूझें भी तो कैसे?
जड़ जब होती रूह सिहरकर।।
अति क्रंदन के पार उतर ही, खोल हँसा दिल पोरा- पोरा।
इतना पीड़ा ने झकझोरा, छोड़ दिया अंतिम खत कोरा।।
तरसें नयना प्रिय दर्शन को,
गहराये जो खारेपन को।
फिरता रहता होश गवां दिल,
अपना कर फिर निर्जन वन को।।
चाह मिटी जब, राह दिखाए, तब कैसे फिर आन अजोरा?
इतना पीड़ा ने झकझोरा, छोड़ दिया अंतिम खत कोरा।
हर पल घेरे रहता कुहरा,
घाव घाव पर लगता गहरा।
शूल दर्द का मिलने आया,
दिल में जैसे आकर ठहरा।।
निज में हर कोई उलझा है, स्याह सवेरा है हर ओरा।
इतना पीड़ा ने झकझोरा, छोड़ दिया अंतिम खत कोरा।।
 

13-- ख्वाबों की मीने

हृदय तल के गहरे समंदर में तैरें,
ये ख्वाबों की मीने मचलती बड़ी हैं।
कहीं उजली लहरें कहीं स्याही बिखरी,
कि कालिंदी गंगा की उलझी लड़ी हैं।।
फिर सुलझाओ जितना सुलझती कहाँ हैं?
ये भावों की कड़ियां उलझती बड़ी हैं।।
अँधेरे की विकराल आँधी के जैसे,
हैं आंखें दिखाता ये झोंका पवन का।
यूँ ज़ख्मों ने सूरत बदल डाली दिल की,
अब धुआं ही दिखाता झरोखा गगन का।
निशानी अजाबों की सहमायें दिल को,
उजली जो घड़ियां फिसलती बड़ी हैं।
ये भावों की कड़ियां उलझती बड़ी हैं।।
रहे मथता सागर भी विष से सुधा तक।
गहे उलझी बातें जो बनतीं अराजक।।
कभी हैं फूल झरते कभी शूल चुभते ,
कभी तोड़े मंथन भी बनकर सुधारक।।
कि तरुवर की सूखी लताओं के जैसे,
गुम स्वप्नों की लड़ियां दहलती बड़ी हैं।।
ये भावों की कड़ियां उलझती बड़ी हैं।।
सितारों के टिप-टिप से टपके धुआं ज्यौं,
कुहासों की चादर ने मन को ढका है।
हवाओं का बर्फीला झोंका धरा पर,
दबा हिम के भीतर ही मन जब थका है।।
कि चिंगारी बन कर के खामोशियों में,
ये पीड़ा की झड़ियां दहलती बड़ी हैं।।
ये भावों की कड़ियां उलझती बड़ी हैं।।

14-- ज्यौं लेखा नसीब का
ज्यौं लेखा नसीब का दिख जाता है।

मैं लिखती नहीं गीत लिख जाता है।।

मुझको क्या पता छन्द होते हैं क्या?
ये सुर ताल लय वृन्द होते हैं क्या?
ले आऊं कहाँ से मैं शब्दावली,
सहज भावों से अर्थ खोते हैं क्या?
पथ चुनता सुगम यदि पथिक पाता है।
मैं लिखती नहीं गीत लिख जाता है।।

देखी है दुनिया की दुनियादारी।
कोमल हृदय वार भी झेले भारी।।
घोलकर पीर सिन्धु में स्याही बनी।
बदली घनी नभ के कागज उतारी।।
दिल भाव भी जग से, व्यथित लाता है।
मैं लिखती नहीं गीत लिख जाता है।।
बांसों के झुरमुट फँसी ज्यौं हवा।
घुटता हो दम पर न मिलती दवा।।
भरने पर भी तो न चुकती उधारी,
लगता चमन ज्यौं हो तपता तवा।।
कुहरा ज्यौं मौसम में घिर आता है।
मैं लिखती नहीं गीत लिख जाता है।।

15-- माँ कहती है
आज जहाँ पर सूखी धरती, रोज तपा करती है।
माँ कहती है कभी वहाँ पर, नदी बहा करती थी।।
अल्हड़पन की बेफिक्री में, बादल बन उड़ जाना।
भावों के आंगन में मन का, सावन बन लहराना।।

कागज की कश्ती तैरा कर, हँसता चहका बचपन।
छोटी ज़िद पर भी जी भरकर, आँखों को बरसाना।।
आज जहाँ मन भारीपन से, सदा दबा रहता है।
कभी उमंगे निर्झरिणी ही, वहाँ गहा करती थीं।।
माँ कहती है कभी वहाँ ------
पत्तों के सर-सर की सुंदर, आवाजों की लहरी।
जंगल में मंगल कर जाती, हरियाली की पहरी।
इस डाली से उस डाली पर, पंछी का बल खाना,
पीपल बरगद के पेड़ों की, शीतल छाया गहरी।
आज जहाँ पत्थर ईटों के, मकां रहा करते हैं।
वो जगह कभी हरियाली से, भरी रहा करती थी।।
माँ कहती है कभी वहाँ - - - - - -
छोटे ताल, जलाशय, पोखर, कूप नदी क्या सागर।
बलखाती इतराती लहरें, या मेघों की गागर।
सूख रहे हैं धीरे-धीरे, घायल हो पथराते।
शीतल मंद पवन पथ भूला, खोए खग के भी घर।।
आज जहाँ पावन कुदरत में, दूषित कण बहुतायत।
कभी वहाँ पर बिना मलिनता, हवा बहा करती थी।
माँ कहती है कभी वहाँ --------
(15-10-2019)

16- माँ शारदे

हे वेद, विद्या दायिनी! शुभदा रमा, सौदामिनी!

कुमुदी परा सुरपूजिता! सुर वन्दिता वर दायिनी!
हे शिवानुजा हंस वाहिनी!
माँ शारदे! तुझको नमन है।

बुद्धिदात्री भुवनेश्वरी, शतरूपिणी वागीश्वरी!
महाभद्रा हंसानना, सुरसती वीणा वादिनी!
हे निरंजना शुभ सुवासिनी!
माँ शारदे! तुझको नमन है।

तेज बुद्धि प्रबल प्रखरता, ओज वाणी में निखरता।
मूढ़ता का तम बिखरता, वचन मधु सदृश सँवरता।
आशीष मांगे ये चमन है।
माँ शारदे! तुझको नमन है॥

संत्रास की हैं त्राहियाँ, बिखराव की हैं वादियाँ।
विद्वेष की संक्रांतियां, विचलित हुई विश्रांतियाँ।
संत्राण का करना शमन है॥
माँ शारदे! तुझको नमन है॥

देश की रज स्वर्ण कर दे, भाल आभा ओज भर दे।
श्रृंग सा उत्तुंग कर दे, जोश की अनमिट लहर दे।
ये प्राण करते आचमन हैं॥
माँ शारदे! तुझको नमन है॥

17-- ढूंढ रही कान्हा को

ढूंढ रही कान्हा को राधा, वृंदावन की कुंज गलिन में।
बाग निहारे नदिया देखे , व्याकुल होकर पल छिन - छिन में॥

डाल डाल पर पंछी बोले, गीत हवाएं गाएं हौले।
गाती है कोयलिया प्यारी, तान सुहानी जैसे घोले।
पर बंसी की धुन सुनने को, धुन रूहानी फिर गुनने को,
आँखें देख रही राहें कब, पट मन के वह आकर खोले?

