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गुरुवार, 4 मई 2017

samiksha

पुस्तक चर्चा:
'आँख ये धन्य है' देखनेवाला अनन्य है 
चर्चाकार- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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[पुस्तक विवरण- आँख ये धन्य है, कविता संग्रह (काव्यानुवाद), मूल कवि नरेन्द्र मोदी, काव्यानुवादक डॉ. अंजना संधीर, ISBN ९७८-९३-८२६९५-१७-२ प्रथम संस्करण, वर्ष २०१६, आकार २१.५ से.मी. x १४ से.मी., आवरण पेपरबैक बहुरंगी, पृष्ठ १०४, मूल्य १००/-, विकल्प प्रकाशन २२२६ बी प्रथम तल, गली ३३, पहला पुस्ता, सोनिया विहार, दिल्ली ११००९४, चलभाष ९२११५५९८८६, अनुवादक संपर्क Anjana_Sandhir@yahoo.com]
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                    'आँख ये धन्य है' एक असाधारण काव्य संग्रह है। यह असाधारणता कई अर्थों में है। वैदिक मान्यतानुसार 'ऋषय: मन्त्रदृष्टार: कवय: क्रान्तदर्शिन:' अर्थात ऋषि मन्त्रदृष्टा और कवि क्रान्तदर्शी होता है। जब सामाजिक क्रांति के स्वप्न देखनेवाला समर्पित समाजसेवी खुली आँखों से देखे हुई सपनों को शब्द देता है तो कविता लिखी नहीं जाती, कविता हो जाती है। 'आँख ये धन्य है' की काव्य रचनाएँ काव्य शास्त्र के मानकों के अनुसार लिखी गयी कविताएँ नहीं हैं, ये उससे बहुत आगे जाकर भावनाओं के साथ एकाकार हो चुके एक कर्मव्रती के मन से निकले उच्छवास हैं जो नियमों के मोहताज नहीं होते, जिनका पारायण कर नियमों की संरचना की जाती है। ऐसी रचनाओं के कथ्य इतने सहज ग्रहणीय होते हैं कि उनके आगे भाषा, क्षेत्र, वाद आदि की सीमायें बौनी हो जाती हैं।   

                    पिंगल की मान्यतानुसार कवि वह है जो भावों को रसाभिषिक्त अभिव्यक्ति देता है और सामान्य अथवा स्पष्ट के परे गहन यथार्थ का वर्णन करता है। इसीलिये कहा गया है "जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि"। आँख ये धन्य की कवितायें एक सामान्य मानव के महामानव बनने की यात्रा के विचार-पड़ावों की छवियाँ समाहित किये हैं। ये कवितायें कहीं कंकर में शंकर को देखती हैं, कहीं आत्म में परमात्म की प्रतीति कराती हैं, कभी आत्म अवलोकन करतीं है, कभी आत्मालोचन और कभी आत्मोन्नयन के सोपानों पर पग धरती, ठिठकती, रुकती, बढ़ती हुई पाठक को भी साथ ले जाती हैं। 

                    सामान्यत: काव्य, कविता या पद्य में मनोभावों की कलात्मक अभिव्यक्ति की जाती है। कविता का शाब्दिक अर्थ है काव्य रचना या कवि की कृति, जो छंद श्रंखला अथवा पदों में आबद्ध हो। काव्य की यह परिभाषा शिल्पगत है। काव्य की कथ्यगत परिभाषा के अनुसार काव्य वह रचना है जिससे चित्त किसी रस या मनोवेग से पूर्ण हो। चुने हुए शब्दों के द्वारा कल्पना और मनोवेगों की यथार्थ अनुभूति कराने में सक्षम रचना ही काव्य है। रसगंगाधर में 'रमणीय' अर्थ के प्रतिपादक शब्द को 'काव्य' कहा गया है। 'अर्थ की रमणीयता' को शब्द तक सीमित करने पर काव्य में अलंकार का प्राधान्य आवश्यक कहा गया ।'अर्थ' की 'रमणीयता' के प्रतिपादकों ने काव्य में कथ्य को सर्वाधिक महत्त्व दिया। इससे यह लक्षण बहुत स्पष्ट नहीं है। साहित्य दर्पणकार विश्वनाथ के अनुसार 'रसात्मक वाक्य' रस अर्थात् मनोवेगों का सुखद संचार काव्य की आत्मा है। 'आँख ये धन्य है' का कवि इनमें से किसी मान्यता का अनुसरण नहीं करता। वह अपनी अनुभूतियों को प्रगट करने के लिए शब्द को माध्यम बनता है और उन शब्दों में लय, रस, अलंकार, बिम्ब या प्रतीकों को वहीं तक स्वीकारता है जहाँ तक वे उसके कथ्य को प्रगट करने में सहायक हैं। फलत: इन कविताओं में जो साधारणता व्याप्त हुई है वह इन्हें काव्य जगत में असाधारण बना देती है।  

