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बुधवार, 10 मई 2017

muktika

मुक्तिका
*
असत जीत गौतम हुए ब्रम्ह जीत जिस प्रात
पैर जमाने की हुई भर उड़ान शुरुआत
*
मोह-माधुरी लुटाकर गिरिधारी थे मस्त
चैन गंवाकर कंस ने तत्क्षण पाई मात
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सुन ब्रजेन्द्र की वंदना, था सुरेन्द्र बेचैन
पार न लेकिन पा सका, जी भर कर ली घात
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वास्तव में श्री मनोरमा, चेतन सदा प्रकाश
मीठी वाणी बोल तू, सूरज करे प्रभात
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चंद्र किरण लख कुमुद को उतर धरा पर मौन
पूनम बैठी शैल पर करे रात में प्रात
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