मुरली वाले के बिन तो अब, डूबे हैं सब रंग मलिन में॥
बाग निहारे नदिया देखे, व्याकुल होकर पल छिन - छिन में॥

कहाँ गए हो छुप साँवरिया, माटी का कण - कण रोता है।
दरश दिखा दो प्यारे मोहन, सागर आँखों को धोता है॥
खारी - खारी हुई नगरिया, सूना - सूना सा लगता है।
अब तो दरश मिले गिरधारी, धीरज गोवर्धन खोता है।

निष्प्राण हुआ जाता है मन, पल भी काटे है गिन - गिन के।
बाग निहारे नदिया देखे, व्याकुल होकर पल छिन - छिन में॥

प्रीत असल दिखलायी तुमने, रीत प्रेम की होती है क्या?

सारे तीरथ प्रेम में बसे, सारे रोग की यही है दवा।
ढल जाएगा सूरज फिर भी, जीवन ताप रहेगा हरदम॥
देखेंगी आँखें पथ तेरा, बीते जो सदियां भी तो क्या?

राधा की धुन एक यही है, पीड़ा झूमे है धिन - धिन में॥
बाग निहारे नदिया देखे, व्याकुल होकर पल छिन - छिन में ॥

18--- "प्रीत का मौसम "
अब कहूँ मैं प्रिय कहो, कौन सा मौसम तुझे?
जो हँसाए खिलखिला, फिर करे गुमसुम मुझे।
जिस तरह से शून्य को, भर पवन देता सदा,
उस तरह मैंने जिया , प्राण भर हमदम तुझे।।
अब कहूँ मैं प्रिय कहो, कौन सा मौसम तुझे?
पावन बसंत जैसा,हुआ तेरा आगमन।
बहती बयार शीतल,पुष्प से सज्जित चमन।
तू चंद्र - किरणों सा, सुशोभित पूर्णिमा का,
झंकृत सुमधुर तरंगों से, जगत भी भावना का।।
आशा मधु पुरवाई, की रही लेकिन मिले।
झंझा, आंधी, बारिश, धूप के आलम मुझे।।
अब कहूँ मैं प्रिय कहो------------।
तेरा ग्रीष्म की घोर, तपिश का रूप धरना।
अमिट प्रेम का शीतल, मधु अमृत सा झरना।
लू के गर्म थपेड़ों, ने आखिर छीन लिया।
गहन घाव पर दिल ने, मरहम सा जहर पिया।।
लहरता सागर प्रीत का, हारा सूख गया,
दिल में थे जो जगमग, दीपों के करम बुझे।
अब कहूँ मैं प्रिय कहो------------
रह-रह होती फुहार, झूठी आस दिलाती।
पीड़ा निमग्न दिल को, और गहन कर जाती।झमाझम बारिश में, आँख

से ज्वाला फूटी,
संग झंझा हृदय, नियंत्रण रेखा टूटी।।
सारा जग वैसे तो, कदमों में है लेकिन,
चीर कर दिल रुलाए, सदा तेरा गम मुझे।
अब कहूँ मैं प्रिय कहो------------।
ठिठुरी धरती पर बन, गुनगुनी धूप आना।
दर्द गहरा सर्द ही, छोड़ पर लौट जाना।
ठहर जाते जरा सा, कुछ ही पल को प्रियवर,
प्राण मेरा संग में, लिए जाते न क्योंकर?
परखे ताकत मेरी, सहने की ये कुदरत,
दे जाओ अब तुम भी, सभी अपने गम मुझे।
अब कहूँ मैं प्रिय कहो------------।
घनघोर घटा बनकर, कायनात बरसी थी।
मिलवाने खुद कुदरत, धरती पर उतरी थी।
अंबर सा हो तेरा, दर्शन देने आना,
पुन्य प्रीत का सागर, अंतस में भर लाना।।
तेरे मन से सोता, प्रेम का जब सूखता,
नहीं दिखेगी अब तो,आँख मेरी नम तुझे।।
अब कहूँ मैं प्रिय कहो------------।
            (28-11-2017)

19-- आंसू की बरसात न देना
आंसू की बरसात न देना, ऐसे तो हालात न देना।
तोड़ मुझे दम घोंट चले जो, गीतों के जज्बात न देना।
धमक गमों की नहीं डराती, चाहे प्राणों पर बन जाती।।
पीड़ा के निष्ठुर सागर से,
मैं खुद को ही धो डालूंगी।
रिसते घाव लिए अंतस को
खाते गम से ही पालूंगी।।
फिर फितरत देखूंगी तेरी, आँसू को आँखों से मेरी,

पोंछ रहे हो गढ़े झूठ से,या सच की भी आहट आती।
नहीं परी या देवी हूं मैं,
माफ करूं तुझको सब भूलूं।
छोड़ा जिस घन कूप अंधेरे,
दम घोंटे जो झूला झूलूं।।
जो बूंद गिरेगी आंखों से, तो रक्त बहेगा सांसो से।
ऐसी आहों की गूंजें तो,भीतर तक जाकर दहलातीं।।
जन्मों का तो साथ बना पर,
धागा अमर प्रेम का टूटा।
अंतस में जा घुटे उजाले,
साथ दिया बाती का छूटा।।
टूट गया वो दिया चिटककर,छूट गया जो हाथों से था।
होगी तो पर नहीं दिखेगी, अमिट प्रीत में जलती बाती।।

 

20-- तरल गरल
भाव पिघल जब भवसागर में, तरल गरल बन जाते हैं।
धुलकर दिल के आसमान को, नवल धवल पल लाते हैं।।
क्या जाने क्या होगा पल में,
फूल कि शूल मिले कितना?
आज अगर है शीतल छाया,
धूप मिले कल फिर उतना।।
रीतेपन के पल न जाते, जीवन में भर जाते हैं।
धुलकर दिल के आसमान को, नवल धवल पल लाते हैं।।

धुंध कहाँ कब टिके पर, असर
रहता है देर बाद तक।
आहत मन घुट जीना सीखे,
धुंध में भी आल्हाद तक।।
जकड़न टूट सके वो स्वर्गिक, मौसम तो कम आते हैं।
धुलकर दिल के आसमान को, नवल धवल पल लाते हैं।।
सिमटे जब मन का जग निज में,
स्वयं सीप बन जाता है।
सूखे किरणों का सोता जब,
नया दीप गढ़ लाता है।
करे मगर क्या छद्म उजाले, जब आकर भरमाते हैं।
धुलकर दिल के आसमान को, नवल धवल पल लाते हैं।।