                    'आँख ये धन्य है' में ६७ कवितायें काव्यात्मक भूमिका के साथ संकलित हैं।  इन कविताओं का वैशिष्ट्य इनका विविध कालखंडों, परिस्थितियों, मनस्थितियों और परिवेश में कवि-मन में अवतरित होना है।  इनका रचनाकार निष्णात साहित्यकार, पेशेवर कवि या उद्भट विद्वान् नहीं है। उसका वैशिष्ट्य उसकी कर्मठता, संवेदनशीलता, निष्कपटता तथा सरलता है।  इस रचनाओं में रचनाकार अपने विचारों को सजाता-सँवारता या निखारता नहीं है। वह अकृत्रिमता और स्वाभाविकता को वरीयता देता है। वह अपने बारे में स्वयं कहता है- 'मैं साहित्यकार अथवा कवि नहीं / अधिक से अधिक मेरी पहचान / सरस्वती के उपासक की हो सकती है।' तुलसी भी खुद को कवि, चतुर या गुणी नहीं कहते अपितु खुद को अल्पमति कहकर 'राम गुण गायन' अपने काव्य कर्म का ध्येय बताते हैं 'हौं न कवी नहिं चतुर कहाऊँ / मती अनुसार राम गुण गाऊँ' । यह कवि सत्य से साक्षात्कार ही नहीं करता उसे बिना किसी हिचक एक अभिव्यक्त भी करता है- ' मेरे कल्पनालोक की खुली / छोटी सी खिड़की में से / दुनिया को जैसा देखा, अनुभव किया / जैसा जाना, आनंद लिया / उसी पर अक्षरों से अभिषेक किया। ' कवि न तो मौलिकता का दावा करता है, न रचनाओं के दोषमुक्त होने का किंतु कहता है 'कभी-कभी कच्चे आम का स्वाद भी / अलग तरह का स्वाद दे जाता है।' अहम् से मुक्त होकर अपनी अभिव्यक्ति के प्रति इतनी ईमानदारी वही बरत सकता है जो अपने 'स्व' को 'सर्व' में समाहित कर चुका हो, जिसने अपने कर्म को धर्म मानकर न केवल किया हो अपितु जिया भी हो। जिसे अपने कर्म की दिशा, गति और परिणाम के प्रति पूर्ण आश्वस्ति हो।    

                    राज शेखर ने काव्यमीमांसा में कविचर्या का वर्णन करते हुए कवित्व के ८ स्रोत - स्वास्थ्य, प्रतिभा, अभ्यास, भक्ति, विद्वत्कथा, बहुश्रुतता, स्मृतिदृढता और राग कहे हैं ।
स्वास्थ्यं प्रतिभाभ्यासो भक्तिर्विद्वत्कथा बहुश्रुतता।
स्मृतिदाढर्यमनिर्वेदश्च मातरोऽष्टौ कवित्वस्य॥  


                    कविताओं की चर्चा करने के पूर्व कवि के व्यक्तित्व को इस निकष पर परख लें। उम्र के छ: दशक पार करने के बाद भी कवि पूर्णत: रोगमुक्त और स्वस्थ्य है, नित्य १७-१८ घंटे कर्मरत रहता है। प्रतिभा का ऐसा भण्डार कि सारी दुनिया उसका लोहा मानती है। अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण इतना कि भारत के सभी राजनेता और दल मिलकर भी उसकी तरह जनहित नहीं कर पाते। राष्ट्र के प्रति अनन्य भक्ति से सराबोर की खुद और अपने हर साथी को लगातार देश और जनगण की सेवार्थ जुटाए रखता है।  विद्वत्कथा को नव आयाम देते हुए देश के भविष्य निर्माताओं नौनिहालों तक पहुँचाने के लिए मन की बात का आविष्कार उसने नवोन्मेषी दृष्टि की साक्षी है। बहुश्रुतता के पैमाने पर कसें तो उसके मुँह से निकलनेवाले हर शब्द पर असंख्य पत्रकारों, अनगिन नेताओं और अपरिमित देशवासियों की नजर रहती है। स्मृति दृढ़ता के दृष्टिकोण से देखें तो वह बरसों पहले जिनसे मिला या जिनके घर रुका आज सर्वोच्च पद पर पहुँचने के बाद भी उन्हें नाम से बुला लेता है, उनसे उसी आत्मीयता से जुड़ जाता है। राजशेखर की अंतिम कसौटी 'राग ' है। इस कवि के 'राग' में 'अनुराग' और 'वैराग' का अद्भुत समन्वय और सामंजस्य है। माँ, भारत माँ, गौ माँ, जनता जनार्दन और विश्व शांति के प्रति उसका 'राग' अनादि और अनंत है।  इनके लिए अहर्निश काम करते हुए भी वह नहीं थकता, अहम, अभिमान, लोभ, मोह, माया आदि के प्रति उसका विराग सर्व ज्ञात है।  वस्तुत: वह गीता में वर्णित कर्मयोगी है।  अब तो आप बिना बताये भी समझ ही गए हैं कि इन कविताओं के कवि जननायक और राजर्षि श्री नरेंद्र मोदी जी हैं।    

मम्मट ने काव्य के छः प्रयोजन बताये हैं-
काव्यं यशसे अर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये।
सद्यः परनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे॥

                    अर्थात काव्य यश और धन के लिये होता है। इससे लोक-व्यवहार की शिक्षा मिलती है। अमंगल दूर हो जाता है। काव्य से परम शान्ति मिलती है और कविता से कान्ता के समान उपदेश ग्रहण करने का अवसर मिलता है।

                    मम्मट की कसौटी पर कवि नहीं कविता को कसा जाना है। प्रथम कसौटी काव्य से यश और धन प्राप्ति की कामना के संबंध में। ये कवितायें किसी पेशेवर कवि द्वारा पुस्तक प्रकाशन के उद्देश्य से नहीं रची गयी हैं । कवि पूरी ईमानदारी से अपनी बात में कहता है 'मैं साहित्यकार अथवा कवि नहीं / अधिक से अधिक मेरी पहचान / सरस्वती के उपासक की हो सकती है।' यह भी कि 'बहुत लम्बे समय से लिख इधर-उधर / क्षत-विक्षत पड़ा सब संकलित हो...' स्पष्ट है कि ये कवितायें विविध कालखंडों, स्थानों, परिस्थतियों और वैचारिक चिंतन की ज्मीस पर अंकुरित हुई हैं, इनकी शैल्पिक अकृत्रिमता और वैचारिक ईमानदारी इन्हें सहज बोधगम्य और स्वीकार्य बनाता है। कवि ने अपने आत्मीय गुजरात कवि श्री सुरेश दलाल के आग्रह को शिरोधार्य कर इन्हें सामने आने दिया। हम पाठकों को श्री सुरेश दलाल के प्रति आभारी होना चाहिए कि उनके निमित्त हमें भी इन रचनाओं से साक्षात का अवसर मिला है। कवि अपना मूल्यांकन स्वयं करते हुए पाठकों का आव्हान करता है- 'मेरी रचनाओं का ये नीड़ / आपको निमंत्रण देता है / पल दो पल आराम लेने पधारो / मेरे इस नीड़ में आपको भाव जगत मिलेगा / औए भावनाएं लहरायेंगी।' मम्मट की कसौटी को जाने-अनजाने नकारते हुए कवि ने स्पष्ट किया है उसका कविकर्म किसी हित साधन हेतु नहीं है। पाठक कवि के भाव जगत से आनंदित हो यही कवि का साध्य है। इस साध्य को साधने में सहायक हुई हैं डॉ. अंजना संधीर जिन्होंने गुजराती में रचित इन कविताओं को हिंदी में अनुवादित कर बड़ी पाठक-पंचायत को आनंदित और प्रेरित होने का अवसर उपलब्ध कराया है।
    
                    मम्मट की दूसरी कसौटी 'काव्य से लोक व्यवहार की शिक्षा' मिलने के संबंध में यह कहा जा सकता कि ये कवितायें इस निकष पर खरी उतरती हैं। 'मानव के मेले संह मेल ये मिलता रहा / पर दूसरों के साथ में मैं, खुद को / आतंरिक पीड़ा देता रहा।' धन्य शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ हम सबके जीवन का सत्य है। परिवार के स्तर पर हम एक-दूसरे की पीड़ा में सहभागी होते हैं किंतु समाज के स्तर पर आपदाओं-विपदाओं के समय ही हमारी संवेदना एक हो पाती है। यदि हम अपनी संवेदना का विस्तार कर सकें तो कवि के साथ कह सकेंगे 'ये सब अनन्य है / और कुछ तो अगम्य  है / धन्य, धन्य, धन्य है / पृथ्वी मेरी सुंदर है।'