21--- इक नदी गिरि से निकल कर
इक नदी गिरि से निकल कर, राह अपनी चल पड़ी।
स्वप्न नयनों में समाए, भाव विह्वल है बड़ी।।
सामना किससे न जाने,
राह में हो क्या पता?
कब भला अवरोध राहों,
के रहे आते बता?
मौज बस अनजान पथ में, हौसलों की है खड़ी।
स्वप्न नयनों में समाए, भाव विह्वल है बड़ी।।
सफर में टेढ़ी असमतल,
राह की है महफिलें।
कुछ बड़ी छोटी शिलाओं,
के मिले हैं काफिले।।

हो गई टकरा शिला से, चूर बूंदों की लड़ी।
स्वप्न नयनों में समाए, भाव विह्वल है बड़ी।।
दर्द का मोती सजाए,
ह्रदय की सीपी लहे।
वेग पीड़ा का दबाए,
दंश भी पीती रहे।।
लग रही फिर भी सदा ही, आंसुओं की है झड़ी।
स्वप्न नयनों में समाए, भाव विह्वल है बड़ी।।
हर तरह की वो धरा कर,
पार सागर से मिली।
गर्त पर्वत याद सबकी,
साथ वो लेकर ढली।।
अंत सागर में समाकर, मुक्ति की मिलती घड़ी।
स्वप्न नयनों में समाए, भाव विह्वल है बड़ी।।

22-- परिवर्तन

स्वीकृत सहज काश हो जाये, सहसा कालचक्र जो लाये।।
क्षण-प्रतिक्षण नूतन परिवर्तन।
विस्मय करते नित दृग लोचन।।
वश न किसी का होता उन पर,
निज धुन में करते आवर्तन।।
विस्तृत नभ सा मन हो जाए, ब्रह्मानंद अनुभूति पाए।
स्वीकृत सहज काश हो जाये, सहसा कालचक्र जो लाये।।

घटना-दुर्घटना के मंचन,
चक्षु कालिमा पीर के अंजन।
धूल-धूसरित अवशेषों पर,
कर्म-अकर्म के फेरे मंथन।।
करे जतन मन वापस लायें, छिन्न-भिन्न जो बल हो जाये।।
स्वीकृत सहज काश हो जाये, सहसा कालचक्र जो लाये।।

सुकर्म, सुयश, सार्थक जीवन,
प्राण रहे तक हो शुभचिंतन।
कालगति के प्रति प्रहार पर,
शक्ति से भर जाए अकिंचन।।
होनी-अनहोनी के साये, जीवन-पथ पर नित टकराये।
स्वीकृत सहज काश हो जाये, सहसा कालचक्र जो लाये।।

23--- कुहरे ने आशियाँ
बना लिया चमन पर, कुहरे ने आशियाँ।
कि फूल अब खिले भी, तो कैसे दरमियाँ?
कल-कल की नाद में लहरें,
कर रही कलोल थीं।
लेकर ज्यौं रोर में पीड़ा,
चल रही अबोल थीं।
वो बूंदों में छलकती थीं,
दर्द से सिहर- सिहर।
हों मानो जूझती खुद से,
टूट कर बिखर - बिखर।।

मुश्किलें हजार में, मिलती थीं हर पहर।
धुंध भी लिए मिली, नूर की रवानियाँ।
कि फूल अब खिले भी, तो कैसे दरमियाँ?

खन- खन की खनक में खनके,
सरगम हवाओं की।
सन - सन सी सनसनाती है
ठण्डक फिजाओं की।।
वो जितनी सुबह उजली घन,
उतनी ही रात थी।
क्या मिलता क्या रहा खोता?
किस्मत की बात थी।
शबनमी बहार सा, कुदरत का ये चमन।
शीत के पतझड़ में, धूप की कहानियाँ।।
कि फूल अब खिले भी, तो कैसे दरमियाँ?
पल - पल में रंग बदल रहा,
काल के कपाल का।
तप्त आँसुओं के ज्वाल का,
रक्त के उबाल का।
जब हार गई मिन्नतें भी,
खो गई असीम में।
ख्वाहिशें भी तब सिमट गईं,
मौन के अफीम में।।
गूंज आसमान में, मौन की मिली मुखर।
मूल में व्यथा रही, साथ रही बिजलियाँ।।
कि फूल अब खिले भी, तो कैसे दरमियाँ?

24---- होली- रंग-बिरंगे नीले पीले

रंग-बिरंगे नीले पीले, रंगों का त्योहार।
पगी है फागुन में गा रही, बयार भी मल्हार।।

द्वार खड़ा रंगीला फागुन, हर्षित हुई धरती।
नव कोंपल ले कुदरत आई, आम्र बौर महकती।।
लहराती खेतों में सरसों, पीली चूनर डाल।
कूकती कोयल संग नर्तन, कर मन हुआ निहाल।।

मधुमासी सौरभ में सजता, कुदरत का दरबार।
पगी है फागुन में गा रही, बयार भी मल्हार।।

हवा में उड़ते रंग गुलाल, फगुआ का आलाप।
झन-झन करते झांझ मजीरा, ढोलक पर है थाप।
सखी री! होली पर न आए, पिया बसे परदेश।
हो गया मन मेरा बावरा, दूं कैसे संदेश।।

मौसम भी रंगों से भरकर, उत्सव को तैयार।
पगी है फागुन में गा रही, बयार भी मल्हार।।

बस्ती में खेलन को निकले, पिचकारी के संग।
नन्हे-मुन्नों की टोली तो, है बिन भंग मलंग।।
झूम रही सखियों की टोली, होली का माहौल।
रंग कर चेहरा उड़ता है, चुलबुल सा माखौल।।

मन रंगने का अवसर है ये, होली का त्योहार।
पगी है फागुन में गा रही, बयार भी मल्हार।।

होरियारों की टोलियाँ भी, गातीं बिरहा फाग।
है हास्य व्यंग को साधता, उल्लासित ये राग।।
गुलाल अबीर के संग हवा, हो गई मतवाली।
सोंधी खुशबू गुझिया की है, सबसे ही निराली।।

परिहासों में पुलकित पल-पल, पुंज पवन प्रतिहार।
पगी है फागुन में गा रही, बयार भी मल्हार।।

होली के अवसर पर केवल, रहे अबीर गुलाल।
बस तरंग हो सबके दिल में, न हो कोई मलाल।।
न हुड़दंग में होने पाए, कहीं किसी को कष्ट।
भांग मिले पर रंग न भंग, यह बात रहे स्पष्ट।।

गंगा - जमुना मिलन संस्कृति, भाईचारा सार।
पगी है फागुन में गा रही, बयार भी मल्हार।।

25---- मनमोहन माधव गिरधारी

मनमोहन माधव गिरधारी, मुरलीधर बनवारी।
दरस दिखा दो इन अँखियन को, हे कृष्णा त्रिपुरारी।।
मन बाँवरिया प्रीत रंग में,
झूमे रंग चुनरिया।
खुद को छोड़ा उसकी नगरिया,
लाया संग साँवरिया।।
गूजें हर पल चार दिशाएं, धुन बंशी की न्यारी।
दरस दिखा दो इन अँखियन को, हे कृष्णा त्रिपुरारी।।
थिरक-थिरक नाचे मन झूमे,
भोर हुई हो जैसे।
खोज रहा जो युग से पाया,
पुलकित होता वैसे।।
ध्यान न हटता बंशीधर की, मोहक सूरत प्यारी।
दरस दिखा दो इन अँखियन को, हे कृष्णा त्रिपुरारी।।
राधा मीरा बृजबाला सब,
रटते नाम तुम्हारा।
तुमने प्रेम सिखाया जग को,
अमिट सुधा की धारा।।
मुकुंद मोहन कृष्ण कन्हैया, हे प्रभु मदन मुरारी।

दरस दिखा दो इन अँखियन को, हे कृष्णा त्रिपुरारी।।
कान्हा केशव किशन गुहारी,
श्यामल छवि मनुहारी।
गोविंदा गोपाल जयंता,
बांके रसिक बिहारी।।
राधा रानी श्याम पुकारी, हे गोवर्धन धारी।
दरस दिखा दो इन अँखियन को, हे कृष्णा त्रिपुरारी।।

26--- रुहानियत की रौशनी
जमाल देखना है तो, अफकार देखिए।
रुहानियत की रौशनी, की धार देखिए।।
कुदरत की सहर हो या, रातों की चांदनी,
तारीकी आसमां की, या रब की बांधनी।
शोख शबनमी फिजां या, फूलों का खिलाना,
गीत शजर का लहर के, गाना सूफियाना।
हर शै का हुआ जाना, गुलजार देखिए।
रूहानियत की रोशनी की धार देखिए।।
खूब सुनी जाती यहाँ, दिल की है रुबाई।
हमदम की इनायत या, फिर गम की दुहाई।
कविता नज़्म गजलों में, गंगा की शीर हो।
लब पर तराने खिलते, आंखों में नीर हो।
जज्बात के बहाव के, रुखसार देखिए।

रूहानियत की रोशनी, की धार देखिए।।
पैमाने रहे सबके, जुदा ही जमाल के।
चर्चे धूप - छांव कहर, सभी के कमाल के।
आजिज भी करे है ये, कोहसार गमों का,
रहे अजीज भी बन के, मगर खून रगों का।
मँझधार में है कश्ती, पतवार देखिए।
रूहानियत की रोशनी, की धार देखिए।।

27--- किरचें
दिल किर्च - किर्च कर बिखरा है, हमने चिन्द - चिन्द फिर जोड़ा है।।
अब किसका दोष कहें या रब, जब हमने ही खुद को तोड़ा है।।
तूफान-थपेड़े क्या कम थे?
जो मथते सागर में आग लगी।
मंथन में अमृत तो खोया,
पर विष की पीड़ा क्या खूब पगी?
मिले कुछ मोहलत जीने की, निज कदमों को हमने मोड़ा है।
अब किसका दोष कहें या रब, जब हमने ही खुद को तोड़ा है।।
मन्द-मन्द मुस्कान पवन की,,
आंधी की आहट हो सकती है।

रक्त शिरा में जम सकता है,
अंतिम साँस निकट हो सकती है।

कौन यहाँ चल पाया तनकर, किसे वक्त ने नहीं निचोड़ा है।।
अब किसका दोष कहें या रब, जब हमने ही खुद को तोड़ा है।।

चांद की झिलमिल रौशन सी,
वो शीत-शीत सी मधुर चांदनी।
सुंदरता की है प्रतिमूरत,
पर कहीं मोहती कहीं अनमनी।

जला न दे घर कहीं किसी का, रब का करम जहाँ पर थोड़ा है।।
अब किसका दोष कहें या रब, जब हमने ही खुद को तोड़ा है।

चल दे आग पर नंगे पाँव,
छल जाए जहाँ जहरीला छाँव।
रहे जलाती तपन धूप की,
भूल गया कभी दिल अपना गाँव।

हवा भरे हुंकार भयावह, बना नसीब राह का रोड़ा है।।
अब किसका दोष कहें या रब, जब हमने ही खुद को तोड़ा है।।

28-- तब हो मेरी होली

रंग जाए मन मेरा अगर, तब हो मेरी होली।
भरी रंग से छटा निराली,

दुनिया की गागर की।
रंग छलकते हैं तो दिखती,
सपनीली सागर सी।।
चमक-धमक या तड़क-भड़क सब, बस ऊपर की खोली।
रंग जाए मन मेरा अगर, तब हो मेरी होली।
रही रंग के बीच चदरिया,
मन की झीनी कोरी।
हरित बेल सिंदूरी संझा,
देते आस अजोरी।।
ले फूल से हवा ने खुशबू, मौसम में है घोली।
रंग जाए मन मेरा अगर, तब हो मेरी होली।
रंगो की मंजरियाँ बोलीं,
करके हँसी ठिठोली।
लेकर संग गुलाल अबीरें,
खेलें आँख मिचोली।।
आ जाओ साँवरिया भर दो, रीतेपन की झोली।
रंग जाओ मन मेरा अगर, तब हो मेरी होली।

29-- अश्कों के उपहार

मन-मंदिर की वेदी पर, अनुपम कुछ त्यौहार मिले।
बहुतेरे रंगों में लिपटे, अश्कों के उपहार मिले॥

लहरों में बेकल हलचल,

सूख रहे जल से पल-पल।
सागर के सहरा होने पर, दरिया के मनुहार मिले॥
बहुतेरे रंगों में लिपटे, अश्कों के उपहार मिले॥

पीड़ा की बाहों ने जब,
प्राणों की बलि ले डाली।
घुट जाने पर साँसो को, औषधि के उपचार मिले॥
बहुतेरे रंगों में लिपटे, अश्कों के उपहार मिले॥

तजकर पुष्पों के मधुरस,
वाणी शर के गुण घोले।
सावन ले आती वायु में, आंधी के व्यवहार मिले॥
बहुतेरे रंगों में लिपटे, अश्कों के उपहार मिले॥

तंज रंज के संग यहाँ,
रंग तरंग निखरता है।
जीवन है उपहार स्वयं, संदेशे हर बार मिले॥
बहुतेरे रंगों में लिपटे, अश्कों के उपहार मिले॥

प्रकृति देवों की सौगात,
जीव जगत का अवलंबन।
जब-जब टूटे तारे हृदय के, अवयय में झंकार मिले॥
बहुतेरे रंगों में लिपटे, अश्कों के उपहार मिले॥