                         'हम' शीर्षक रचना में कवि कहता है-  'किसी की निंदा नहीं, संकोच नहीं / हम प्यार की बहती धारा हैं / बुद्धिमान हमें पागल कहते हैं / वे सच्चे, हम गलत नहीं। / एक विशाल दरिया उछलता है / हम फूट जाएँ, ऐसे बुलबुले नहीं। / हमारा कहाँ कोई किनारा है / हम तो दरिया की मझधार हैं।'  यहाँ अपने से भिन्न विचार रखनेवाले को 'सच्चा' और खुद को 'हम गलत नहीं' बताना ऊपरी दृष्टि से अंतर्विरोध प्रतीत हो सकता है किन्तु भारतीय लोकतंत्र में संघवाद की अवधारणा को मूर्तिमंत करने के लिए यह उदारता और सहिष्णुता अपरिहार्य है। इस सत्य की प्रतीति को श्री नरेंद्र मोदी जैसे समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता, कर्मठ राजनेता और कट्टर देशभक्त से अधिक और कौन समझ और बता सकता है।

                     देश की राजनीति और सामाजिक जीवन आर्थिक गडबडियों और व्यक्तिगत स्वार्थों के चक्रव्यूह में घिरा है। नरेन्द्र भाई मोदी जी का राजनेता राजनीति के स्तर पर इन गड़बड़ियों के खिलाफ हमेशा सक्रिय रहा है किन्तु उनका कवि भी मौन नहीं है। कवि पूछता है औए पूछने के बहाने पाठक को लोक व्यवहार की शिक्षा देता है- 'आनेवाले कल में / अमर होने के लिए / बीते कल का इतना / मोह रखकर / आज को / आँखों के समक्ष धोखा देकर / जीने का कोई अर्थ है?' काश इन पंक्तियों का मर्म माल्या जैसे लोग समझ पाते।

                    'कोई पंथ नहीं, ना ही सम्प्रदाय / मानव तो है बस मानव / उजाले में क्या फरक पड़ता है / दीपक हो या लालटेन?' सीधी-सदी दिखती इन पंक्तियों में अन्तर्निहित भाव को समझें। भारत जैसे विविध मतावलंबियों, दलों, सम्प्रदायों, भाषाओँ, भूषाओं  के देश में 'मानव को केवल मानव' मानना कितना खतरनाक है? जैसे ही आप इस राह पर चलते हैं चारों ओर से संकीर्णतावादी टूट पड़ते हैं। मोदी जी ने यह खूब झेला है और उसके बाद भी मानव को मानव मानने की प्रतिबद्धता का जय घोष किया है। संसद हो या चौराहा उनकी इस सोच पर हमला करनेवालों में विरोधी तो विरोधी उनके अपने दल के कार्यकर्ता और नेता भी सम्मिलित है जिसके विरुद्ध उन्हें बार-बार चेताना पड़ रहा है। अपनी कविता के माध्यम से जन चेतना जगाने का काम वे पहले ही कर चुके हैं।

                 राजनीति काजल की कोठरी है। लोकोक्ति है -'काजल की क्कोथारी में कैसहूँ सयानो जाए / काजल का दाग तो लागिहै सो लागिहै।' मोदी जी पर राजनैतिक स्पर्धी आरोप लगायें, यह स्वाभाविक है। उनका राजनेता इनसे निबटना जानता है किन्तु उनका कवि कहता है- 'यश-कीर्ति की कोई भूख नहीं / कोई पसंद, नापसंद नहीं / रही ह्रदय में सदैव क्षमा / ह्रदय तल का राम ही रखवाला / उजाला-उजाला' किसी वीतरागी संत किसी यह अभिव्यक्ति एक शीर्षस्थ राजनेता के अंतर्मन की है। इस सत्य को सहज ही स्वीकारना कठिन है। कवी मोदी अपनी कविताओं की पंक्ति-पंक्ति से लोक को शिक्षित करते हैं कि सार्वजनिक जीवन में किन मूल्यों की उपासना करते हुए निष्काम कर्मयोगी की तरह खुद को अपने लिए कसौटी बनाना होती है। मम्मट ने काव्य की दूसरी कसौटी काव्य के माध्यम से लोक शिक्षा निर्धारित की है, इस कसौटी पर 'आँख ये धन्य है' की कवितायें सौ टके खरी हैं।