30-- जीवन - यात्रा
साथ बहारों के भी तो, तूफान चला करता है।
हाथ नहीं आती लहरें, जल चाहें जो रहता है।।
हाँ, हमको मालूम नहीं,
क्या होता है मर जाना।
पर जाने ये दिल मेरा,
खामोशी से भर जाना।
जग ने सिखलाया मन के,
भीतर जाकर तर जाना।
बहती जीवन - धारा से,
लेकर सीख निखर जाना।।
भीतर हो मीठा झरना, तो बाहर भी बहता है।
हाथ नहीं आती लहरें, जल चाहे जो रहता है।।
क्या कहना उन राहों को,
जो बिन मंजिल होती हैं।
उन राहों पर आहें भी,
बनकर बारिश रोती हैं।
अंगार कहीं हों संभलो,
वो दिखते जो मोती हैं।
भ्रमण किया करती भँवरें,
जो घातक भी होती हैं।।
चाह नहीं सारे मोती मन, अंदर ही रखता है।।
हाथ नहीं आती लहरें, जल चाहें जो रहता है।।
सुनता है गुनता भी पर,
क्या है कर सकता ये दिल?
भेजे जो कुदरत उसको,
चुप होकर सहता ये दिल।

होता बस में कब उसके,
देखे बस घटता ये दिल।
घुटता फिर भी अपने ही,
है आप सँवरता ये दिल।।
रब तुझसे क्या बोलूं मैं, तू अपनी ही करता है।।
हाथ नहीं आती लहरें, जल चाहें जो रहता है।।
साथ बहारों के भी तो तूफान चला करता है।
हाथ नहीं आती नहीं लहरें, जल चाहें जो रहता है।।
(3-4-2018)

31-- तुलसी के तब पात निखरते

तकते - तकते नयना थकते, मन- सागर को बीहड़ मथते।।
प्रीत चुनरिया सिर पर ओढ़ी,
बीच रंग के कोरी थोड़ी।
सुन अंतरतम की आवाजें
हमने अपनी राहें मोड़ी।
अनजाने पथ पर लेकिन कब, बस रंगों के मौसम सजते?
तकते - तकते नयना थकते। मन- सागर को बीहड़ मथते।।
सूना सा जग आसमान का
मुखड़ा उखड़ा लगे गान का
शूल भले फूलों से जिसने
धर्म निभाया रक्त- पान का।

प्राण पथ में अमृत वर्षा के, धुआं भरी पीड़ा को चखते।
तकते - तकते नयना थकते, मन- सागर को बीहड़ मथते।।
छलनी करता बेध ह्रदय को
तोड़े तार बिगाड़े लय को।
तम की घेरे कितनी जालें,
घायल करतीं हैं किसलय को।
नेह सुधा जब बरसे अंगना, तुलसी के सब पात निखरते।
तकते - तकते नयना थकते, मन- सागर को बीहड़ मथते।।

32--- जीना सीखो

झंझा की तम लपटों से, लड़कर भी जीना सीखो।
तीखा मीठा जो भी है, जीवन रस पीना सीखो।।
आंधी में भी यथाशक्ति, जलता दिया है।
प्रस्तर गिर को चीर कर, बहती नदिया है।।

काँटें चुभते पग में या,
छालों से रक्तिम पथ हो।
राह शिला में गुम हो या,
जला रही अग्नि शपथ हो।।

बस किरण से भरे जहाँ में, कौन जिया है?
और बस अमृत घट लेकर, कौन पिया है?
प्रस्तर गिर को चीर कर, बहती नदिया है।।

तेज धूप में जलता या,
गहन शीत में रक्त जमे।
वायु गति प्रतिकूल हो या,
श्वास को भी न वक्त थमे।।

रुक कर थोड़ा प्राणशक्ति दम भर लिया है।
रौशन मन को आत्मदीप से कर दिया है।।
प्रस्तर गिर को चीर कर, बहती नदिया है।।

आघातों की आंधी में,
हालातों से हार चले।
तब साहस से भर कर,
मन में आशा दीप जले।।

सदा आगे बढ़ने को, तैयार हिया है।
रहे चाहे जो मुश्किल, स्वीकार किया है।।
प्रस्तर गिर को चीर कर, बहती नदिया है।।

33---हो चली है जिंदगी

देखे - अनदेखे शोलों में, हर कदम पर है पगी।।
शुष्क रेत के दरिया जैसी, हो चली है जिंदगी।
शबनम को तरसती सीप भी,
ताप कभी तो शीत भी।
बाधित स्वरों में ही मिले हैं,
मीठी लय के गीत भी।।
खुद से ही है शत्रुता मगर, साथ ही है बंदगी।
शुष्क रेत के दरिया जैसी, हो चली है जिंदगी।
जश्न क्या इतने झमेलों में,
मनाये मन अकिंचन?
चलचित्र में जाने कहाँ, कब
मधुरिमा या प्रभंजन?
यादें मीठी कम पर कड़वी, की तो भीड़ है लगी।
शुष्क रेत के दरिया जैसी, हो चली है जिंदगी।

जिधर देखिए नीर आँख में,
व्याकुल सी नगरी है।
सब अपने में ही डूबे हैं,
सबमें पीर भरी है।।
पीड़ा भी लगता कर देती, खुद की नुमाइंदगी।
शुष्क रेत के दरिया जैसी, हो चली है जिंदगी।।

तेज हवा के साथ ही कहीं
वादे उड़ जाते हैं।
उपदेशों के राहगीर तो,
यूं ही मुड़ जाते हैं।
पर्वत सी पीर हुई तो फिर, बर्फ गलने है लगी।।
शुष्क रेत के दरिया जैसी, हो चली है जिंदगी।

34--- गाता है दिल

गाता है दिल ये गीत मगर तान नहीं है।
तो क्या जो लय की इसको पहचान नहीं है?

वादियों फिजाओं में,
बह रही हवाओं में;
मौन साधती पल में,
गूंजती दिशाओं में;

निर्झर के कल- कल में, रश्मियों की हलचल में,
संगीत की लहर से पर अनजान नहीं है।
गाता है दिल ये गीत मगर तान नहीं है।

उर्मियों के ताप को, सर्दियों के भाप को;
बहे जो मधुमास में, मधु मलय के माप को;

एहसास के तराजू पर तौले है ये दिल,
कारीगरी पर अपनी ये हैरान नहीं है।
गाता है दिल ये गीत मगर तान नहीं है।
तो क्या जो लय की इसको पहचान नहीं है?

लहर सिंधु में चलती, मन में बन कहर पलती।
चाहतें तरंगों सी, ओझल हो बच निकलतीं ।
गाये जा ऐ दिल तू, तज के तम के घेरे को,
क्या खुल के जीते जाने का अरमान नहीं है?
गाता है दिल ये गीत मगर तान नहीं है।
तो क्या जो लय की इसको पहचान नहीं है?

35-- रात भी है बीत जाती

रात भी है बीत जाती क्यों, तू इतना उदास है?
थोड़ा सा बस धीरज धर  ले, फिर सवेरा पास है।।
नीड़ का तिनका भी उड़ाती,
क्रूर बनकर आंधियां।
छोड़ जाते साथ कितने,
मन का तोड़कर आशियां।।
आज अंधियारा अगर है फिर, आगे तो उदास है।
थोड़ा सा बस धीरज धर  ले, फिर सवेरा पास है।।

मुश्किले जब तोड़ती हों मन,
भी हारा हताश हो।।
तिश्नगी में सूखती दरिया,

से जीवन निराश हो।
थम न जाना ऐ मुसाफिर ये, आस का परिहास है।
थोड़ा सा बस धीरज धर  ले, फिर सवेरा पास है।।
हार है मन के हारने पर,
जीतने पर जीत है।
गढ़ ले नवल स्वर ताल अपने,
फिर मधुर संगीत है।।
बना तीरथ निज मन ही जहाँ, ईश का अधिवास है।
थोड़ा सा बस धीरज धर  ले, फिर सवेरा पास है।।

36-- जल-संकट
त्रासद है जल का संकट अब, तो संचय करना होगा।
हो न कहीं विकराल समस्या, जल सोता भरना होगा।।

सूख रहे तालाब कुएं सब,
मरती जाती हैं नदियाँ।
क्यों न किया जल का संचय,
पूछेंगी आती सदियाँ।।

बारिश का जल में भंडारण में, बहुतायत धरना करना होगा।

हो न कहीं विकराल समस्या, जल सोता भरना होगा।।

पानी बिना नहीं है जीवन,
सब है पानी बिन सूना।
संकट में दाम हुआ जल का,
दूना या फिर चौगुना।

तिल- तिल मरती धरती की, तृष्णा अब तरना होगा।
हो न जाए विकराल समस्या, जल सोता भरना होगा।।

जल का हो उपयोग वहीं पर,
जहाँ जरूरी हो जितना।
अपनी खातिर ही हम सबको,
होगा ये सार समझना।।

कल कल करते जल को,अब तो निर्मल करना होगा।
हो न जाए विकराल समस्या, जल सोता भरना होगा।।


37-- तेरा आना, तेरा जाना

तेरा आना, तेरा जाना, कि साँसों का ठहर जाना।

ये समझे हैं, गगन के दीप, कि क्या होता पहर जाना॥

ये क्यों कैसे, समा हैरान, कहानी बन बिगड़ जाए।
वो गाता था, शजर जो गीत, सुरों से भी बिछड़ जाए॥
चमन के फूल, भुलाकर शूल, निरखते हैं जिंदगी को,
उन्हें मालूम, ही कब होता, सहर का भी कहर लाना।
ये समझे हैं....

होता कुछ यूं, लेते गुन तुम, उदासी के दर ओ दीवार
मगर गुनकर, नजरअंदाज, न करते आँसुओं की धार।
नहीं सोपान, ये बंधन है, किसी मायावी नगरी का,
ये आंगन की, वो तुलसी जो, वही जाने सँवर पाना॥
ये समझे हैं....

हुई अब देर, ये जानो तुम, जड़ों से सूखता तरुवर।
न देना दोष, फिर मौसम को, तुम्हें ही ताकता गिरिवर।
गिरह सब दर्द, की खोलो तुम, रुहानी लेप तो घोलो,
उजाले रोक, लो जीवित जो, चाहते हो अगर पाना॥
ये समझे हैं....

38-- सूखे जाते प्राण मेरे

सूखे जाते प्राण मेरे, जाने वाले देख तो ले ।
खोती जाती सब हवाएं, जिंदगी के निशान डोले ॥

स्याही काले बादलों की,
गिरती है मुझ पर कहर बन।
कैसे आखिर बच सकेगा?
घायल दिल पर है लहर घन॥

बनता है क्यों काल जैसा, क्रूर तू भी बन जहर घोले ।
खोती जाती सब हवाएं, जिंदगी के निशान डोले ॥

बंद हो गईं सब दिशाएं,
छद्म है मगर आवरण है।
पहुँचे मुझ तक वो कहाँ से,
हवा का न अब संचरण है।।

घुटता जाए दम धुएं से, वक़्त झरोखा आन खोले॥
खोती जाती सब हवाएं, जिंदगी के निशान डोले ॥

पंछी के कलरव बदलते,
आहों की अब कुहकनों में ।

मौसम में भी बर्फ घुलती,
भारी होती धड़कनों में ॥

कैसे जी पाऊं बता ये, पत्थर दिल तेरा न बोले?
खोती जाती सब हवाएं, जिंदगी के निशान डोले॥

39--- मेघ
सन सनन सन वायु लहरे, घन घनन घन मेघ बरसे।
मन मयूरा पंख खोले, मौसमों को देख हरसे ॥

गड़गड़ाती कड़कड़ाती,
दामिनी रह-रह डराती ।
रौद्र सा है रूप ऐसा ,
सिहरनों में दौड़ जाती ॥

खूबसूरत कुदरती पर, काँप जाता हृदय डर से॥

मन मयूरा पंख खोले, मौसमों को देख हरसे ॥

धुल गए सब पेड़ पौधे,
महक रहे सौधें-सौधें ।
ताप के आयाम सारे,
गिर गए जैसे औंधें॥

खग विहग के कलरवों में, हर्ष को थे कर्ण तरसे॥
मन मयूरा पंख खोले, मौसमों को देख हरसे ॥

दर्शनों में भीग रमता,
मन मनन मन खूब करता।
झन झनन झन झांझ बजती,
सावनों का गीत झरता ॥

संगीत बजता हर तरफ, क्या बचेगा वो लहर से?
मन मयूरा पंख खोले, मौसमों को देख हरसे ॥

40--- तकते तकते नयना थकते

तकते - तकते नयना थकते, मन सागर बीहड़ मथते।
प्राण डगर अमृत वर्षा के, धुंध भरी पीड़ा चखते।।

प्रीत चुनरिया सिर पर ओढ़ी,
बीच रंग के कोरी थोड़ी।
सुनकर अंतर की आवाजें,
हमने अपनी राहें मोड़ीं।
अनजाने पथ पर लेकिन कब, बस मोहक रंग बिखरते?
प्राण डगर अमृत वर्षा के, धुंध भरी पीड़ा को चखते।।
जग सूना सा आसमान का,
मुखड़ा उखड़ा लगे गान का।
शूल भला फूलों से जिसने,
धर्म निभाया रक्त पान का।।
आहत मन में बाण पीर के, दहके अंगारे रखते।।
प्राण डगर अमृत वर्षा के, धुंध भरी पीड़ा को चखते।।
छलनी करता बेध ह्रदय को,
तोड़े तार बिगाड़े लय को।
धार बड़ी है तेज तमस की,
लेकर आ जाती है भय को।।
विस्मय के फूलों में खिलते, शूलों के साए चुभते।।
प्राण डगर अमृत वर्षा के, धुंध भरी पीड़ा को चखते।।

41- मीठी धुन के तराने

तेरे गीत मेरी साज के, साथ जब आते हैं ।
मीठी धुन के तराने वहीं, आप बन जाते हैं ॥

भोर कहती है क्या देखिये,
शबनम को सजाए?
मखमल सी रूहानी भी है,

एहसास दिलाए ॥

तेरी प्रीत को हम गमों में, भोर सा पाते हैं ।
मीठी धुन के तराने वहीं, आप बन जाते हैं ॥