                  मम्मट के अनुसार काव्य से अमंगल दूर होना कवि की तीसरी कसौटी है। अमंगल दूर तभी हो सकता है जब 'अयं निज: परोवेत्ति गणना लघु चेतसाम। उदार चरितानाम तु वसुधैव कुटुम्बकम' का भाव मन में उदित हो। कवी नरेंद्र जी लिखते हैं- ' मैं अपने शरीर को / मन को, ह्रदय को / प्रभु का प्रसाद ही मानता हूँ, / और सम्पूर्ण विश्व मानो / मेरे आगोश में समा जाता है। 'वसुधैव कुटुम्बकम', अथवा 'विश्विक नीडम' का यह वैदिक संस्कार कवि अपने अंतर्मन के राजनेता को देता है और तब वह राजनेता विश्व संस्थाओं में मर्मस्पर्शी संबोधन कर सब देशों में संवेदना जगाकर स्वयं विश्वमान्य हो पाता है।

                       नरेंद्र भाई जी को बाह्य मान्यता और घर में चुनौती का वातावरण मिलना स्वाभाविक है। कहावत है 'घर का जोगी जोगड़ा आन गाँव का सिद्ध', या घर की मुर्गी दाल बराबर'। संसद में इस कवि-नेता के बढ़ते जनाधार से अपने अस्तित्व के लिए संकट अनुभव करते राजनेता बौखलायें न तो क्या करें। इस जननेता का कवि उसे खासुलखास होते हुए भी आम बनाए रखता है, उसकी कविता उसे जन का अमंगल दूर करने को प्रेरित करता है और तब वह मन की बात, अन्त्योदय, स्वच्छ भारत, नमामि गंगे, काले धन के अंत, नेट बैंकिंग, कैशलेस बैंकिंग जैसे लोकहितैषी कदम उठाता है। यह सत्ता पाने के बाद एकाएक नहीं हुआ, इसके बीज कविताओं में हैं। निज हित को प्रमुख माननेवाले वाली राजनीति से कवि नरेंद्र पूछते हैं- 'आनेवाले कल में / अमर होने के लिए / बीते कल का इतना / मोह रखकर / आज को / आँखों समक्ष धोखा देकर / जीने का कोई  अर्थ है?' सत्ताभिमुख नेता और दल नत मस्तक न हों तो क्या करें?

                             राजनेता मोदी जी से कोई उनके समूचे कार्यकाल में किये कार्य का सार पूछे तो उन्हें कवि नरेंद्र की पंक्तियाँ ही कहानी होंगी- 'उजाले की आस लेकर / अन्धेरा उलीचा / मैंने अन्धेरा उलीचा। / उजाले की चमक लेकर / अन्धेरा उलीचा / मैंने अन्धेरा उलीचा।' कविता से अमंगल दूर करने में जुटा यह कवि-नेता आव्हान करता है- 'ईर्ष्या-द्वेष को छोड़ / खुशबू भरी मिट्टी बनकर / उठो, जागो, दौड़ो, दौड़ो / एक दुसरे के साथ रहो / मत रहना अकेला / वसुधा की है मुश्किल बेला।' 'उत्तिष्ठ जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत' उच्चारते युगपुरुष स्वामी विवेकानन्द का पुनरावतार ही प्रतीत होता है यहाँ।  मम्मट के लोकमंगल की कसौटी पर कवि नरेंद्र रचना मात्र नहीं करते, वे राजनेता नरेंद्र को सतत प्रेरित और आंदोलित भी करते हैं इसलिए इन कविताओं के आधार पर यह अनुमान जा सकता है कि राजनेता को अभि कविप्रेरित लोकमंगल के अनेक कदम उठाने शेष हैं।

                                काव्य से परम शांति मिलना मम्मट के अनुसार काव्य का चौथा परीक्षण है। 'आँख ये धन्य है' का कवि इस परम शांति को 'उत्सव' के रूप में मनाता है। सांसारिक प्रपंचों के मध्य भी कवि शांति और आनंद से साक्षात् करता रहता है- 'अनेक पतंगों (प्रपंचों) के बीच भी / मेरा पतंग उलझता नहीं / किसी वृक्ष की डालियों में / कहीं फँसता नहीं' इसीलिए परम शांत रहता है। संसद में होते आक्रमणों या सरहद पर उपस्थित होती विषम परिस्थितियों या चुनावी चक्रव्यूहों के बीच भी कुरुक्षेत्र के कृष्ण की तरह रहस्यमयी सरल मुस्कान बिखेरता कवि सज्जनों को अति सरल और दुर्जनों को अति जटिल प्रतीत होता है। कवि फिर कहता है- 'यह आनंद भी / अद्भुत, अनोखा / कटे हुए पतंग के पास / आकाश का अनुभव है / हवा की गति की दिशा का ज्ञान है।' सामान्यत: पतंग कटने को पतन और शोक का प्रतीक कहा जाता है किन्तु कवि नरेंद्र स्थितप्रज्ञता से इसमें भी सकारात्मकता देखते हैं तो फिर उनका काव्य परम शांति से दूर कैसे हो सकता है?