शूल के भी निशां रह जाते,
रह - रह कर उभरते ।
उजड़े चमन की सदा से तो,
पर हम वा के सिहरते ॥

तेरी आहटें गुन ग़मों से, पार हम पातें हैं
मीठी धुन के तराने वहीं, आप बन जाते हैं ॥

गूंजे धड़कने इस तरह से,
साँसे हुईं सरगम ।
लय सुर ताल इसके निराले,
दिल का मधुर आलम॥

दिल के सभी उलझे बहाने, जब सुलझ जाते हैं ।
मीठी धुन के तराने वहीं, आप बन जाते हैं ॥

42-- पतवार कराती नैया पार
सागर की लहरों से लड़ हो, पतवारों संग नैया पार।
तूफानों पर टूट पड़ो तुम, बना के हिम्मत को आधार।।
ज्वाला कितना उगलेगा वह
सूरज मन के आसमान पर?
पग मे कितने शूल चुभेंगे?
जब आगे बढ़ने को तत्पर।
मुश्किल हों हालात अगर बन, जाए हौसला ही पतवार।
तूफानों पर टूट पड़ो तुम, बना के हिम्मत को आधार।।
लहरें पार न होती डरकर,
राह मिले लहरों से लड़कर।
घड़ी परीक्षा की भी आए,
करो सामना उसका डटकर।।
आखिर पार कराएगा ही, पराजित होकर पारावार।।
तूफानों पर टूट पड़ो तुम, बना के हिम्मत को आधार।।
राहें जब मुश्किल लगती हों,
तम की जब महफ़िल सजती हो।
नज़र न आये कहीं रौशनी,
साँसों की गिनती घटती हो।।

तब दूना उत्साह कर चलो, छोड़ो न कोशिश मँझधार।
तूफानों पर टूट पड़ो तुम, बना के हिम्मत को आधार।।

43-- लवाही
गर्मी उफने बाहर तो, सुराही में है शीत रे!
मीठी तेरी बर्फी से, लवाही मेरी मीत रे!

खेतों में बिखरा सोना,
धरती का अंबर होना।
हरियाली के गीतों का,
फसलों में बाली बोना।
हलवे से ज्यादा सोंधी, पुरवाई लिए गीत रे।
मीठी तेरी बर्फी से, लवाही मेरी मीत रे!
मोर बना मनवा लहरे,
पर खोले अंतस गहरे।
फूल खिलें जैसे हौले,
नजर ताजगी पर ठहरे।।
हारों पर तो अक्सर, सराही जाती जीत रे!
मीठी तेरी बर्फी से, लवाही मेरी मीत रे!
पीहू - पीहू गाये जब,
पपीहा बैरी बोलता।
बंद कपाटों को मन के,
झन से झांझर खोलता।

संग पवन उड़ जाने की, गवाही देती प्रीत रे।
मीठी तेरी बर्फी से, लवाही मेरी मीत रे।।

44 --साथ मेरा हर सफर पर

साथ मेरा हर सफर पर, दे सको तो बात हो।
बन सको साया अगर तो, धूप भी सौगात हो।।

जानते हो पीर सारी,
शब्द में ढलती नहीं।
अंतरों के बिन मिलन तो,
रौशनी मिलती नहीं।।
सुन सको जो मौन मेरा, नूर की बरसात हो।
बन सको साया अगर तो, धूप भी सौगात हो।।
गुनगुनाते से उजाले,
घेर लेते हैं मुझे।
जो सुने आवाज तेरी,
दीप जलते हैं बुझे।।
गुन सको जो चाह दिल की, जीत जैसी मात हो।
बन सको साया अगर तो, धूप भी सौगात हो।।
जो मुझे पहचानते हो,
मान देते प्रीत को।
तब निभाकर तोड़ देना,
आँसुओं की रीत को।।
पढ़ सको जो आँख मेरी, दूर हर आघात हो।
बन सको साया अगर तो, धूप भी सौगात हो।।

45-- परदा नभ का
बड़ा पहला परदा नभ का, जड़े हुए हैं जरी-सितारे।
जरदोजी ने रंग बदल कर, चन्द्र - बिन्दु चांदी के वारे।।
चलचित्रों सा चले रात भर,
शशिधर की लीलाएं कितनी?
झिलमिल तारों के टिम- टिम से,
उनके मन की बात परखनी।

क्या वे धरती पर आने को,
मचल रहे नन्हे बालक हैं?
या रस्ता भटके राहजनों को,
राह दिखाते चालक हैं?

मामूली न दौर ये अद्भुत, हर पीड़ा से आन उबारे।
जरदोजी ने रंग बदल कर, चन्द्र - बिन्दु चांदी के वारे।।
आंचल फैला बोले नभ ये,
आओ चंदा तुम्हें सुला दूं।
हुई भोर सूरज की बारी,
तुमको अब आराम दिला दूं।
तुमने भी तो साथ निभाया,
आहत मन के बीमारों का।
कभी हँसाया, कभी रुलाया,
नेह रुहानी उपचारों का।
लोरी के सुर-ताल सजा दें, मीठी नींदों के उजियारे।।
जरदोजी ने रंग बदल कर, चन्द्र - बिन्दु चांदी के वारे।।

46-- राम

दशरथ के सुत राम त्याग कर, महलों के आराम,
कि रखने पिता वचन का मान, चले हैं कानन को॥
संग में सिया लखन के राम, चले हैं कानन को॥
सीता मैया लक्ष्मण साथ,

निर्दोष अहिल्या को गौतम ने,
श्राप दिया फिर त्यागा था।
पाषाण बनी वन में तो टूटा,
आशा का हर धागा था।

किया राम ने न्याय, डालकर पत्थर में जब प्राण,
भूल कर सारे वो संताप, झुकी अभिवादन को।
संग में सिया लखन के राम, चले हैं कानन को॥

शबरी बड़े प्रेम से रघुवर को,
बेर खिलाती जाती थी।
एक-एक चखती जाती फिर,
जूठे बेर खिलाती थी।
लखन हुए हैरान, खाते जूठे बेर क्यों राम?
राम की महिमा अपरंपार, पढ़ें सबके मन को।
संग में सिया लखन के राम, चले हैं कानन को॥

रघुवर केवट से अनुरोध करें,
गंगा पार कराने को।
जिनके दो पग से सब लोक नपे,
वे नाव कहें लाने को।

लीला में भी मान, भक्त का रखते हैं श्री राम।
पुलकित केवट पांव पखारे, लखे पग पावन को।

संग में सिया लखन के राम, चले हैं कानन को॥

47-- प्रीत तेरी मान मेरा

प्रीत तेरी मान मेरा, रूह का परिधान है।
हाथ तेरा हाथ में जब, हर सफर आसान है।।

हो बहारें हर तरफ या, पतझड़ों के सिलसिले।
राह में हों फूल बिछते, या धरा तपती मिले।
मधु मलय बहती रहे या, लू भरी चलती हवा।
गरजती काली घटा या, कहकहों की महफिलें।।