                       मम्मट के अनुसार काव्य की अंतिम कसौटी 'कविता से कांता सदृश्य उपदेश की प्राप्ति'  है। 'आँख ये धन्य है' के कवि एक सन्दर्भ में यह कसौटी विशेष महत्व रखती है। वह इसलिए कि व्यक्तिगत जीवन में माँ का आज्ञाकारी बेटा विवाह करने के बाद मातृभूमि की पुकार पर अपना जीवन रास्त्र-सेवा हितार्थ समर्पित कर देता है। आध्यात्म की राह पर पग बढ़ने पर पत्नी कहीं पीछे छूट जाती है।

                      समान्तर प्रसंग राजकुमार सिद्धार्थ और यशोधरा के जीवन में घटित हुआ था। अंतर यह कि सिद्धार्थ राजकुमार थे और वे शयनरत पत्नी-पुत्र को छोड़कर चुपचाप गए थे जबकि कवि नरेंद्र ने माँ, पत्नी और स्वजनों को अवगत कर देश सेवार्थ खुद को समर्पित किया था। पत्नी से दूर होने के वर्षों बाद रची गयी कविताओं में 'कांता सदृश्य उपदेश' है या नहीं देखना सचमुच एक असाधारण अनुभव है। इस निकष पर परखते समय 'कांता सदृश्य उपदेश' का मर्म देखना होगा। कांता के लिए उचित क्या? पति को स्वार्थ, मोह, वासना की ओर उन्मुख करना या उसे ईश्वर, सृष्टि, देश, मानवता और पर्यावरण के प्रति कर्ताव्योन्मुख करना?, 'स्व' तक सीमित रखने का परामर्श या 'सर्व' तक विकसित होने देने की प्रेरणा देना?

                     यह प्रसंग किसी पश्चिमी देश में घटित होता तो पत्नि संभवत: अपने अधिकारों और सुख को वरीयता देती किन्तु भारतीय मनीषा आत्मोन्नयन को जन का परम उद्देश्य मानती है और उसके लिए लौकिक के त्याग को दोष नहीं गुण के रूप में मूल्यांकित करती है। यही कारण है कि कवि-पत्नि ने कभी भी पति को दोष नहीं दिया अपितु उनकी साधना और उन्नति पर गर्व की अभिव्यक्ति करते हुए आवश्यकता पर साथ देने की भावना व्यक्त की। कवि की कविता में कांता-सम्मति सत्य-रक्षा हेतु चेतावनी के रूप में व्यक्त हुआ है- 'सत्य नहीं बोलें / तो कोयल की कुहुक को / मरी हुई मछली की तरह / कौआ चोंच मार कर नष्ट कर देगा।' कवि के देशनायक बनाने पर निर्मम राजनीति ने उनके व्यक्तिगत जीवन को लेकर आक्रमण किये किंतु कवि का मौन सब हमलों को निष्प्रभ करता रहा। कवि की कविता यह जानती है कि 'अफवाहों पर आधारित समाचार / सुबह-सवेरे उगते हैं काले सूरज की तरह' और यह भी कि 'सत्य से सत्याग्रह तक की / यात्रा में / हमें मिलते हैं / बिना पैर चलते / प्रवासियों के पदचिन्ह / केवल भीड़, टोलियाँ।' यह कांता सदृश परामर्श कवी की मानसिकता को वैयक्तिक हमले होने पर भी उनकी अनदेखी करने की मानसिकता देती रही है।