गीत गूंजे हर दिशा में, जिंदगी ही गान है।।
हाथ तेरा हाथ में जब, हर सफर आसान है।।

वक्त के सारे पहर में, जीत से ले मात तक।
रूठना या फिर मनाना, मौन से ले बात तक।
बाँट लेंगे हम गमों को, और खुशियों को सभी।
हमसफर बन साथ रहना, जिंदगी की रात तक।।

तू रहा है शान मेरी, तू रहा अभिमान है।।
हाथ तेरा हाथ में जब, हर सफर आसान है।।

ठोकरों से पाँव अपने, लड़खड़ाएंगे अगर।
धुंध में गुम राह होगी, दौर जाएगा ठहर।
मैं तुझे तब थाम लूंगी, तू मुझे तब थामना।
एक दूजे के लिए हम, देख लेंगे हर लहर।।

साथ से तेरे न कोई, पथ रहा वीरान है।।
हाथ तेरा हाथ में जब, हर सफर आसान है।।
(15-9-2019)

48-- जिंदगी में जिंदगी
जिंदगी में जिंदगी की, बात करते हैं।
बर्फ की परतों में चलो, आग भरते हैं।।
बस सरल होता सहज जो, बीत जाता है।
भर रहा घट जिंदगी का, रीत जाता है।
ढूंढती है नाव नदिया, में किनारे को,
और देखो वो किनारा, गुनगुनाता है।।
डूब कर भी डूबने की, बात करते हैं।
लहर में लहरा भँवर भी, साथ चलते हैं।।
जिंदगी में जिंदगी--------------------------
नव कोंपलों से वृक्ष तक, तय सफर करती।
जिंदगी की लौ दिये सी, उम्र भर जलती।
सुनहरी भोर में उजली, ओस बूंदों सी,
तेज धूप की लपटों से, जूझती रहती।।

रंग विष के संग अमृत, के बिखरते हैं।
अनुकूल या प्रतिकूल हो, कब ठहरते हैं?
जिंदगी में जिंदगी--------------------------

ज़िन्दगी मन पर खरोंचें, खींच देती है।
स्याह रंगों से ह्रदय को, सींच देती है।।
ज़ख्म का परिहास करती, आंसुओं में भी,
मुट्ठियां भी खोलकर के, भींच लेती है।।

चलो हालात पर इसके, हम विचरते हैं।
राह की दुश्वारियों से, अब न डरतें हैं।।
जिंदगी में जिंदगी--------------------------

49--अदा बसंत की

देख छटा मौसम की मन का, मयूर - नर्तन करता है।।
सर्द हवाएं लिए धरा भी,
बासंतिक रंग में रंगती।

क्षीर - नीर करते हंसा सी,
सारस्वत का वंदन करती।।
क्रंदन भी वंदन में डूबा, जन-जन का मन भरता है।
देख छटा मौसम की मन का, मयूर - नर्तन करता है।।
सर्दी गर्मी के दो खेमे,
जैसे विलग-थलग हो जाते।
समा भी छोड़ के पतझड़ को,
नव कोंपल को लाने जाते।।
कोपल भी बौराई लगती, बौर घना सा लगता है।
देख छटा मौसम की मन का, मयूर - नर्तन करता है।
गुनगुन करती गाती जाती,
मन कोंपल की उजली बाती।
महाराज नटराज सजाते,
ता थैया ता थैया थाती।।
लगता है मौसम उल्लासित, धुन में करतल करता है।
देख छटा मौसम की मन का, मयूर - नर्तन करता है।।
रुनझुन - रुनझुन पायल छनके,
झन झन - झन झांझर झनकी।
झूम - झूम कर चलती है जो,
पुरवा भी लगती सनकी।।
पछुआ पीछे छूट गया है, मंजर बड़ा मगन लगता है।
देख छटा मौसम की मन का, मयूर - नर्तन करता है।।
सन - सन करती हवा चल रही,
जैसे पवन बजाए ताली।
दुनिया मन के संग गुनेगी,
इसकी तो यह अदा निराली।।
बात अदा की आई है तो, मौसम सजता लगता है।
देख छटा मौसम की मन का, मयूर- नर्तन करता है।।

50-- गढ़ दूं मूरत
गढ़ दूं मूरत, तेरी प्रीत की,
कर में लेकर, गीली माटी,
अगर कहो तो।
नव प्रयोग भी, करने होंगे
माटी की संरचनाओं में।
सांचे लेकर, कुम्हारों के
रंग भरेंगे घटनाओं में।
किरण-किरण को, भर कण-कण में,
रौशन भी कर, दूं रज खाटी,
अगर कहो तो।

साथ अगर दे, सको ज़रा जो,
निचोड़ धरती, पर नभ ला दूं।
आत्म-मीत सा, बन पाओ तो,
बिन सुर-लय भी गीत सजा दूं।
प्रेम लहर के, तेज भंवरे में,
हाथ थामना हो परिपाटी,
अगर कहो तो।
पर्वत ऊपर, बर्फ शिलाएं,
भूलीं कजरी की गाथाएं।
गहरी घाटी, मन के भीतर,
सुखा गईं तपती धाराएं।
हर लूं शापित सब बाधाएं,
फिर जी जाए मरती घाटी,
अगर कहो तो।

51-- प्रीत की नक्काशियाँ
मन भवन की, देहरी पर, प्रीत की नक्काशियाँ।
मौसम पवन, की साज पर,

छेड़ संगीत की धुन।
संग गाता, है पपीहा,
मधुर सुर ताल लय चुन।
ज्यौं महल में, बाद बरसों,  गूंजती किलकारियाँ।।
मन भवन की, देहरी पर, प्रीत की नक्काशियाँ।
रूह करती, रूह से मिल,
चाहतों की बारिशें।
शुष्क सहसा, हो धरा फिर,
बूंदों की गुजारिशें।।
स्वीकार सब, रेशमी या, पीर की हों धारियाँ।
मन भवन की, देहरी पर, प्रीत की नक्काशियाँ।
अंतरों के, मधु मिलन पर,
बारिशें अपनत्व की।
क्या पता कब, तप्त मन की,
खोज हो जल तत्व की?
घने कारे, घिरे बदरा, घेर लें दुश्वारियाँ?
मन भवन की, देहरी पर, प्रीत की नक्काशियाँ।

नीर भरकर, व्यथित नयना,
टूटते जलभार से।
चिंद टुकड़े, हो गया उर,
याद के गलहार से।।
दर्द पसरा, दरमियां अब,  बर्फ सी रुसवाइयाँ।।
मन भवन की, देहरी पर, प्रीत की नक्काशियाँ।
सूर्य तपता, मन - गगन पर,
प्रेम सोता सूखता।
मन-चमन पर, पर्ण पीले,
शुष्क पतझड़ की लता।।
उगे शायद, अंतरों पर, रोप दी हैं क्यारियाँ।।
मन भवन की, देहरी पर, प्रीत की नक्काशियाँ।

(15-12-2017)

1 टिप्पणी:

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