                            कवि की कविता कांता-भाव से हीन नहीं है। देखें- 'मेरे सूखे खेत में / गांठे उगाना बंद करो / किसी के मक्खन जैसे कोमल पैरों में से / ये गांठें खून चूसने लगें / उससे पहले बंद करो।' लाख जतन से बंद की गयी मुट्ठी में से झरते सिकता-कणों की तरह कहीं-कहीं यह भाव अपनी उपस्थिति दे ही देता है। 'गरबा' शीर्षक पूरी रचना ही कांता-भाव की साक्षी है। यह कांता भाव किसी विशिष्ट व्यक्तित्व या देह का मोहताज नहीं होता। कवि के अंतर्मन में उपस्थित योगी कांता भाव को उदात्त कर प्रकृति, संस्कृति, चेतना, माटी आदि से जोड़कर व्यक्त करता है और 'कांता-परामर्श' भी उदात्ततापूर्वक ग्रहण करता है। 'अपने कागज़ पर सूरज बनाता हूँ / और बनाता हूँ पूनम का चाँद / मेरे कागज़ पर लहराता वृक्ष है / और वृक्ष पर हरियाले पत्ते / स्वजन की याद जैसी छोड़ी चट्टान / उसे झरने का गीलापन जगाये' नव सृजन का यह भाव मूलत: काँता-भाव ही है। 'मुझे तो सेतु बनना है / प्रेम का हेतु बनना है' कवि को काम्य प्रेम दैहिक नहीं आत्मिक है, वैश्विक है। यह काँता-प्रेम उन्हें देश हर काँता की आँख में चुभते धुएँ की पीड़ा का अनुभव कराकर रसोई गैस पहुँचाने की प्रेरणा देता है।

                             कवि का योगी कहता है- 'काया छोडो, माया छोडो', कवि का राजनेता कहता है 'यह सूर्य मुझे पसंद है / अपने सातों घोड़ों की लगाम / हाथ में रखता है', कवि का कांता भाव कहता है- 'उसने किसी भी घोड़े को चाबुक मारा हो / ऐसा जानने में नहीं आया।' आँख ये धन्य की रचनाएँ कांता-सम्मति से संयुक्त हैं इसका साक्ष्य जगह-जगह उपलब्ध है. कोई कांता अपने कान्त को निकम्मा-निठल्ला नहीं देखना चाहती। कांता-प्रेरणा से कर्मव्रती बना कांत ही कहेगा- 'तुम मुझे मेरे काम से ही जानो / कार्य ही मेरा जीवन काव्य है।' भौतिक घटनाओं और मिलन को ही सब कुछ माननेवालों को इस योगी कवि का कांता भाव भले ही न दिखे किन्तु आत्मिक और आध्यात्मिक मूल्यों को जी रहे पता उसकी प्रतीति कर सकेंगे। 'अद्भुत है ये जिंदगी, आने-जाने के कारण / कोई आ के चला जाए और यादों में जिए /  डोरी बंधे तो टूट नहीं जाए/ तितली फिर रंगों में डूब जाए।'

                      मम्मट ने कविता के मानक तलाशते समय ना सोचा होगा की किसी कवि के मानक कर्मयोग आधृत भी हो सकते हैं। यह कवि अपने मानक आप बनाता है। वह भाग्य को चुनौती देते हुए तनिक बी नहीं हिचकिचाता- 'भाग्य को कौन पूछता है यहाँ? / मैं तो चुनौती स्वीकारनेवाला मानव हूँ / मैं तेज उधार नहीं लूँगा / मैं तो खुद ही जलता हुआ लालटेन हूँ।' कोइ अन्य कवि खुद को लालटेन नहीं सूर्य कहता किंतु कवि नरेंद्र जी की यही खूबी उन्हें अन्यों से अलग करती है कि वे काल्पनिक कविता नहीं करते, कविता में कल्पना को साकार करते हैं। वह अपने वंश और वारिस की चिंता नहीं करता- 'मैं खुद ही मेरा वंशज हूँ / मैं खुद ही मेरा वारिस हूँ।' कल और कल को आज में समेटे हुए यह कवि 'है' में जीता है 'हुआ' और 'होगा' उसके लिए साधन मात्र हैं 'साध्य' नहीं।    
               
                        एक आंग्ल विवेचक कहता है- 'Poets may describe themselves as such or be described as such by others. A poet may simply be a writer of poetry, or may perform their art to an audience.' अर्थात एक कवि को खुद को वैसा है बताना चाहिए जैसा अन्य उसे बताएँ। कवि केवल कविता-लेखक हो अथवा अपनी कला का प्रदर्शन केवल श्रोताओं हेतु करे। आशय यह की कविता में आत्मप्रदर्शन से बचे। कवि नरेंद्र कहते है 'चुप्पी रखने में मेरा विश्वास नहीं है / जल की तरह पारदर्शक और / बहने का उत्सव क्या है / वो मैं अच्छी तरह जानता हूँ।' यह भी 'अन्याय के सामने आँख उठाने / तथा न्याय के समक्ष आँख झुकाने में / मानव मात्र को / शर्म नहीं होनी चाहिए।' कवि ने अपने राजनेता को इन मूल्यों से जोड़े रखने में सफलता पाई है।

                            कवि का मूल कार्य मानव-मानव के मध्य विचार-चेतना की नर्मदा को प्रवाहित करते रहना है। 'नर्मम ददाति इति नर्मदा' अर्थात 'जो दे आत्मानंद वही नर्मदा नदी है।' कवि नरेंद्र की कविता उन्हें ही नहीं सकल पाठक-श्रोता वर्ग को आत्मानंद में अवगाहन कराती है। यह कवि आत्म मूल्यांकन की प्रक्रिया से सतत गुजरता है। 'पर्वत की तरह अचल रहूँ / व नदी के बहाव सा निर्मल / श्रंगारित शब्द नहीं मेरे / नाभि से प्रगटी वाणी हूँ।' कवि नरेन्द्र के लिए काव्य रचना वाग्विलास नहीं जीवन का आधार है। वे कहते हैं- ' मेरा आचरण मेरे वचनानुसार / होगा नहीं बुरा कभी / नीचा देखने की बारी आये / ऐसा नहीं कहूँगा मैं कभी।' कवि को आत्म सम्भ्रम नहीं है। वह भली-भांति जनता और मानता है- 'दो किनारों के बीच सत्य को / पाने की मुझमें क्षमता है / हर बात का सत्य अलग हो सकता है / और होता ही है / मैं... मैं सिर्फ मेरे सत्य से / जुड़ा रहना चाहता हूँ।' यहाँ कुछ सवाल उठते हैं- क्या सत्य सर्वभौम नहीं होता?, क्या कवि की मनीषा भी सत्य के व्यक्ति परक मानती या यह कवि के राजनेता का स्वर है, राजनेता जो दलगत प्रणाली में एक दृष्टि विशेष रखने हेतु बाध्य है। कवि मुखर होता है तो कहता है- 'सत्य मेरे लिए सूर्य है / और... मेरा जीवन गायत्री मन्त्र बन जाए / ऐसी मेरी हर पल प्रार्थना है।

                        किसी रचनाकार के व्यक्तित्व के विविध पहलू होते हैं। किस रचना में किस पहलू का कितना शब्दांकन हुआ यह स्वयं कवि भी पूरी तरह नहीं बता सकता। 'आँख ये धन्य है' की कवितायें कविवर नरेन्द्र मोदी जी के व्यक्तित्व के विविध पहलुओं का परिचय कराती हैं। इनमें एक गर्वित देशवासी, जुझारू कार्यकर्ता, समर्पित समाजसेवी, कर्मठ राजनेता, उदात्त विश्व नेता, समर्पित ईश भक्त, मौलिक विचारक और एक सच्चे इंसान की छबि सहज ही देखी जा सकती है। इन कविताओं में बहुत कुछ नहीं भी है। वर्तमान राजनीति को आच्छादित कर रही कटुता, मलिनता, छिद्रान्वेषण, छींटाकशी, आत्ममोह, जन-प्रवंचना और असहमति को लांछित करने की प्रवृत्ति से पूरी तरह मुक्त ये रचनाएँ बताती हैं  कि इनका रचनाकार सामान्य मानव होने के साथ विशिष्ट और अतिविशिष्ट भी है। वह जीवन और जगत के द्वैत को भली-भांति समझता है। वह सत्य से आँखें मिलाते हुए कहता है- 'आनेवाले क्षण में आशा का दीप / प्रज्वलित किया जा सकता है।/ अन्धेरा भी रौशनी को चूम सकता है / बहती हुई जिंदगी का पल-पल रुक सकता है। ..... प्रत्येक सांस में सुगंध है / प्रत्येक बात में प्रेम है ... सोए हुए सपने में नई सुबह है / यंत्र जैसी जिंदगी में / पाया... सौन्दर्य का अद्भुत मंत्र।' इन कविताओं से आँखें चार करते हुए पाठक अपनी जिंदगी में सौन्दर्य के मन्त्र को तलाश सकता है। उद्देश्यपूर्ण सार्थक कविताओं के लिए कविवर नरेंद्र मोदी जी तथा अर्थवाही हिंदी अनुवाद हेतु डॉ. अंजना संधीर साधुवाद के पात्र हैं।
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संपर्क: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', विश्ववाणी हिंदी संस्थान, 204 विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, चलभाष ९४२५१८३२४४. salil.sanjiv@ gmail.com 
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